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Sunday, August 26, 2012

भोजताल का उत्सव


सावन सूखा निकला जा रहा था। बरसात आंख-मिचौनी का खेल खेल रही थी। बारिश के आगमन और गमन के पूर्वाभास में मौसम विशेषज्ञ भी धोखा खा रहे थे। बादल 'जो गरजते हैं, वे बरसते नहीं' के तर्ज पर आकर बिन बरसे सरपट किधर भाग जाते थे इसका अनुमान लगाना जब किसी के बूते नहीं रही तब बादलों की बेरुखी देख लोग इन्द्रदेव को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ, हवनादि कर मनाने में जुट गए। इन्द्रदेव प्रसन्न हुए तो बारिश की ऐसी झड़ी लगी कि एक माह तक सूर्य देव के दर्शन दुर्लभ हो गए। 
उमड़-घुमड़ आकर बदरा जमकर क्या बरसे कि जलविहीन कंगाल सिकुड़ते-सिमटते नदी, नाले उमड़ते-उफनते हलचल मचाने लगे। शहर की उपेक्षित नालों में जोरदार बारिश ने जब भरपूर रौनक भर दी तब वे भी आवारा बनकर तट की मर्यादा तोड़कर इतराते-इठलाते हुए बड़ी नाजो से पली बड़ी हमारी नाजुक सड़कों को तहस-नहस करते हुए कच्चे मकान, झुग्गी-झोंपड़ियों पर अपना आतंक दिखाते हुए उन्हें उखाड़ने-उजाड़ने निकल पड़े। कमजोर पर ही सबका बस चलता है और मर्यादा भंग घोर विपत्ति और महाविनाश का सूचक है। शायद ऐसे ही किसी दृश्य को देखकर श्री बलदेव प्रसाद ने अपने महाकाव्य 'साकेत संत' में यह चेतावनी दी होगी -
"मर्यादा में ही सब अच्छे, पानी हो वह या कि हवा हो।
इधर मृत्यु है, उधर मृत्यु है, मध्य मार्ग का यदि न पता हो।"
प्रकृति-प्रकोप का यह व्यवहार हम मानव के लिए अपार कष्ट, विपत्ति और दुःख का कारण तो बनता ही है लेकिन साथ ही वह हमें यह भी सिखला देता है कि जीवन का यथार्थ सुख इन कष्टों, विपत्तियों और आपदाओं से ही फूटता है।
'सिमिटि-सिमिटि जल भरहिं तलाबा, जिमि सदगुन सज्जन पहिआवा।' की तर्ज पर जैसे ही भोजताल भरकर ख़ुशी से हिल्लौरे मारने लगा वैसे ही २१ अगस्त को हम भोपालवासियों को ६ साल बाद इस पर बने भदभदा डैम के गेट खुलने पर दुर्लभ बनता उत्सव सा माहौल देखने का शुभावसर मिल ही गया। गेट खुलते ही देखते-देखते गर्मागर्म भुट्टों को भूनकर खिलाने वालों, बंद डिब्बों में समोसे बेचने वालों और चाय की दुकानों पर अपार भीड़ जुट गई जिससे उनके मुरझाये चेहरों पर भी रंगत छा गई। हज़ारों के संख्या में बच्चे , महिलाएं, बुजुर्ग अपने घरों से निकलकर बड़े उत्साह और रोमांच से गेट से बहते, उछलते-उफनते जलराशि को देख मग्न हुए जा रहे थे। यह सब सुकूं भरे नज़ारे को देखकर मेरे मन में प्रकृति के चतुर चितेरे सुमित्रानंदन पन्त जी की यह पंक्तियाँ सजीव होकर उमड़ने-घुमड़ने लगी-
'पकड़ वारि की धार झूलता है रे मेरा मन'
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इन्द्रधनुष के झूले में झूलें मिल सब जन।
फिर-फिर आए जीवन में सावन मन-भावन।।
          यूँ तो भोजताल के आसपास हमें हर दिन ही उत्सव का माहौल नज़र आता है लेकिन इसपर बने भदभदा डैम के गेट खुलने पर हर बार जो अनोखा उत्सव का माहौल बनता है उसे किसी भी पूर्व निधारित धार्मिक या सांस्कृतिक उत्सव से कमतर नहीं आँका जा सकता है। जहाँ एक ओर धार्मिक या सांस्कृतिक उत्सव किसी भी वर्ग विशेष के आयोजन भर होकर वहीँ सिमट जाते हैं वहीँ दूसरी ओर जब हम थोड़ी गहराई में जाकर सोचने-विचारने की कोशिश करते हैं तो हमें साफ़ नज़र आने लगता है कि जब-जब हम मनुष्यों ने अपने ही द्वारा बनाये गए जात-पात, ऊँच-नीच, जाति धर्म के बंधन को सर्वोपरि समझकर विश्व बंधुत्व की भावना से मुहं फेरकर प्रकृति से खिलवाड़ करने की कोशिश की हैं तब-तब प्रकृति अपने स्वभाव के अनुरूप किसी न किसी रूप में आकर अपना अघोषित आयोजन पूरा कर हमें सबक सिखाने से पीछे नहीं हटी है।
...कविता रावत


