अपनों के बीच बेगानी हिन्दी


हर बर्ष १४ सितम्बर को देशभर में हिंदी दिवस एक बहुत बड़े पर्व की भांति सरकारी-गैर सरकारी और बड़े उद्योगों का मुख्य केंद्र बिंदु बनकर सप्ताह भर उनकी तमाम गतिविधियों में सावन-भादों के उमड़ते-घुमड़ते बादलों की तरह गरज-बरस कर सबको नख-शिख तक भिगोने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ता। इस दौरान हिंदी को बैकवाटर्स, काऊबेल्ट, हिन्टरलैंड आदि की संज्ञा से नवाजने वाले, भारतीय सभ्यता, संस्कृति और परम्परा के प्रति अविश्वास व उसे हेय दृष्टि से देखने वाले बुद्धिजीवी जब हिंदी दिवस को एक मंच पर आकर माँ भारती की प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाकर, धूप-दीप जलाकर उसका गुणगान और कीर्तन-भजन कर उसके पक्ष में प्रदर्शनी, गोष्ठी, सम्मलेन या समारोह आदि आयोजित कर हिंदी सेवियों को पुरस्कृत व सम्मानित करने का उत्क्रम जगह-जगह करते देखे जाते हैं तब ऐसे मनभावन दृश्य देखकर मन भ्रमित होकर सोच में डूबने लगता है कि क्या सचमुच अधूरे संकल्प से घोषित हमारी राष्ट्रभाषा के भाग तो नहीं खुल गए हैं? उसकी सच्ची प्राण-प्रतिष्ठा करने वाले पैदा तो नहीं हो गए हैं? लेकिन यह खुशफहमी अधिक समय तक नहीं टिक पाती है । १४ सितम्बर से शुरू हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़ा अगले कुछ ही दिन में किस समुद्र में पानी की बूंद की तरह समा जाता है, ढूँढना नामुमकिन हो जाता है ।  ऐसे में मुझे कभी स्कूल में पढ़ा कबीर दास जी का दोहा याद आने लगता है - 

"हेरत-हेरत हे सखी! रहा कबीर हिराय

बूंद समानी समुद्र में सो कत हेरी जाय । " 
और फिर अहमद फ़राज की पंक्तियों की तरह हिंदी नज़र आती है- 

