गणपति में रमें बच्चे

गणपति में रमें बच्चे


इन दिनों भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक चलने वाले १० दिवसीय विद्या, बुद्धि, ऋद्धि-सिद्धि के दाता, मंगलकर्ता, विध्न विनाशक गणेश जी के जन्मोत्सव की धूम चारों ओर मची है। कभी महाराष्ट्र में सातवाहन, चालुक्य, राष्ट्रकूट और पेशवा आदि राजाओं द्वारा चलाई गई गणेशोत्सव की प्रथा आज महाराष्ट्र तक ही सीमित न होकर देश के कोने-कोने में ही नहीं अपितु कई दूसरे राष्ट्रों में भी मनाया जाने वाला पर्व बन बैठा है। गणेशोत्सव की धूम सार्वजनिक स्थलों में विद्युत साज-सज्जा के साथ छोटी-बड़ी सजी-धजी प्रतिमाओं के विराजमान होने से तो है ही साथ ही साथ घर-घर में विभिन्न सुन्दर आकार-प्रकार की प्रतिमाओं के विराजमान होने से और भी बढ़ गई है। 
एक और जहाँ मेरा बचपन से ही शिव पूजन में मन रमा है, वहीँ दूसरी ओर जब मैं अपने ७ वर्षीय बेटे का जब से उसने होश संभाला है, को गणपति धुन में रमा देखती हूँ तो कभी-कभी आश्चर्य से भर उठती हूँ। क्योंकि वह हरदम हर जगह हर किसी से गणेश की ही बातें करने बैठ जाता है, जिससे कई बार अजीबोगरीब स्थिति निर्मित हो जाती है। घर में जहाँ उसके जन्म से पहले कभी गणेशोत्सव के दौरान गणेश जी की स्थापना नहीं हो पायी वहीँ आज उसकी गणपति धुन का ही परिणाम है कि ४ साल से निरंतर उसके हाथों घर में गणेश स्थापना हो रही है। इस बार संयोग से गणेश चतुर्थी से दूसरे दिन उसका जन्मदिन आया तो उसने पहले से ही घोषणा कर दी कि अबकी बार गणेश जी के साथ ही जन्मदिन मनाऊँगा। इन दिनों दोनों बच्चों की परीक्षाएं चल रही हैं इसलिए जन्मदिन परीक्षा समाप्ति पर मनाने को कहा लेकिन जब वह बहुत कहने पर भी नहीं माना तो हमने केक लाकर जब उसे दिया तब वह अपने गणपति के साथ जन्मदिन मनाकर ऐसे खुश हुआ जैसे सचमच गणेश जी उसके साथ होंगें।
अभी मेरे शिव पहली कक्षा में है लेकिन नर्सरी से अब तक स्कूल से सिर्फ एक ही शिकायत सुनती आयी हूँ कि वह जब कभी कक्षा में पेन-पेंसिल लेकर कापी-किताब में गणेश के चित्र बनाने बैठ जाता है। वह तो गणेश जी की ही अनुकम्पा समझो कि वह पढने में अव्वल आता है जिसके कारण टीचर इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं देते। दीदी भी साथ ही चौथी कक्षा में है उसकी भी बराबर एक ही शिकायत होती है कि वह स्कूल वैन में बैठे सभी बच्चों को जब-तब गणपति के किस्से सुनाने बैठ जाता है जिससे सभी उसकी हँसी उड़ाने लगते हैं जो उसे कतई अच्छा नहीं लगता। दीदी को तो अपनी परीक्षा की चिंता है लेकिन वह बहुत डांट-फटकार के बाद ही पढने बैठ पाता है। 
