नवरात्र-दशहरे  के रंग बच्चों के संग

नवरात्र-दशहरे के रंग बच्चों के संग

मार्कण्डेय पुराण के ‘देवी माहात्म्य‘ खण्ड ‘दुर्गा सप्तशती‘ में वर्णित शक्ति की अधिष्ठात्री देवी के नवरूपों शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिरात्री से सभी भलीभांति परिचित है। स्कन्दपुराण के ‘काली खण्ड‘ में इन्हीं नौ शक्तियों को शतनेत्रा, सहस्त्रास्या, अयुभुजा, अश्वारूढ़ा, गणास्या, त्वरिता, शव वाहिनी, विश्वा और सौभाग्य गौरी के नाम से तथा दक्षिणी भू-भाग में वनदुर्गा, जातवेदा, शूलिनी, शबरी, शान्ति, दुगा, लवणा, ज्वाला और दीप दुर्गा के नाम से जाना तथा पारम्परिक रूप से पूजा जाता है। 
जब गली-मोहल्ले और चौराहे   माँ की जय-जयकारों के साथ चित्ताकर्षक  प्रतिमाओं और झाँकियों से जगमगाते हुए भक्ति रस की गंगा बहा रहे हो, ऐसे मनोहारी सुअवसर पर भला वह कौन बच्चा होगा जो बाहर की इस दुनिया से बेखबर घर बैठकर शान्तिपूर्वक चुपचाप अपनी पढ़ाई-लिखाई कर घूमने-फिरने के लिए उतावला नहीं हो रहा हो। मेरे अपने अनुभव से ऐसे मौके पर बच्चे माँ-बाप के साथ बाहर का रंग-बिरंगा नजारा देखने की युक्ति बड़ी ही मासूमियत से निकालते हुए हम बड़ों को भी पीछे छोड़ देते हैं। कुछ ऐसा ही आजकल बच्चों की मासूमियत भरी बातों में आकर हर शाम ढ़लते ही ऑफिस  के बाद जल्दी से खाना पकाने-खिलाने के बाद उन्हें सारा शहर घुमाने-फिराने की अतिरिक्त ड्यूटी देर रात तक निभानी पड़ रही है। लेकिन यह ड्यूटी एक माँ को अपने बच्चों की खुशी की खातिर करनी ही पड़ती है, जो हमारा कर्त्तव्य  भी है। फिर यह तो माँ भगवती की इच्छा है यही सोचकर जब दिन भर की थकी हारी मैं बच्चों के साथ माँ के दर्शन को निकलती हूँ तो देशभर के प्रसिद्ध मंदिरों, तीर्थों, जहाँ तक पहुँच पाना अभी तक दुर्लभ था, उनकी शहर में सुलभ सौगात पाकर मैं अपने आप को धन्य समझती हूँ। बच्चों को कहीं झाँकी परिसर में अपने मनपंसद खेल-खिलौना भाते हैं, तो कहीं स्वादिष्ट व्यजंन ललचाते हैं।
एक तरफ जगह-जगह गरबा महोत्सव अपनी आकर्षक रंग-बिरंगी साज-सज्जा के साथ धूम मचा रहे हैं तो दूसरी ओर देवी जागरण के गीत बरबस ही अपनी ओर ध्यान आकृष्ट करने में किसी से भी पीछे नहीं हैं।  
अनूठी कलाकृतियों से सजी माँ के विभिन्न रूपों की जीवंत प्रतिमाओं और झाँकियों को देखते-देखते जी नहीं भरता। इनकी सुन्दरता व भव्यता देखकर इन्हें निर्मित करने वाले कलाकारों के लिए माँ से प्रार्थना के लिए बरबस ही मन पुकार कर उठता है कि हे माँ! इन पर सदैव यूँ ही अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखे।
झाँकियों में रामलीला के छोटे-छोटे, अलग-अलग प्रसंग देखकर मन बचपन में देखी रामलीला में डूबने-उतराने लगता है। जब नवरात्रि में 11 दिन तक गाँव-गाँव रामलीला की धूम मची रहती। देर रात तक रामलीला के रंग में रमे जब हम सुबह उनींदी आंखों से स्कूल जाते तो पढ़ते-पढ़ते कक्षा में निंदिया रानी सताने से बाज नहीं आती और बार-बार आँखों में उमड़ने लगती, जिसे देख जाने कितनी ही बार गुरुजी की कड़कड़ाती आवाज में खूब डाँट भी खानी पड़ती। पढ़ने-लिखने के साथ ही डाँट खाने पर विराम तभी लग पाता जब छुट्टी वाली घंटी की टन-टन-टन-टन की सुमधुर ध्वनि हम बच्चों के कानों को घनघनाकर गुरुजी तक नहीं पहुँच पाती। 
