फाख्ता का घर-परिवार

फाख्ता का घर-परिवार

कभी जब घर आँगन, खेतिहर जमीनों में, धूल भरी राहों में, जंगल की पगडंडियों में भोली-भाली शांत दिखने वाली फाख्ता (पंडुकी) भोजन की जुगत में कहीं नजर आती तो उस पर नजर टिक जाती। उसकी भोलेपन से भरी प्यारी सूरत देखकर उसे पकड़कर अपने पास रखने को मन मचल उठता तो उसके पीछे-पीछे दबे पांव चल देते। वह भी हमें पास आता देख मुड़-मुड़ कर टुक-टुक-टुक कर दाना चुगते हुए तेजी से आगे बढ़ जाती। इससे पहले कि हम उसके करीब पहुंचकर झपट्टा मारकर उसे पकड़ने की नाकाम कोशिश करते, वह फर-फर कर उड़ान भरकर जैसे यह कहते हुए फुर्र हो जाती कि- "फिर कभी संग चलूंगी तुम्हारे! जरा अभी दाना-पानी में व्यस्त हूँ।"
         आज 30 बरस बाद जब घर की खिड़की से लटके टीवी एन्टिना पर फाख्ता का घरौंदा देख रही हूं तो मन खुशी से आश्चर्यचकित है। अभी साल भर ही तो हुआ है हमें अपने इस नए घर में रहते हुए, लेकिन इस दौरान तीन बार उसी एक ही घौंसले में फाख्ता ने भी अपना घर परिवार बसा लिया है। अभी दो बार फाख्ता के चार बच्चों को पलते-बढ़ते देखना मुझे और मेरे परिवार को बहुत सुखकर लगा। अब तीसरी बार फिर जब उसी घरौंदे में उसे 2 सफेद झक अंडों को सेंकती देख रही हूं तो एक अचरज भरी खुशी से झूम उठती हूं कि निश्चित ही उसे भी मेरे घर के पास रहना सुरक्षित लगता होगा!  मेरे घर के सदस्यों में उसे कुछ तो अपनापन झलकता होगा  तभी तो वह भी बेफिक्र होकर मेरे घर के एक हिस्से पर  अधिकार भाव से अपना घर-परिवार बसाती चली आ रही है।  
          जब कभी छुट्टी के दिन भरी दोपहरी में एक साथ 2-3 फाख्ताओं की "टुटरू की टुर्र-टुर्र टुर्र-टुर्र" सी   प्यारी ममता भरी आवाज मेरे कानों में गूंजती है तो मुझे आभास होता है जैसे मैं गर्मियों के दिन जंगल में कहीं छोटे-छोटे झबरीले-रौबीले चीड़ की छांव में आराम से बैठी उसकी टहनियों में छिप कर बैठी फाख्ताओं (स्थानीय बोली में घुघुता-घुघती) की धुन में रमी हुई हूँ। उनकी लरजती -खनकती ममतामयी बोली में मुझे अपना वह  प्रिय लोकगीत याद आने लगता है जिसमें मायके से दूर ससुराल में रह रही कोई नई नवेली दुल्हन व्याकुलतावश मायके को याद कर अपना दुःखड़ा फाख्ता को सुनाने बैठ जाती है- 
  "ना बांस घुघती चैत की, खुद लगी च मां मैत की।"
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 "घुघुती घुरौण लैगे मेरा मैत की, बौडि़-बौडि़ ऐगे ऋतु चैत की"
आजकल जब ऑफिस  निकलती हूँ तो बच्चों को नानी के घर छोड़ आती हूँ। पहले तो उन्हें मौसी का घर अच्छा लगता था लेकिन जैसे ही स्कूल की छुट्टियाँ लगी उनको नानी का घर कुछ ज्यादा ही प्यारा लगने लगा और लगे  भी क्यों नहीं आखिर वहाँ उन्हें नानी के लाड़ दुलार के साथ-साथ अच्छी-अच्छी चीजें खाने-पीने को तो मिलती ही हैं साथ ही टीवी पर अपनी पंसद का कार्टून देखने,  कम्प्यूटर पर इंटरनेट में नये-नये गेम खेलने का मुफ्त में लायसेंस जो मिल जाता है!  मैं जब ऑफिस में होती हूँ तो दिन में एक-दो बार जरूर फोन लगाकर हाल-चाल पूछकर बच्चों की चिन्ता से मुक्त हो लेती हूँ लेकिन इस बीच आंखों में घर के एन्टिना पर बड़ी शांतिपूर्वक घौंसले में बैठी मासूम फाख्ता अंडों को सेंकती नजर आने लगती है। इसी चिन्ता में मैं कभी-कभी भगवान से प्रार्थना करने बैठ जाती हूँ कि वह उन्हें सपरिवार सलामत रखे और जब अंडों से बच्चे बाहर निकल आयें तो उन्हें भी जल्दी से बड़ा कर दें, ताकि वे हमेशा मेरे बगीचे, घर-आंगन में रहकर मेरे करीबी बने रहें। इसी सोच विचार के चलते जब शाम को बच्चों को लेकर जैसे ही घर पहुंचती हूँ  तो घर का ताला बाद में खोलती हूँ पहले फाख्ता का घर परिवार देख चिन्ता मुक्त हो लेती हूँ।
जब-जब मैं उसे बड़ी आत्मीयता से देखती हूँ तब-तब मुझे महसूस होता है जैसे वह भी उसी तन्मयता से मुझे अपनी प्यारी ममता भरी मासूम नजर से निहार रही है, जिसे देख मेरा मन आत्मविभोर हो उठता है और इससे मेरे घर में एक खुशी की लहर दौड़ने लगती है।
        ...कविता रावत