जब कभी मेरा कंप्यूटर में कोई काम होता है तो थोड़ी देर बैठकर दूसरे काम के लिए उठी नहीं कि कब वह चुपके से अपनी पढ़ाई छोड़कर अपने कमरे से खिसक कर कंप्यूटर पर गणेश के चित्र या इन्टरनेट से गणपति के गाने, फिल्म, गीत या गेम लोड कर देता है इसका पता उसकी बनाई फाइल या डाउनलोड फाइल देख कर कर पाती हूँ। पॉवर पॉइंट में तो वह इतनी अच्छी तरह गणपति के फोटो इन्सर्ट कर उन्हें सजाकर जे.पी.जी फाइल में बदलकर सेव कर मुझे दिखाने लगता है तो मुझे पहले तो गुस्सा आता है लेकिन बाद में देखकर हैरानी होती है कि ऐसा बनाना तो मुझे भी अच्छी तरह से नहीं आ पाता है, यह सोचकर मेरा गुस्सा शांत हो जाता है । बावजूद इसके माँ-बाप को लाड-प्यार के साथ बच्चों को कभी-कभार डांटना-फटकारना भी मेरे हिसाब से बहुत जरुरी हो जाता है इसलिए यह सब चलता रहता है।
मेरी डांट-फटकार के बावजूद भी उसके गणपति से लगाव में कोई बदलाव दूर-दूर तक आता दिखाई नहीं देता है वह आज भी घर की दीवार से लेकर जो भी उसे कोरा पन्ना या कापी मिलती है तो वह अपनी कल्पना शक्ति से आड़ी-टेढ़ी रेखाओं से गणेश के चित्र उकेरने से बाज नहीं आता है।  उसे दूसरे बच्चों की तरह खिलोंनों के बजाय गणपति जी से सम्बंधित किसी भी वस्तु/चीज आदि से खेलना बेहद भाता है। दूसरे बच्चों के साथ भी वह गणपति का खेल शुरू कर देता है, जिसे देख लोग हँसकर रह जाते हैं. रास्ते में या कहीं भी बाजार में जहाँ कहीं भी उसके नज़र गणेशनुमा चीज पर पड़ी नहीं कि फिर तो हाथ धोकर उसे लेने के पीछे पड़ जाता है।  कोई भी समाचार पत्र हो या गणेश जी की कोई किताब जिसमें गणेश जी के बारे में कुछ भी लिखा/छपा हो, उसके हाथ लगी नहीं कि उसे पढने-देखने बैठ जाता है। जहाँ समझ नहीं आता चट से उसे लेकर पास खड़े होकर सुनाओ/बताओ इसमें क्या लिखा/छपा है तब तक रट लगाये रखेगा जब तक वह बात बता या समझा न दिया जाय। जरा आनाकानी की या थोडा मना किया नहीं कि मुहं फुलाकर एक कोने में बैठ 'कट्टी' कहकर मौनव्रत धारण कर लेता है।
ईश्वर की लीला भी अपरम्पार है  विवाह के १० वर्ष बाद जाने क्या-क्या झेलने,सुनने, देखने की बाद  ईश्वर की अनुकम्पा से मुझे मातृत्व सुख अनुभव करने का अवसर मिल पाया  सोचती हूँ कभी-कभी हम जाने क्यों घोर कष्ट और विपदा के क्षणों में ईश्वर की योजना को बहुत थकावट और पीड़ा से परिपूर्ण कार्यक्रम समझ अज्ञानतावस उनसे दूर भागने की नाकाम कोशिश करने लगते हैं।  उस समय हम भूल जाते हैं कि यह कष्ट तो उस नन्हें बालक के चलने के प्रयत्न जैसा है जिसके सामने उसकी माँ प्रसन्न बदन, मुस्कराती उसे निहारती है जिसे देख बालक बिना किसी कष्ट और पीड़ा के आगे-आगे अपने नन्हे-नन्हे कदम बढ़ाकर माँ की गोद में आकर सबकुछ भूल जाता है। यदि एक दृष्टिकोण से विकास अत्यंत श्रमशील और कठिन जान पड़ता है तो दूसरी ओर उसमें क्रीडा का आनंद भी निहित है यह उस ईश्वर की ही लीला है जिसके नियम हम मानव की तरह नहीं बदलते, उसके नियम तो निश्चित हैं और मेरा मानना है  इसका ज्ञान हर मनुष्य को सिर्फ अपने अनुभव से ही देर-सबेर जरुर होता है। यही सब सोचकर जब भी मैं अपने शिवा के गणपति के रंग में रंगने की कोशिश करती हूँ तो सच में मुझे भी अपार ख़ुशी का अनुभव होने लगता है    
सभी को गणेशोत्सव की हार्दिक शुभकामनाओं सहित..
......कविता रावत  