जल्दी घर भागने के चक्कर में हम झट से बड़ी लापरवाही से अपनी किताब-कापी बस्ते में उल्टी-सीधी ठूंसकर गुरुजी के मुँह से 'जाओ  अब छुट्टी है' सुनने के लिए उनकी तरफ ऐसे ताकने लगते जैसे खूँठे से बँधे नन्हें बछड़े अपनी बंधन मुक्ति के लिए करीब आते किसी इंसान को अपनी मासूमियत भरी नजरों से टकटकी लगाकर टुकुर-टुकुर ताकने लगते हैं। ऐसे अवसर पर कभी अगर गुरुजी ने देर लगाई तो फिर समझो 5-6 किमी की लम्बी पहाड़ी पगडंडियों पर चलते हुए अच्छे भले गुरुजी को रावण समझने की भूल कर हम सब बच्चे अपनी-अपनी तरफ से बुराई के इतने कसीदे गढ़ लेते जो घर आने के बाद भी अधूरे ही रहते। आज जब दशहरे के दिन बुराई के प्रतीक रावण के पुतले को धू-धू कर जलते हुए राख बनते देखती हूँ, तो बरबस ही आस-पास भीड़ भरे खुश होते चहेरों को टटोलते हुए इसमें खुश होने जैसा कोई राज ढूंढ़ने की कोशिश करती हूँ। लेकिन काफी सोच-विचार के बाद मन को निराशा ही हाथ लगती है। 
फिर जब बच्चों के खिले चेहरों की ओर देखती हूँ तो यही महसूस करती हूँ कि हम आज भी बच्चों जैसे उतने ही मासूम हैं जो तामसी और स्वार्थान्धता के विचारों के भेष में हमारे बीच घुल-मिलकर पलने-बढने वाली बुराईयों की ओर ध्यान न देते हुए हर वर्ष पुतलों को प्रतीक बनाकर फिर अगले वर्ष बुराईयों के बोझ तले दूसरे पुतलों को जलाने के लिए एक साथ मिलकर उठ खड़े होते हैं, जबकि वर्षभर इन बुराईयों के प्रति उदासीनता का रवैया अपनाते हुए कभी इस तरह एकजुट  नहीं हो पाते हैं!
     नवरात्र और दशहरा की शुभकामनाओं सहित!
.........कविता रावत

होंठों पर तैरती मुस्कान!

होंठों पर तैरती मुस्कान!

हर शासकीय अवकाश के दिन सरकारी कामकाज  के लिए दफ्तर पूरी तरह से बंद हों, इस बात का पता लगाना आम आदमी के लिए कोई हँसी खेल का काम तो कतई नहीं हो सकता शासकीय कैलेंडर और डायरी में अंकित अवकाश के दिन कुछेक अधिकारी व कर्मचारी कितनी सफाई और मुस्तैदी के साथ कुछ गैर-जरुरी कामकाज निपटाते हुए इनका सदुपयोग करते हैं, यह बात जानना साधारण किस्म के लोगों के बूते से बाहर की बात है ऐसे ही रविवार के एक दिन प्राकृतिक छटा से पूरित एक छोटे से शहर के  ऑफिस में उसका चौकीदार मुँह में अपना पसंदीदा गुटका दबाये सिगरेट के कश लगता हुआ बड़े बाबू  की आराम कुर्सी से चिपका बड़े बाबू बनने के सुनहरे सपनों में खोया गोते लगाने में मग्न था  एकाएक बड़े साहब की जीप की खड़खड़ाहट के साथ तेज हार्न ने उसके सपनों पर जैसे पानी फेर दिया। वह हड़बड़ाकर ऑफिस बंद किए ही गेट की ओर भागा। साहब अकेले नहीं थे उनके साथ बड़े बाबू जी भी बैठे थे जो किसी बात पर मंद-मंद मुस्कराते नजर आ रहे थे। कहीं ऑफिस खुला देख साहब और बड़े बाबूजी नाराज न हो जाए इसलिए उसने जल्दी से सलाम ठोंकते हुए गेट खोला और जीप के अंदर घुसते ही जल्दी गेट बंद कर ऑफिस की ओर लपका। उसको यूं हड़बड़ी में भागते देख बड़े साहब और बाबू जी ने एक साथ आवाज लगाई- ‘'क्यों! क्या हो गया?'