संत कबीर

संत कबीर

       "यहु ऐसा संसार है, जैसा सेमर फूल।
        दिन दस के ब्यौहार कौं, झूठे रंग न भूल।।"

        दस दिन के जीवन पर मानव नाहक ही मिथ्या अभिमान करता है। वह भूल जाता है कि जीवन तो सेमल के फूल के समान क्षणभंगुर है, जो रूई के समान सब जगह उड़ जाता है। इसलिए-
"काल्ह करै सो आज कर, आज करै सो अब।
पल में परलय होयगी, बहुरि करैगो कब।।"

मानव को दुष्कर्म टालते हुए सत्कर्म यथाशीघ्र पूरा कर लेना चाहिए। क्योंकि काल का कोई भरोसा नहीं, कब प्रलय आ जाए और वह कुछ अच्छा किए बगैर ही काल के गाल में समा जाए। ऐसी ही जीवन और जगत की यथार्थता का बोध कराते हुए मानव जीवन को सार्थकता की दिशा में ले जाने वाले संत कबीर का जन्म काशी में एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से होना माना जाता है। कहा जाता है कि काशी में स्वामी रामानंद ने भूलवश अपने एक ब्राह्मण भक्त की विधवा कन्या को पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया जिसके फलस्वरूप संत कबीर का जन्म हुआ किन्तु लोकलाज के भय से उस ब्राह्मण कन्या ने बालक को लहरतारा नामक तालाब के किनारे छोड़ दिया, जिसे नीमा और अली या नीरू नाम के निःसंतान जुलाहा अपने घर ले आये और उसका लालन-पालन किया। कबीर का जन्म सन् 1398 ई. के लगभग माना जाता है। कहते हैं कबीर बचपन से ही हिन्दू भाव से भक्ति करने लगे थे। 'राम नाम' जपते हुए वे कभी-कभी माथे पर तिलक भी लगा लेते थे। उन्हें स्वामी रामानंद के शिष्य के साथ ही प्रसिद्ध सूफी मुसलमान फकीर शेख तकी का भी शिष्य माना जाता है।
देशाटन करने के कारण उनका हठयोगियों तथा सूफी मुसलमान फकीरों से सत्संग हुआ तो उनका ’राम’ धनुर्धर साकार राम न होकर  ब्रह्म के पर्याय बन गए-
"दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना।
राम नाम का मरम है आना।।"

कबीर की बानी ‘निर्गुण बानी‘ कहलाती है। वे रूढि़यों के विरोधी थे। अंधविश्वास, आडम्बर और पाखण्ड का उन्होंने जिस निर्भीकतापूर्वक और बेबाक ढंग से विरोध करने का साहस दिखाया वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने कर्मकाण्ड को प्रधानता देने वाले पंडितों और मुल्लों दोनों को खरी-खरी सुनाई-
‘‘अपनी देखि करत नहिं अहमक, कहत हमारे बड़न किया।
उसका खून तुम्हारी गरदन, जिन तुमको उपदेश दिया।।
बकरी पाती खाति है, ताको काढ़ी खाल।
जो नर बकरी खात है, जिनका कौन हवाल।।"

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"है कोई गुरु ज्ञानी जगत महँ उलटि बेद बूझै।
पानी महँ बरै, अंबहि आँखिन्ह सूझै।

कबीर का साम्प्रदायिक सद्भव आज भी हिन्दू-मुस्लिम एकता का संदेश दे रहा है-
‘हिन्दू-तुरूक की एक राह है, सतगुरु इहै बताई।
कहै कबीर सुनो हे साधे, राम न कहेउ खुदाई।।"