"जिनके होंठों पर हँसी , पावों में छाले होंगे

वही चंद लोग तुम्हे चाहने वाले होंगे । " 
         राष्ट्रभाषा कहलाने वाली हमारी हिंदी की यह दशा देख यही आभास होता है कि १४ सितम्बर १९४९ को संविधान सभा द्वारा जो अनमने रूप से हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किया वह आज भी महज एक घोषणा भर दिखती है जिसमें संविधान के अनुच्छेद ३४३ में लिखा गया- "संघ की सरकारी भाषा देवनागरी लिपि में हिंदी होगी और संघ के सरकारी प्रयोजनों के लिए भारतीय अंकों का अन्तर्राष्ट्रीय रूप होगा,' किन्तु अधिनियम के खंड (२) में लिखा गया ' इस संविधान के लागू होने के समय से १५ वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता रहेगा, जिसके लिए इसके लागू होने से तुरंत पूर्व होता था" अनुच्छेद की धरा (३) में यह व्यवस्था कर दी गई- "संसद के उक्त १५ वर्ष की कालावधि के पश्चात विधि द्वारा (क) अंग्रेजी भासा का (अथवा) अंकों के देवनागरी रूप का ऐसे प्रयोजन के लिए प्रयोग उपबंधित कर सकेगी जैसे कि ऐसी विधि में उल्लिखित हो." इसके साथ ही अनुच्छेद (१) के अधीन संसद की कार्यवाही हिंदी अथवा अंग्रेजी में संपन्न होगी. २६ जनवरी १९६५ के पश्चात् संसंद की कार्यवाही केवल हिंदी (और विशेष मामलों में मातृभाषा) में ही निष्पादित होगी, बशर्ते संसद क़ानून बनाकर कोई अन्यथा व्यवस्था न करे । " 
          हिंदी १५ वर्ष उपरान्त अपने वर्चस्व को प्राप्त कर पाती, इससे पहले ही लोकतंत्र पर तानाशाही हावी हो गई और सन १९६३ में पंडित नेहरु ने राजभाषा अधिनियम में संशोधन करवा दिया- "जब तक भारत  का  एक भी राज्य हिंदी का विरोध करेगा हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहासनारूढ़ नहीं किया जाएगा । " इसी को दुष्परिणाम है कि हिंदी आज भी उत्तर (हिंदी पक्षधर) और दक्षिण (हिन्दी विरोधी) दो पाटों के बीच पिसती हुई स्वार्थी राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट अफसरशाही और चापलूसों के हाथों की कठपुतली बनी हुई है, जो प्रांतीयता की दुहाई देकर हिन्दी के विकास और समृद्धि के नाम पर अदूरदर्शिता और विवेकहीनता का परिचय देते हुए अरबों-खरबों रुपये खर्च कर हिन्दी प्रेम का प्रदर्शन कर इतिश्री कर रहे हैं ।        
        आज राजकीय सोच के दुष्परिणाम का ही नतीजा है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के अंग्रेजी कल्पवृक्ष के आगे जाने कितनी ही हिन्दी पत्र-पत्रिकाएं फल-फूलने से पहले ही दम तोडती नज़र आ रही हैं । इनकी चकाचौंध में चंदबरदाई,कबीर, सूर, तुलसी, जायसी आदि के राष्ट्रीय अस्मिता के जागरण एवं निमार्ण के उपाय लोग भूलते जा रहे हैं. वे भूलने लगे हैं कि ज्ञान-विकास व बौद्धिक स्तर, देशप्रेम सिर्फ अपनी भाषा से ही संभव होता है । इतिहास गवाह है किसी भी देश की अपनी राष्ट्रभाषा ने ही वहां मुर्दा रूहों में प्राण फूंककर बड़ी-बड़ी क्रांतियों को जन्म दिया. फ़्रांस,रूस के बाद गुलामी की जंजीरों में जकड़ी भारत माता को आज़ाद कराने में हिन्दी भाषा के अमूल्य योगदान को भला कौन भुला सकेगा, जिसके आगे तोप, तीर, डंडे या तलवार का जोर भी नहीं चल पाया । क्या आज कोई भारतीय भुला सकता है उन गीत उन नारों को जिनकी अनुगूंज से अमर वीर स्वतंत्रता सैनानी देशप्रेम के जज्बे में बंधकर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर "वन्दे मातरम् , भारत माता की जय, सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है कितना जोर बाजुए कातिल में है, तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा, स्वतंत्र मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा आदि गीत गाते-गाते स्वतंत्रता दिलाने समर में कूद पड़े आज भी चाहे वह लोकतंत्र को चलाने के लिए कोई भी चुनाव हो या भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना हजारे का आन्दोलन हो या बाबा रामदेव का 'काले धन वापसी' का देशव्यापी आन्दोलन या कोई अन्य धरना आदि बिना हिन्दी के यह सब पंगु ही साबित होंगे ।          

आओ हिंदी दिवस पर जरा गहन विचार करें कि क्या बात है जो विश्व के बड़े-बड़े समृद्धिशाली देश ही नहीं अपितु छोटे-छोटे राष्ट्र भी अपनी राष्ट्रभाषा को सर्वोपरि मानकर अपना सम्पूर्ण काम-काज बड़ी कुशलता से अपनी राष्ट्रभाषा में संपन्न कर तरक्की की राह चलते हुए अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं वहीँ दूसरी ओर सोचिये क्यों विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में अपनों की बीच उनकी राष्ट्रभाषा कहलाने वाली हिन्दी  अपना वर्चस्व कायम करने में आज तक असमर्थ बनकर अपनों के बीच आज पर्यंत बेगानी बनी हुई है?
  ...कविता रावत 