 

परशुराम-लक्ष्मण संवाद प्रसंग

परशुराम-लक्ष्मण संवाद प्रसंग


परशुराम जयंती के के लिए जब सम्पूर्ण ब्राह्मण समाज ने शासन का आभार व्यक्त किया तो मेरे मन में भी कभी रामलीला के एक दृश्य में सीता स्वयंवर के समय परशुराम-लक्ष्मण संवाद चलचित्र स्मृतिपटल पर उभरने लगा। जब रामचन्द्र जी ने घनुष भंग किया तो इससे कुपित होकर परशुराम जी क्रोध में आग बबूला होकर हाथ में अपना फरसा लहराते हुए मंच पर आकर स्वयंवर में आए सभी उपस्थित राजा-महाराजाओं को ललकारते हुए सचेत करते हैं कि जिसने भी उनके गुरुदेव का धनुष भंग किया है वह सहस्त्रबाहु के समान ही मेरा शत्रु है।  यह सुनकर श्रीराम उनसे विनयपूर्वक कहते हैं -
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
यह सुनते ही परसुराम जी क्रोधित हो कहते हैं-
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥

इतना सुनते ही जब उपस्थित राजा-महाराजा डर के मारे थर-थराकर कांपते हुए भाग खड़े होने लगते तो हम बच्चों का भी डर के मारे गला सूखने लगता, हाथ-पैर कांपने लगते और आंखे भी डर के मारे बन्द हो जाया करती।  इसके बाद जब लक्ष्मण का परशुराम जी से गर्मागर्म संवाद चलता तो बीच में रामचन्द्र जी उन्हें शांत करने की कोशिश करते तो वे बड़े आत्मीय होकर कहते-
‘हे राम तू तो बहुत शांत है लेकिन तेरा यह भाई बड़ा दुष्ट है।‘ यह सुन  शांतचित्त होकर श्रीराम कहते- 
नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू ।। 
जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना । तौ कि बराबरि करत अयाना ।। 
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं।।  
करिअ कृपा सिसु सेवक जानी । तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी ।। 
यह सुनकर जैसे ही परशुराम जी अपना परसु लक्ष्मण को दिखाते हुए समझाना चाहते हैं, तो लक्ष्मण उन्हें चिढ़ाकर कहते हैं -
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी॥
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू॥