आज हमारा जीवन राजनीति और समाजनीति के दो पहलुओं के बीच  " 'कबीर' आप ठगाइये, और न ठगिये कोय। आप ठगे सुख ऊपजै, और ठगे दुख होय।।की तर्ज पर झूल रहा है। राजनीति के साथ समाज के हरेक व्यक्ति का कहीं न कहीं से व्यावहारिक संबंध जुड़ा हुआ है। राजनीति से परे आज साधु-संन्यासी भी दूर-दूर तक कहीं नजर नहीं आ पाते, ऐसे में यदि आज कबीर जीवित होते तो निश्चित वे अपनी वाणी से सामाजिक वैषम्य, असामंजस्य, अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता, अनीति और अन्याय के प्रति विद्रोह प्रकट कर राजनीति के छल-कपट, वोट-नीति, फूट डालो और राज्य करो की नीति, व्यक्तिवाद की वर्चस्वता, प्रजातंत्र की आड़ लेकर राजतंत्र के कृत्य, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के प्रति जनता को सचेत कर उनमें जान फूंक देते जिससे स्वस्थ्य राष्ट्र का निर्माण हो उठता।
[चित्र गूगल से साभार]  

 .....कविता रावत

शिंगणापुर के शनिदेव

शिंगणापुर के शनिदेव

कई वर्ष बाद इस वर्ष 8 जून को शनिवार के दिन शनि जयंती का संयोग बना है। इसी दिन शिंगणापुर की यात्रा के वे पल याद आ रहे हैं जब हम पहली बार सांई बाबा के दर्शन कर सीधे शनिदेव के दर्शन के लिए शिंगणापुर पहुंचे। यह सौभाग्य ही है कि यह मेरा जन्मदिन भी है। ऐसी मान्यता है कि जो पहली बार सांई बाबा के दर्शन करने जाता है उसे शनिदेव के भी दर्शन हेतु शिंगणापुर जरूर जाना चाहिए तभी बाबा की कृपा होती है और यात्रा का उद्देश्य पूर्ण होता है। शिर्डीधाम से लगभग 70 कि.मी. दूरी तय करने के बाद शनि शिंगणापुर पहुँचकर मुझे ज्ञात हुआ कि सूर्यदेव और माता छाया के पुत्र शनिदेव का जन्मस्थान यही है। बहुत से लोग शनिदेव को अनिष्टकारी देव मानकर उनकी पूजा अर्जना कम उनसे बचने के उपाय ज्यादा ढूंढ़ने-फिरने के फिराक में खुद ही उलझकर रह जाते हैं, जबकि बहुत से ज्योतिषियों का मत है कि शनिदेव स्वभाव से गंभीर, हठी, क्रोधी किन्तु न्यायप्रिय देव तथा हनुमान और कालभैरव के प्रिय सखा हैं। विधि विधान से उनकी आराधना करने पर वे अन्य देवताओं के मुकाबले बड़ी जल्दी प्रसन्न होकर अपने भक्तों को मनोवांछित फल देने में सबसे आगे रहते हैं। यही कारण है कि दूर-दूर बसे देश-विदेश के लोग उनके दर्शन करने यहाँ दौड़े चले आते हैं। यहाँ पहुंचकर मेरे मन को भी बहुत आत्मीय संतोष मिला। यहाँ दुकानों में पहले से ही टोकरियों में शनिदेव की पूजा का सामान सजा रहता है जिसे खरीदने पर दुकानदार खुद ही पूजा विधि समझा देता है। यहाँ आकर मुझे एक और सबसे अच्छी बात यह लगी कि जहाँ पहले इस मंदिर में केवल पुरुषों को ही निर्धारित वस्त्र पहनकर दर्शन करने की अनुमति दी जाती थी वहीं अब ऐसा कुछ भी नहीं है। अब पुरुषों की तरह ही उनके साथ-साथ स्त्री भी बेरोक-टोक इस मंदिर में पूजा-दर्शन करती हैं। खुले चबूतरे पर शनिदेव की काले पत्थर की लगभग साढ़े पांच फीट ऊँची और डेढ़ फीट चौड़ी मूर्ति स्थापित है जिस पर पुजारी लगातार पहले तेल और बाद में पानी से नहलाने में लगा रहता है, जो कि मनोहारी दृश्य होता है। हमें भी पूजा विधान के अनुसार पहले त्रिशूल पर मदार के पत्ते चढ़ाने फिर नारियल, फूल और अंत में तेल चढ़ाकर शनिदेव की पूजा-दर्शन कर बड़ी आत्मसंतुष्टि मिली।