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September 13, 2012 at 10:19 AM

राजभाषा संबंधी केंद्र सरकार की दीर्घसूत्री नीति पिछड़ चुकी है. प्राइवेट सैक्टर में नौकरियाँ बढ़ रही हैं जिनके लिए अच्छी अंग्रेज़ी आना आवश्यक समझा जाता है. सरकारी कार्यालयों में हिंदी कार्यान्वयन की छवि एक नौटंकी की है.

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September 13, 2012 at 10:49 AM

फिर भी कविता जी रावत कुछ बात है कि हिंदी मिटती नहीं हमारी .....

निज भाषा उन्नति आहै ,सब उन्नति को मूल ,
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिये को शूल .

जहां कलह तहं सुख नहीं ,कलह सुखन को शूल ,
सबै कलह इक राज में ,राज कलह को भूल .

इतने शहरी हो गए ,लोगों के ज़ज्बात ,हिंदी भी करने लगी ,अंग्रेजी में बात .

हिंदी के नाम पे अपनी बिंदी चमकाने वालों ,
मैं जानता हूँ और अच्छी तरह से मानता हूँ ,

कि ये मंच और माइक तुम्हारे हैं .

नामचीन कवियों को उदीयमान बतलाने वाले गोबर गणेशों ,
तुम हिंदी का क्या श्राद्ध करोगे ,
सरयू तट पर ,सरयू तीरे मैं तुम्हारा तर्पण करता हूँ .

आपने गहन विश्लेषण परक पोस्ट लिखी है .ये सब उनका ही किया धरा है जो पञ्च शील और विश्व -नागरिकता की बात करते थे ,अंग्रेजी को ज्ञान की खिड़की और इक वैश्विक भाषा बतलाते थे .हिंदी इक सेल्फ हीलिंग ओर्गेन है हमारी काया की तरह खुद स्वास्थ्य लाभ ले रही है .मुम्बैया फिल्मों के अंतर -राष्ट्रीय रिलीज़ ने इसे ग्लोबी बना दिया है .इक अंतरजात बुद्धि तत्व है हिंदी के पास स्वत :विकसने का .इति .

आपने बहुत ही सुन्दर आलेख लिखा है .मैंने यूं ही छुटपुट बिंदास दो टूक बे -लाग हो लिख दिया .
ram ram bhai
बृहस्पतिवार, 13 सितम्बर 2012
आलमी होचुकी है रहीमा की तपेदिक व्यथा -कथा (आखिरी किश्त )
http://veerubhai1947.blogspot.com/

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September 13, 2012 at 12:00 PM

चिंतानिये है,खुद का विश्लेषण भी ज़रूरी है

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September 13, 2012 at 12:29 PM

ये एक चिंतनीय विषय है ... बस एक दिन के आडम्बर से इसका समाधान संभव नहीं है ...
हमें दिल के अंदर ये बात घर करना होगी की एक सूत्र में सबको बस हिंदी ही पिरो सकती है ... राष्ट्र तभी तक एक रहेगा जब एक भाषा और अपनी भाषा में काम काज हो ...

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September 13, 2012 at 1:00 PM

विचारणीय प्रश्न,,,मेरे विचार से

है जिसने हमको जन्म दिया,
हम आज उसे क्या कहते है\
क्या यही हमारा राष्ट्रवाद - ?
जिसका पथ दर्शन करते है,
हे राष्ट्र्स्वामिनी निराश्रिता
परिभाषा इसकी मत बदलो,
हिन्दी है भारत की भाषा,
हिन्दी को हिन्दी रहने दो,,,,,,

RECENT POST -मेरे सपनो का भारत

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September 13, 2012 at 1:08 PM

कल 14/09/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

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September 13, 2012 at 4:23 PM