 यह देख क्रोध  से परसुराम जी कहते हैं -
‘यह बच्चा नहीं जहर की बेल है, समझा है इसने मेरे लिए कोई खेल है।‘
इस पर लक्ष्मण भी बिगड़कर कहते-
 ‘तो लक्ष्मण भी कोई तमाशा नहीं, जो मुंह में डालो बताशा नहीं।‘‘  
इसी तरह बहुत देर तक लक्ष्मण-परशुराम संवाद जारी रहता। लक्ष्मण कभी क्रोध से तो कभी बड़े ही भोलेपन से विभिन्न भाव-भंगिमाओं के माध्यम से परशुराम जी से हास-परिहास करने लगते, जो देखते ही बनता था-   
एही धनु पर ममता केहि हेतु। सुनि रिसाइ कह भृगुकुल केतू।।
जौं अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिउ कोउ बड़ गुनी बोलाई।।

तब रामलीला हमारे लिए केवल शुद्ध मनोरंजन भर से अधिक कुछ न था। उसमें निहित कथा प्रसंग, संवाद आदि के बारे में जानना-समझना हमारे बूते की बात नहीं थी। आज इस कथा से जुड़े कई रहस्य और संवाद नए अर्थ देते हैं।
इसी प्रसंग में कहा जाता है कि  हैहय वंशी राजा सहस्त्रबाहु ने परशुराम जी के पिता महर्षि जमदग्नि का वध इसलिए कर दिया था क्योंकि महर्षि ने राजा को अपनी कामधेनु देने से मना कर दिया था। जब परशुराम जी ने अपनी मां रेणुका को 21 बार अपनी छाती पीटकर करुण क्रन्दन करते देखा तो वे ये देखकर इतने द्रवित हुए कि उन्होंने प्रण किया कि मैं पृथ्वी को क्षत्रिय रहित कर दूंगा। इसी कारण उन्होंने सहस्त्रबाहु के साथ ही 21 बार अपने फरसे से पृथ्वी को क्षत्रिय रहित कर दिया। माना जाता कि इन क्षत्रियों से प्राप्त अस्त्र-शस्त्र, धनुष-बाण, आयुध आदि का कोई दुरूपयोग न हो इसके लिए धरती ने मां का तथा शेषनाग ने पुत्र का रूप धारण किया और वे परशुराम जी के आश्रम में गए। जहां धरती मां ने अपने पुत्र को उनके पास कुछ दिन रख छोड़ने की विनती की  जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया  जिस पर धरती मां ने यह वचन लिया कि यदि मेरा बच्चा कोई अनुचित काम कर बैठे तो आप स्वभाववश कोई क्रोध नहीं करेंगे, जिसे परशुराम जी ने मान लिया। एक दिन उनकी अनुपस्थिति में धरती पुत्र बने शेषनाग ने सभी अस्त्र-शस्त्र, धनुष-बाण, आयुध आदि सब नष्ट कर दिए। जिसे देख परशुराम जी को पहले तो क्रोध आया लेकिन अपना वचन याद कर वे कुछ भी नहीं बोले। क्योंकि लक्ष्मण को शेषनाग का अवतार माना जाता है इसलिए वे परशुराम जी को सीता स्वयंवर के समय याद दिलाते हुए कहते हैं- 
‘बहु धनुहीं तोरी लरिकाई। कबहुं न असि रिस कीन्हि गुसाईं।।
मान्यता है कि नौ गुणों शम, दम, तप, क्षमा, शौर्य, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता से सम्पन्न भगवान परशुराम अन्तिम बार पृथ्वी को क्षत्रिय रहित करने के बाद सम्पूर्ण पृथ्वी को ऋषि कश्यप को दान देकर उनकी आज्ञा से समुद्र स्थित महेन्द्र पर्वत पर रहने लगे। उन्हें भी हनुमान, अश्वथामा, बलि, कृपाचार्य, व्यास और विभीषण की तरह ही अमर माना जाता है।

सबको मातृ दिवस एवं परशुराम जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ.....कविता रावत