दुनिया भर में प्रसिद्ध शनि शिंगणापुर की वह विशेषता जिसमें यहाँ के घरों में दरवाजे नहीं होने का जिक्र मिलता है, जिसे प्रत्यक्ष देखकर सुखद अहसास हुआ। यहाँ के लोगों की मान्यता है कि यहाँ कोई कुछ भी चुरा नहीं सकता है क्योंकि अगर किसी ने यह हिमाकत की तो तुरन्त शनिदेव उस पर कुपित होकर दंडित कर देते हैं। इसी दृढ़ विश्वास के चलते यहाँ पुराने बने सभी घरों में मुझे कोई दरवाजे नजर नहीं आए।  हालांकि अब जो नए मकान-दुकान बन रहे थे उनमें अधिकांश में दरवाजे लगाये जा रहे थे। शहर की चकाचैंध से दूर बसा शनि शिंगणापुर निश्चित ही दूर-दूर से आने-जाने वाले भक्तजनों/दर्शकों के लिए एक सुन्दर मनभावन स्थान है, जहाँ पहुँचकर निश्चित रूप से सुकून महसूस किया जा सकता है।
शिंगणापुर से वापस शिर्डी आते समय मुझे इक्के-दुक्के खेतों में गन्ने की फसल के अलावा दूर-दूर तक कुछ भी हरा-भरा नजर नहीं आ रहा था। हाँ अगर कुछ दिखाई दे रहा था तो वह सड़क किनारे लगभग हर 2 कि.मी. दूरी पर गन्ने की रेहडि़यां दिखाई दे रही थी, जिन पर लकड़ी से बने कोल्हू पर जुता बैल धीरे-धीरे घूमता नजर आ रहा था जिससे कोल्हू से गन्ने का रस बाहर निकल रहा था जिसे  गर्मी से हाल-बेहाल आने-जाने वाले लोग गले में उतार कर राहत महसूस कर रहे थे। इस तरह कोल्हू से गन्ने का रस निकलते देख मुझे अपने गांव का वह सरसों पेरने के लिए बनी लकड़ी के कोल्हू याद आने लगा, जिसको बैल नहीं बल्कि आदमी चलाये करते थे। जब उत्सुकतावश हम बच्चे भी कभी-कभार खेलते-कूदते मस्ती में दो-दो की जोड़ी बनाकर उसे ढेलकर घुमाने में जुत जाते थे तब हमें बड़ा मज़ा आता था। इसके साथ ही जिस व्यक्ति का वह कोल्हू होता था, उसे भी एक तरह से मदद मिल जाया करती थी जिसके कारण वह भी हमारे साथ-साथ खुश हो लेता था। अब तो गाँव में यह सब जाने कब से एक भूली-बिसरी दास्तां बनकर रह गई है।
   .....कविता रावत

दूर-पास का लगाव-अलगाव

दूर-पास का लगाव-अलगाव


कोई सेब अपने पेड़ से बहुत दूर नहीं गिरता है।

बछड़ा अपनी माँ से बहुत दूर नहीं रहता है।।


दूर का पानी पास की आग नहीं बुझा सकता  है।

मुँह मोड़ लेने पर पर्वत भी दिखाई नहीं देता है।।


दूर उड़ते हुए पंछी के पंख बहुत लुभावने होते हैं।

किसी सुंदरी के केश दूर से घने दिखाई देते हैं।।


दूर रहने वाले बंधु-बांधव भले जान पड़ते हैं।

दूर के ढोल सबको ही बड़े सुहावने लगते हैं।।


बाड़ के पार घास ज्यादा हरी दिखाई देती है।

अक्सर दूरी घिनौनेपन को छिपा लेती है।।


.....कविता रावत