‘ जिसे सुन उसके कदम वहीं ऑफिस के दरवाजे पर ठिठक गए। उसका मन आंशकित हो उठा कि कहीं ऑफिस खुला देख डांट-फटकार न खानी पड़े। लेकिन ऐसी कोई नौबत आने के पहले ही बिजली गुल हो गई जिससे उसने गहरी राहत की सांस लेते हुए मन ही मन बिजली विभाग को तहे दिल से धन्यवाद दिया। 
          गर्मी बहुत थी इसलिए आफिस के अंदर बैठ पाना मुश्किल था, इसका भान होते ही बड़े बाबू जी ने चौकीदार  को दो कुर्सियाँ निकालकर वहीं बाहर आम के पेड़ की छांव में लगाने का फरमान जारी किया। चौकीदार तो जैसे पहले से ही इसके लिए तैयार खड़ा था वह फौरन दो कुर्सियां लगाकर ऑफिस से ट्रे में दो गिलास रखकर पानी लाने के लिए पास के हैंडपंप की ओर भागा और फौरन पानी पिलाते हुए चाय का कहकर गेट के बाहर खड़े चाय के ठेले की ओर कूच कर गया। उसकी फुर्ती देख बड़े साहब ने बड़े बाबू की ओर मुस्कराते हुए चुटकी ली- ‘"भई बहुत ट्रेंड कर रखा है आपने इसे! " इस पर बड़े बाबू जी भी सिर हिलाते हुए "जी सर" कहकर सगर्व मुस्करा उठे। 
          अब हर दिन ऑफिस के कामकाज और बातों में भला किसका मन रमता है। वे कर्मचारी विरले किस्म के जीव होते हैं जो हर समय ऑफिस-ऑफिस खेलकर खुश हो लेते हैं । बड़े साहब और बड़े बाबू जी भी ऑफिस की कुछ छोटी-मोटी बातों को दरकिनार करते हुए देश-दुनिया की बातों में रम गये। देश की राजनीति से लेकर आम आदमी की बिगड़ती दशा-दिशा पर दोनों ने खूब दिल खोलकर अपने-अपने विचारों का जमकर  आदान-प्रदान करने में कोई कोर-कसार बाकी नहीं छोड़ना गवारा नहीं समझा । दोनों महानुभावों के बीच चबूतरे पर बैठा एक बेचारा चौकीदार ही था जो उसमें शिरकत करने में सर्वथा असमर्थ था। बहरहाल वह एक आम अदने भले इंसान की तरह यह सोचकर कर एक अच्छा श्रोता बन चुपके से उनको सुन रहा था कि अवसर आने पर वह भी अपनी बिरादरी के बीच बैठकर जिस दिन यह सब पका-पकाया लम्बा-चौड़ा भाषण सुनायेगा तो उस दिन उसकी भी खूब वाहवाही होनी तय है और कुछ नहीं तो तब भी लोग उसे अपने मोहल्ले का नेता तो देर-सबेर बना ही लेंगे। फिर मुझे भला माननीय बनने में भला देर कितने लगने वाली ....  इधर वह इसी उधेड़बुन में अपनी दुनिया में खो गया तो उधर आम आदमी के लिए चिन्तित होकर हैरान-परेशान होते हुए बड़े साहब का ध्यान आम की घनी पत्तियों के ओट में छुपी हुई लटकती कैरियों पर जा अटकी, जिसे देख उनके होंठों पर हल्की मुस्कान तैरने लगी वे विषय परिवर्तन करते हुए बड़े बाबू जी की ओर मुखातिब हुए- ‘"क्यों? बड़े बाबू! इस वर्ष लग रहा है आम की पैदावार कुछ ज्यादा है।"  "जी सर! मुझे भी ऐसा ही लगता है।" बड़े साहब की मंशा भांपते हुए पेड़ का मुआयना करते हुए बड़े बाबू जोश में बोले। 