होने को क्या नहीं हो सकता था मगर गंदी राजनीति चौपट कर गई पूरे देश को ! मौजूदा परिवेश में राजनीतिक इच्छा शक्ति कभी बनने भी रही यहाँ ! इसलिए A dictator is badly needed here .
जो सिर्फ नाम का ही न हो -- काम का भी डिक्टेटर हो .
जो थोडा हिटलरी हो -थोडा स्टालिनी हो और थोडा माओ के जैसा हो .
इसके बिना भारत की हालत सुधरने वाली नहीं है .
लेकिन ऐसा घालमेल डिक्टेटर मिलेगा कहाँ से ?

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September 13, 2012 at 4:41 PM

हिंदी को क्रांति की जरुरत है..अब तो बिंदी की तरह होती जा रही है हिंदी....
विचारनीय पोस्ट ..

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September 13, 2012 at 5:06 PM

हिंदी दिवस के बहाने खूब खर्चा-सर्चा का दौर इन दिनों चलता रहता है बस चलता रहता है और हिंदी लुटती पिटती रहती है भाषण बाजी चलती है और घर आकर कोसा जाता है हिंदी हो और क्या!
आपने अच्छी खिंचाई की मन को बड़ी तसल्ली मिली .........
असली चेहरा दिखाने के लिए धन्यवाद है आपका

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September 13, 2012 at 7:05 PM

बहुत विचारणीय सार्थक आलेख सच का आइना दिखा दिया

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September 13, 2012 at 7:47 PM

आज राजकीय सोच के दुष्परिणाम का ही नतीजा है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के अंग्रेजी कल्पवृक्ष के आगे जाने कितनी ही हिन्दी पत्र-पत्रिकाएं फल-फूलने से पहले ही दम तोडती नज़र आ रही हैं । इनकी चकाचौंध में चंदबरदाई,कबीर, सूर, तुलसी, जायसी आदि के राष्ट्रीय अस्मिता के जागरण एवं निमार्ण के उपाय लोग भूलते जा रहे हैं. वे भूलने लगे हैं कि ज्ञान-विकास व बौद्धिक स्तर, देशप्रेम सिर्फ अपनी भाषा से ही संभव होता है ।

इसे बार बार क्यों याद दिलाना पड़ता है . बिना कहे भी समझना चाहिए

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September 13, 2012 at 7:54 PM

ब्लॉग ने तो अपना ली है, अब औरों को अपनानी है..

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September 13, 2012 at 8:36 PM

सच में , आपने सार्थक लिखा पर सार्थक पहल नही हो पा रही सरकार की ओर से

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September 13, 2012 at 10:09 PM

Apne sochne k liye majbur kar diya kavita ji....khubsoorat...!!!

come and join the group...it would be pleasure to see you there...

http://www.facebook.com/#!/groups/424971574219946/

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September 13, 2012 at 10:33 PM

बहुत बढ़िया ,विचारणीय पोस्ट.....
सार्थक लेखन...

हिंदी दिवस की शुभकामनाएं कविता जी.
सादर
अनु

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September 13, 2012 at 11:23 PM

हिंदी, हिन्दू और हिंदुस्तान ही आज हाशिये पर खड़े हैं.

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September 14, 2012 at 1:26 AM

बहुत सुन्दर लेख...
विचारणीय भी...!

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September 14, 2012 at 2:50 AM

बहुत सार्थक प्रस्तुति .आभार

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September 14, 2012 at 10:45 AM

http://vyakhyaa.blogspot.in/2012/09/blog-post_14.html

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September 14, 2012 at 11:20 AM

सार्थक प्रस्तुति
हिंदी दिवस की शुभकामनायें !!

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September 14, 2012 at 11:20 AM

सार्थकता लिए सशक्‍त प्रस्‍तुति ...
आभार

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September 14, 2012 at 1:54 PM

विचारणीय पोस्ट.....
हिंदी दिवस की शुभकामनायें...