Tuesday, August 14, 2012

स्वतन्त्रता दिवस के लड्डू


कभी बचपन में हम पंद्रह अगस्त के एक दिन पहले एक सफ़ेद कागज़ पर गाढ़े लाल, हरे और नीले रंग से तिरंगा बनाकर उसे गोंद से एक लकड़ी के डंडे पर फहरा कर झंडा तैयार कर लिया करते थे और फिर 15 अगस्त के दिन जल्दी सुबह उठकर बड़े जोश से जब प्रभात फेरी लगाते हुए देश भक्ति गीत गाते हुए उबड़=खाबड़ पगडंडियों से निकलकर गाँव में प्रवेश करते थे तो तब लोग अपने घरों से निकल कर खूब तालियाँ बजाकर हमारा उत्साह बढाकर दुगुना कर देते थे। प्रभात फेरी में देशभक्ति के जाने कितने ही गीत  इतने जोर शोर गाते थे कि अगले दिन गले से आवाज बंद हो जाया करती थी। प्रभात फेरी के माध्यम से गाँव-गाँव, घर-घर जाकर देशभक्ति के गीतों से देशप्रेम का अलख जगाने का यह सिलसिला देर शाम तक चलता रहता था. शाम को स्कूल से 1-2 लड्डू क्या मिले कि बड़े खुश होकर घर लौटकर अपने घर और आस-पड़ोस में उसे प्रसाद की तरह मिल बांटकर खुश हो लेते थे। आज जब उन गीतों के साथ ही बीच-बीच में लगाए नारों को याद करती हूँ तो सोचती हूँ तब बचपन कितना मासूम होता था जिसमें बहुत कुछ सोचने समझने की जरुरत ही नहीं पड़ती थी। अपनी ही मस्ती में गीत और नारे लगाकर थकते नहीं थे.
"कौमी तिरंगे झंडे, ऊँचे रहो जहाँ में
हो तेरी सर बुलंदी, ज्यों चाँद आस्मां में
तू मान है हमारा, तू शान है हमारी
तू जीत जा निशाँ है, तू जान है हमारी
आकाश और जमीं पर, हो तेरा बोल बाला
झुक जाय तेरे आगे, हर तख्तो- ताज वाला
हर कौम की नज़र में, तू अमन का निशाँ है"
..................
और नारों का भी तब हमारे पास कम जवाब नहीं था -

गुरूजी - "शेर बच्चो!"
बच्चे - "हाँ जी हाँ"
गुरूजी - "खाते क्या हो?"
बच्चे - " दूध-मलाई"
गुरूजी - "करते क्या हो?"
बच्चे - "देश भलाई"

...बचपन के इस "दूध -मलाई" और "देश भलाई" के मायने धीरे-धीरे बदलकर गहन शोध के विषय बन जायेंगे, इसका ख्याल कभी जेहन में आया ही नहीं पाया था।

स्वतंत्रता दिवस की मंगलकामनाओं सहित
जय हिंद, जय भारत 

...कविता रावत