          "लेकिन इस पेड़ के आम पककर कहाँ जाते है? मुझे तो आज दिन तक कभी इसकी खबर तक नहीं हुई।" बड़े साहब ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए जैसे स्पष्टीकरण मांगा डाला।
        "सब बन्दर खा जाते हैं सर!"‘ बड़े बाबू जी ने भी तपाक से स्पष्टीरकण ऐसे दिया जैसे यह तो उनके रोजमर्रा का बाएं हाथ का खेल हो। 
        "बन्दर!"  यह बात हज़म न कर पाने की स्थिति में सहसा बड़े साहब की भौंहों पर बल पड़ा। जिसे देख बड़े बाबू जी पहले कुछ असहज हुए लेकिन जल्दी ही इत्मीनान से "जी सर! " कहकर मौन हो गए। 
       "उफ! ये कम्बख्त बन्दरअब देखो न! कितनी अच्छी कैरियां हैं! इनका तो बहुत अच्छा अचार बन सकता है? क्यों बड़े बाबू?"  कैरियों पर ललचाई दृष्टिपात करते हुए साहब ने बड़े बाबू के चेहरे पर अपने निगाहें जमा ली। 
        "जी सर! अभी तुड़वा लेता हूं।" बड़े बाबू जी को बड़े साहब की मन की बातें पढ़ने में कोई देर नहीं लगी। उन्होंने तुरन्त चौकीदार को एक भारी भरकम आवाज लगाई- 
        "अबे! सो गया क्या? कहाँ खो गया?  "कहीं नहीं सर!" उधर से एक मरियल सी  आवाज बाहर निकली। 
सुन! पेड़ पर तो चढ़ना आता हैं न?"  बड़े बाबू ने आम के पेड़ पर सरसरी निगाह डालते हुए कहा। "जी सर" ‘चौकीदार ने जैसे ही बड़े आत्मविश्वास से कहा बड़े बाबू ने अविलम्ब हुक्म फरमाया- "तो फटाफट पेड़ पर चढ़कर बड़े साहब के लिए कुछ कैरियां तोड़ ला! देखता नहीं कितनी अच्छी कैरियां हैं, अचार डालना है।" चौकीदार ‘जी सर' कहते हुए ऑफिस से एक थैला लाकर बड़ी फुर्ती से बन्दर की तरह फटाक से पेड़ पर चढ़ गया और दूर-पास लगी कैरियां तोड़कर थैला भरने लगा था। बड़े साहब और बड़े बाबू ‘संभल-संभल कर तोड़ना! शाबास! शाबास!' कहकर उसका हौंसला अफजाई तब तक करते रहे जब तक वह थैला भरकर नीचे नहीं उतर गया। बड़े साहब के सामने बड़े बाबू जी ने कैरियों का अच्छी तरह से निरीक्षण-परीक्षण कर अपनी टीप प्रस्तुत की तो बड़े साहब ने भी सहर्ष "ओके"‘ करते हुए जीप में रखने के लिए चौकीदार को आर्डर देने में कोई देर नहीं लगाई। थैला जीप पर लद गया यह देखकर बड़े साहब को ऑफिस के आँगन में फलते-फूलते  आम के पेड़ को देख अपार प्रसन्नता की अनुभूति हुई, उनके चेहरे पर आत्मतृप्ति के भाव उभरते देर नहीं लगी, जिन्हें पढ़ने में माहिर बड़े बाबू फूले न समाये। 
          दोपहर में गर्मी तेज हुई तो बड़े साहब ने घर चलने की इच्छा जाहिर की तो बड़े बाबू जी 'जी चलिए' कहते हुए उठ खड़े हुए और दोनों गप्पियाते हुए निकल पड़े। साहब का बंगला ऑफिस के नजदीक था जैसे ही उनका बंगला आया और वे उतरने लगे तो बड़े बाबू जी ने सकुचाते हुए कुछ दबी जुबाँ से कहा -"सर! एक निवेदन था आपसे!"   "हाँ!हाँ! बोलिए! क्या बात है?"  साहब बड़े बाबू के चेहरे पर नजर डालते हुए मुस्कराते हुए बोले तो बड़े बाबू जी को तसल्ली हुई और वे धीरे-धीरे बोले- "सर! कल भी छुट्टी है, यदि आपका कोई प्रोग्राम न हो तो मुझे कल शाम तक के लिए जीप चाहिए थी।"  "क्यों! कुछ खास काम है क्या? साहब ने जानना चाहा तो बड़े बाबू थोडा अटक-अटक कर बोले- ‘"सर! कल हमारे एक निकट संबंधी के घर सगाई है.. बस उसमें शामिल होने के लिए हमारे घर वालों  ने आज शाम का प्रोग्राम बनाया है" आपकी इज़ाज़त मिल जाती तो .... बड़े बाबू जी अटके तो बड़े साहब "चलिए ठीक है, अभी बताता हूँ।"‘ कहते हुए बंगले के अंदर घुस गए। बड़े बाबू जी को समझते देर नहीं लगी  कि साहब जरूर मैडम से पूछकर ही जवाब देने की स्थिति में आ पाएंगे। यह सोचकर वे थोड़े मायूस हुए कि कहीं मैडम जी का कुछ काम निकल आया तो फिर निश्चित ही उनके घर वालों का बना बनाया प्रोग्राम बिगड़ जाएगा और इसके लिए उन्हें भी अपने घरवालों की अलग से कुछ न कुछ दो-चार बातें जरूर सुननी को मिलेगी, जो उन्हें हरगिज गंवारा नहीं था। और भला गंवारा क्यों हो रिश्तेदारी में इन सबसे नाक जो कुछ  ऊँची दिखने लगती है ....  हाँ  या  न, का गुणा-भाग चल रहा था कि साहब एकाएक दरवाजे पर प्रकट हुए और "हाँ ठीक है बड़े बाबू जी, ले जाइए।" कहते हुए अंतर्ध्यान हो गए। बड़े बाबू जी की जैसे ही मुराद पूरी हुए वे फौरन "थैक्यू यू सो मच सर! " कहते हुए पिछले सीट से उचकते हुए अगली सीट पर प्रमोट होकर जा बैठे। ड्राइवर अब तक बड़े बाबू जी की जुगत के पैंतरे समझ चुका था और वह भी आज अपना कोई न कोई पेंच लगाकर अपना कोई न कोई जुगाड़ भिड़ा देगा यह सोच वह बड़े बाबू जी के कहने से पहले ही फ़ौरन चल दिया। घर पहुंचकर जैसे ही जीप की आवाज बड़े बाबू जी के घरवालों के कानों में गूंजी वे खुशी-खुशी उछलते हुए स्वागत के लिए घर से बाहर निकल पड़े।  पर ड्राइवर को शाम को जल्दी आना कहकर जैसे ही बाबू जी ने घर के दरवाजे की ओर कदम बढ़ाये ही थे कि ड्राइवर यह कहकर अड़ गया कि कल मुझे घर पर काम है, इसलिए मैं नहीं चल सकूंगा। बड़े बाबू जी ने जैसे यह सुना पहले तो उन्हें थोड़ा गुस्सा आया कि बड़ी मुश्किल मैं जुगाड़-तुगाड़ कर गाड़ी का इंतजाम कर पाता हूं ऊपर से यह ड्राइवर का बच्चा भी जब तब भाव खाने लगता है। खैर वे ड्राइवर के मंसूबें भांप गए इसलिए उन्होंने उसे चुपके से उसकी मुगली घुट्टी का पक्का इंतजाम का वादा किया तो वह सहर्ष चलने को तैयार हो गया।
         शाम को नियत समय पर जीप आ पहुंची। घरवाले सभी तैयार खड़े थे। बड़े बाबू के साथ ही घरवाले बड़े साहब की मेहरबानी से बस के उबाऊ सफर से बच निकले इसलिए उन सबकी आंखों में रौनक और चेहरे पर लाली छाई हुई थी। ड्रायवर भी खुश था कि उसका भी दोनों दिन का खाने-पीने का जुगाड़ बड़े बाबू जी की कृपा से पक्का है। सूरज लालिमा लिए हुए ढ़लने लगा। जीप शहर से होकर गांव की सड़क पर सरपट भागी जा रही थी। बड़े बाबू जी अगली सीट पर बड़े सुकून से बैठे कभी बीबी-बच्चों से गप्पिया रहे थे तो कभी बीच-बीच में सड़क के किनारे लगे आम के पेड़ों पर लगी कैरियों के देख मंद-मंद मुस्कराए जा रहे थे जिससे  उनके होंठों पर मुस्कान तैर रही थी।

                     ...कविता रावत