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September 14, 2012 at 4:52 PM

चिंतनीय पोस्ट
हिन्दी ना बनी रहो बस बिन्दी
मातृभाषा का दर्ज़ा यूँ ही नही मिला तुमको
और जहाँ मातृ शब्द जुड जाता है
उससे विलग ना कुछ नज़र आता है
इस एक शब्द मे तो सारा संसार सिमट जाता है
तभी तो सृजनकार भी नतमस्तक हो जाता है
नही जरूरत तुम्हें किसी उपालम्भ की
नही जरूरत तुम्हें अपने उत्थान के लिये
कुछ भी संग्रहित करने की
क्योंकि
तुम केवल बिन्दी नहीं
भारत का गौरव हो
भारत की पहचान हो
हर भारतवासी की जान हो
इसलिये तुम अपनी पहचान खुद हो
अपना आत्मस्वाभिमान खुद हो …………

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September 14, 2012 at 11:22 PM

जब हिन्दी दिवस के भाषण अंग्रेजी मे हों तो हिन्दी कैसे विकसित होगी?

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September 14, 2012 at 11:25 PM

हिन्दी दिवस पर उपेक्षित चन्द्रकुवंर वर्त्वाल पर नयी पोस्ट देखिये।

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September 15, 2012 at 12:32 PM

vicharniye sarthak post ......yah aalaafsar bhi samajh le to sahi shuruaat ho jayegi

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September 15, 2012 at 3:18 PM

पंडित नेहरु ने राजभाषा अधिनियम में संशोधन करवा दिया- "जब तक भारत का एक भी राज्य हिंदी का विरोध करेगा हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहासनारूढ़ नहीं किया जाएगा । "
इसका विरोध केवल सेठ गोविन्द दास ने किया और किसी ने नहीं किया और आज भी कोई विरोध नहीं..दुखद है यह सब ..हिंदी का चलन तेजी से घट रहा है
बहुत विचारनीय आलेख है पर समझे जब ...

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September 16, 2012 at 7:18 AM

कविता जी आपका लेख बहुत ही बढियां है | आपने हिंदी की पीड़ा को सही व्यक्त किया है | रश्मि प्रभा जी की यह बात एकदम दुरुस्त है की स्वयं का विश्लेषण जरूरी है |

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September 17, 2012 at 2:16 PM

हिंदी को आज तक राष्ट्रभाषा का पूर्ण दर्जा न मिल पाना लोकतंत्र की तानाशाही का ही नतीजा है ...
बहुत विचारणीय पोस्ट

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September 17, 2012 at 10:35 PM

कविता जी! हिंदी भाषा के बारे में सुन्दर विचार है, पर मेरी राय कुछ अलग है.
मुझे नहीं लगता की हिंदी किसी दुर्दशा की शिकार है. आज हिंदी भाषा विश्व स्तर पर दुसरे नंबर पर पहुँच चुकी है. मेरी आज तक की पूरी पढाई इंग्लिश मीडियम में हुयी है पर मैं हिंदी भाषा में ही अपने विचारों को व्यक्त करने में सहजता महसूस करता हूँ.
मैं हिंदी और इंग्लिश दोनों भाषाओं में लिखता-पढता हूँ, और ब्लॉग्गिंग भी करता हूँ. मुझे हिंदी बोलने में शर्म नहीं आती. हम कहते है की हिंदी भारत की राज भाषा होते हुए भी पुरे देश में नही बोली जाती.पर हिंदी को थोपने से भी कुछ हासिल नहीं होगा.शायद भारत आज एक सफल लोकतंत्र इसी वजह से है की यहाँ सभी भाषाओं को फलने-फूलने का मौका मिला. आप श्रीलंका का उदहारण ले सकते है जहा सिंहली भाषा को तमिल लोगो पर थोपने का परिणाम वहा पर फैली अशांति है. धीरे-धीरे ही सही पर हिंदी विश्व स्तर पर अपने पंख फैला रही है. और मुझे हिंदी का भविष्य उज्जवल नज़र आता है.