            
अपनों के बीच बेगानी हिन्दी

अपनों के बीच बेगानी हिन्दी


हर बर्ष १४ सितम्बर को देशभर में हिंदी दिवस एक बहुत बड़े पर्व की भांति सरकारी-गैर सरकारी और बड़े उद्योगों का मुख्य केंद्र बिंदु बनकर सप्ताह भर उनकी तमाम गतिविधियों में सावन-भादों के उमड़ते-घुमड़ते बादलों की तरह गरज-बरस कर सबको नख-शिख तक भिगोने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ता। इस दौरान हिंदी को बैकवाटर्स, काऊबेल्ट, हिन्टरलैंड आदि की संज्ञा से नवाजने वाले, भारतीय सभ्यता, संस्कृति और परम्परा के प्रति अविश्वास व उसे हेय दृष्टि से देखने वाले बुद्धिजीवी जब हिंदी दिवस को एक मंच पर आकर माँ भारती की प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाकर, धूप-दीप जलाकर उसका गुणगान और कीर्तन-भजन कर उसके पक्ष में प्रदर्शनी, गोष्ठी, सम्मलेन या समारोह आदि आयोजित कर हिंदी सेवियों को पुरस्कृत व सम्मानित करने का उत्क्रम जगह-जगह करते देखे जाते हैं तब ऐसे मनभावन दृश्य देखकर मन भ्रमित होकर सोच में डूबने लगता है कि क्या सचमुच अधूरे संकल्प से घोषित हमारी राष्ट्रभाषा के भाग तो नहीं खुल गए हैं? उसकी सच्ची प्राण-प्रतिष्ठा करने वाले पैदा तो नहीं हो गए हैं? लेकिन यह खुशफहमी अधिक समय तक नहीं टिक पाती है । १४ सितम्बर से शुरू हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़ा अगले कुछ ही दिन में किस समुद्र में पानी की बूंद की तरह समा जाता है, ढूँढना नामुमकिन हो जाता है ।  ऐसे में मुझे कभी स्कूल में पढ़ा कबीर दास जी का दोहा याद आने लगता है - 

"हेरत-हेरत हे सखी! रहा कबीर हिराय

बूंद समानी समुद्र में सो कत हेरी जाय । " 
और फिर अहमद फ़राज की पंक्तियों की तरह हिंदी नज़र आती है- 