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September 18, 2012 at 10:32 AM

बहुत ही सुन्दर, सार्थक और विचार करने योग्य लेख है आपका .......कविताजी

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September 18, 2012 at 6:00 PM

हिंदी को हिंदी भाषी क्षेत्र में ही पूरा सम्मान नहीं मिल रहा है तो अन्य क्षेत्रों से कैसे उम्मीद करें.हिंदी को राजभाषा बनाना अब असंभव है.इसके लिए सभी राज्यों की सहमति बहुत मुश्किल है.

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September 18, 2012 at 6:02 PM

हिंदी हम तब सीखेंगे जब दुसरे देश हमें प्रेरणा देंगे .------यशपाल जैन

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September 18, 2012 at 6:03 PM

कम से कम हिंदी भाषी प्रदेशों में हिंदी दिवस मनाने की जरुरत क्यों है ?

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September 18, 2012 at 6:05 PM

हिंदी दिवस सिर्फ उनके लिए है जो ३६४ दिन हिंदी को भूले रहते हैं .

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September 18, 2012 at 6:36 PM

सार्थकता लिए हुवे बेहतरीन पोस्ट...
:-):-):-)

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September 21, 2012 at 7:54 AM

ब्लॉग पर आगमन और समर्थन के लिए धन्यवाद |

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September 22, 2012 at 5:30 AM

बहुत ही सार्थक और वैचारिक पोस्ट |ब्लॉग पर आगमन के लिए आभार |

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September 22, 2012 at 6:24 AM

बहुत ही बढ़िया । मेरे नए पोस्ट समय सरगम पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद।

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September 22, 2012 at 6:40 PM

निज भाषा उन्नति आहै ,सब उन्नति को मूल ,
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिये को शूल .
.अपनी भाषा अपनी ही होती जिसमें हिय का शूल समझ आता है किसी और की भाषा भी सिर्फ कह भर सकते हैं

सार्थकता लिए सशक्‍त प्रस्‍तुति ...
आभार

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September 22, 2012 at 11:21 PM

बहुत सुन्दर!
शुभकामनायें!!!

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sm
September 23, 2012 at 3:19 AM

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

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September 23, 2012 at 9:03 AM

"जिनके होंठों पर हँसी , पावों में छाले होंगे
वही चंद लोग तुम्हे चाहने वाले होंगे । " फ़राज़ के इस शेर के मार्फ़त हिंदी दिवस के अवसर पर सही संकेत दिए आपने !प्रस्तुति का शुक्रिया!

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September 23, 2012 at 11:27 AM

बहुत सुन्दर चेतना जगाता हुआ है आपका यह लेख.
विडम्बना यह है कि जो हिंदीभाषी हैं पर उन्होंने अंग्रेजी
का ज्ञान सुनने सुनाने लिखने पढ़ने में हासिल कर
लिया है वे तो अधिकतर यही चाहते हैं कि सब काम
अंग्रेजी में ही हो.बहुत से तो हिंदी के प्रति अत्यंत हेय भावना
भी रखते हैं. सब को मिलकर हृदय की सच्चाई से निरंतर
यत्न करना होगा.तभी हिंदी का उत्थान सम्भव है.

ज्ञानवर्धक लेख के लिए हार्दिक आभार कविता जी.

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September 24, 2012 at 2:29 PM

हिंदी को माथे की बिंदी कहने भर से कम नहीं चलेगा, वही सम्मान देना होगा. प्रेरक आलेख-आभार

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September 25, 2012 at 8:39 AM

कविता जी! सुन्दर विचार है हिंदी भाषा के बारे में हिंदी दिवस की शुभकामनायें....!!!

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November 6, 2012 at 8:22 PM

kavita ji hindi ke liye logbago ke pas sirf ek hi din bacha h wo h hindi diwas baki din kya ............
ye hamare hindi wale bhi nahi jante h

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