"जिनके होंठों पर हँसी , पावों में छाले होंगे

वही चंद लोग तुम्हे चाहने वाले होंगे । " 
         राष्ट्रभाषा कहलाने वाली हमारी हिंदी की यह दशा देख यही आभास होता है कि १४ सितम्बर १९४९ को संविधान सभा द्वारा जो अनमने रूप से हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किया वह आज भी महज एक घोषणा भर दिखती है जिसमें संविधान के अनुच्छेद ३४३ में लिखा गया- "संघ की सरकारी भाषा देवनागरी लिपि में हिंदी होगी और संघ के सरकारी प्रयोजनों के लिए भारतीय अंकों का अन्तर्राष्ट्रीय रूप होगा,' किन्तु अधिनियम के खंड (२) में लिखा गया ' इस संविधान के लागू होने के समय से १५ वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता रहेगा, जिसके लिए इसके लागू होने से तुरंत पूर्व होता था" अनुच्छेद की धरा (३) में यह व्यवस्था कर दी गई- "संसद के उक्त १५ वर्ष की कालावधि के पश्चात विधि द्वारा (क) अंग्रेजी भासा का (अथवा) अंकों के देवनागरी रूप का ऐसे प्रयोजन के लिए प्रयोग उपबंधित कर सकेगी जैसे कि ऐसी विधि में उल्लिखित हो." इसके साथ ही अनुच्छेद (१) के अधीन संसद की कार्यवाही हिंदी अथवा अंग्रेजी में संपन्न होगी. २६ जनवरी १९६५ के पश्चात् संसंद की कार्यवाही केवल हिंदी (और विशेष मामलों में मातृभाषा) में ही निष्पादित होगी, बशर्ते संसद क़ानून बनाकर कोई अन्यथा व्यवस्था न करे । " 
          हिंदी १५ वर्ष उपरान्त अपने वर्चस्व को प्राप्त कर पाती, इससे पहले ही लोकतंत्र पर तानाशाही हावी हो गई और सन १९६३ में पंडित नेहरु ने राजभाषा अधिनियम में संशोधन करवा दिया- "जब तक भारत  का  एक भी राज्य हिंदी का विरोध करेगा हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहासनारूढ़ नहीं किया जाएगा । " इसी को दुष्परिणाम है कि हिंदी आज भी उत्तर (हिंदी पक्षधर) और दक्षिण (हिन्दी विरोधी) दो पाटों के बीच पिसती हुई स्वार्थी राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट अफसरशाही और चापलूसों के हाथों की कठपुतली बनी हुई है, जो प्रांतीयता की दुहाई देकर हिन्दी के विकास और समृद्धि के नाम पर अदूरदर्शिता और विवेकहीनता का परिचय देते हुए अरबों-खरबों रुपये खर्च कर हिन्दी प्रेम का प्रदर्शन कर इतिश्री कर रहे हैं ।        
        आज राजकीय सोच के दुष्परिणाम का ही नतीजा है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के अंग्रेजी कल्पवृक्ष के आगे जाने कितनी ही हिन्दी पत्र-पत्रिकाएं फल-फूलने से पहले ही दम तोडती नज़र आ रही हैं । इनकी चकाचौंध में चंदबरदाई,कबीर, सूर, तुलसी, जायसी आदि के राष्ट्रीय अस्मिता के जागरण एवं निमार्ण के उपाय लोग भूलते जा रहे हैं. वे भूलने लगे हैं कि ज्ञान-विकास व बौद्धिक स्तर, देशप्रेम सिर्फ अपनी भाषा से ही संभव होता है । इतिहास गवाह है किसी भी देश की अपनी राष्ट्रभाषा ने ही वहां मुर्दा रूहों में प्राण फूंककर बड़ी-बड़ी क्रांतियों को जन्म दिया. फ़्रांस,रूस के बाद गुलामी की जंजीरों में जकड़ी भारत माता को आज़ाद कराने में हिन्दी भाषा के अमूल्य योगदान को भला कौन भुला सकेगा, जिसके आगे तोप, तीर, डंडे या तलवार का जोर भी नहीं चल पाया । क्या आज कोई भारतीय भुला सकता है उन गीत उन नारों को जिनकी अनुगूंज से अमर वीर स्वतंत्रता सैनानी देशप्रेम के जज्बे में बंधकर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर "वन्दे मातरम् , भारत माता की जय, सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है कितना जोर बाजुए कातिल में है, तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा, स्वतंत्र मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा आदि गीत गाते-गाते स्वतंत्रता दिलाने समर में कूद पड़े आज भी चाहे वह लोकतंत्र को चलाने के लिए कोई भी चुनाव हो या भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना हजारे का आन्दोलन हो या बाबा रामदेव का 'काले धन वापसी' का देशव्यापी आन्दोलन या कोई अन्य धरना आदि बिना हिन्दी के यह सब पंगु ही साबित होंगे ।          

आओ हिंदी दिवस पर जरा गहन विचार करें कि क्या बात है जो विश्व के बड़े-बड़े समृद्धिशाली देश ही नहीं अपितु छोटे-छोटे राष्ट्र भी अपनी राष्ट्रभाषा को सर्वोपरि मानकर अपना सम्पूर्ण काम-काज बड़ी कुशलता से अपनी राष्ट्रभाषा में संपन्न कर तरक्की की राह चलते हुए अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं वहीँ दूसरी ओर सोचिये क्यों विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में अपनों की बीच उनकी राष्ट्रभाषा कहलाने वाली हिन्दी  अपना वर्चस्व कायम करने में आज तक असमर्थ बनकर अपनों के बीच आज पर्यंत बेगानी बनी हुई है?
  ...कविता रावत