हम भोपाली


हम कहलाते हैं भोपाली
मिनीबस की है कुछ बात निराली
हम कुछ भी बकें इधर-उधर
हर बात हमारी है निराली
         हमसे बढ़ती शान
हम कहलाते हैं भोपाली।

हम ड्रायवर सबको ढ़ोते-फिरते
चाहे चपरासी हो या अफसर
पर जब आते टेंशन में भैया
तब दिखता न घर न दफ्तर
पान-गुटका-बीड़ी साथ हमारे
जुबां पर रहती हरदम गाली
         हमसे बढ़ती शान
हम कहलाते हैं भोपाली।

खाऊ किस्म के जीव नहीं हम
चाय कट पूरे गुटके से काम चलाते
रीढ़ की हड्डी हम सरकार की भैया
हम तो सबके प्यारे बाबू कहलाते
कुछ आये न आये हमको
पर आती है प्यार भरी गाली
        हमसे बढ़ती शान
हम कहलाते हैं भोपाली।

सरकार का बोझ उठाते हम
सरक-सरक कर चलते रहते
हम सरकारी अफसर कहलाते
अगर कोई काम बिगाड़ दे भैया
तो करते ठीक देकर दो-चार गाली
         हमसे बढ़ती शान
हम कहलाते हैं भोपाली।

..कविता रावत

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RAJ
May 14, 2014 at 9:27 AM

बहुत से एंगल से यथार्थ का खाका खींच दिया आपने अपने आप को सूरमा भोपाली समझने वालों का ...........क्या कहिये इन नाम ख़राब करते भोपालियों का?

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May 14, 2014 at 10:13 AM

आपकी लिखी रचना शनिवार 17 मई 2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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May 14, 2014 at 10:15 AM

हा हा हा ... बहुत अच्छा चित्रण कविता के माध्यम से. मैं एक बार भोपाल गया था.. मुझे तो नया भोपाल बड़ा ही अच्छा लगा था ..

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May 14, 2014 at 11:58 AM

बहुत से भोपाली गाली देते नहीं दिल से फेंकते हैं ....
भोपाल की शान पर बट्टा लगाने वाले ना समझे है ना समझेगें .............

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May 14, 2014 at 12:06 PM

सुरमा भोपाली .हा हा हा ...... बहुत ही सुन्दर रचना....अच्छा लगा पढ़कर

सफ़र है सुहाना..
http://ritesh.onetourist.in/2014/05/mehtab-bagh-7.html

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May 14, 2014 at 1:05 PM

बढ़िया लेखन की बढ़िया अनुभूति , आ. कविता जी धन्यवाद !
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May 14, 2014 at 1:10 PM

हमारे ब्लॉग का लोगो अपने ब्लॉग पर स्थान देने के लिए , आ. बहुत-बहुत धन्यवाद !

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May 14, 2014 at 6:27 PM

बहुत ही सुन्दर रचना.....

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May 14, 2014 at 8:43 PM

कविता से भोपाल की झांकी मिल गयी. एक बार आकर देखना होगा.

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May 14, 2014 at 11:11 PM

बढ़िया है .... सुन्दर चित्रण किया है .

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May 15, 2014 at 4:50 PM

हम कहलाते हैं भोपाली
मिनीबस की है कुछ बात निराली
हम कुछ भी बकें इधर-उधर
हर बात हमारी है निराली
हमसे बढ़ती शान
हम कहलाते हैं भोपाली।
.......................
बस में हर रोज दो चार होना पड़ता है
मेरा भोपाल महान

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May 15, 2014 at 5:36 PM

सूरमा भोपाली आये हाये ,...आये हाये.........
भालो ......भालो

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May 15, 2014 at 8:22 PM

हास्य, व्यंग्य का पुट लिए सुन्दर रचना...बधाई

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May 15, 2014 at 9:00 PM

आदरणीया कविता जी व्यंग्य का पुट और यथार्थ हमारे चालक महोदय का दिखती अच्छी रचना ..विचारणीय
भ्रमर ५

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May 15, 2014 at 9:41 PM

चूंकि मैं भी भोपाली हूँ तो आपकी इन पंक्तियों को बहुत अच्छे से महसूस कर सकता हूँ..दूसरा आपकी इस पोस्ट से खुद को इसलिये भी जुड़ा महसूस कर पा रहा हूँ क्योंकि पीपुल्स समाचार और पीपुल्स ग्रुप से मैं तीन वर्षों तक जुड़ा रहा हूं..इसलिये ये प्रस्तुति मुझे काफी अपनी सी लगी।।

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May 16, 2014 at 8:32 AM

इसको कविता कहूँ कि शब्दचित्र... एकदम तस्वीर सामने लाकर रख दी आपने!! बहुत मज़ेदार!!

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May 16, 2014 at 9:14 PM

कई बार भोपाल गई हूँ ...... संयोग कहूँ या दुर्भाग्य ऐसों मुलाक़ात नहीं हुई .....
आपने अच्छा लिखा है ......

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May 17, 2014 at 7:54 AM

भोपाल की मज़ेदार झांकी.......

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SKT
May 17, 2014 at 9:29 AM

कविता का मज़ा इस बात में है कि इसमें भोपाली की जगह इंदौरी, मेरठी, देहलवी, पटियालवी, रोहतकी आदि करने से कविता के भाव पर कुछ फर्क नहीं पड़ेगा!

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May 17, 2014 at 1:47 PM

हम भोपाली हैं कमाल के
गाली भी दे तो शान से
हर बात हमारी है निराली
हम कहलाते हैं भोपाली।

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May 17, 2014 at 2:28 PM

सूरमा भोपाली का इलाका वाकई निराला है...

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May 17, 2014 at 9:24 PM

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (18-05-2014) को "पंक में खिला कमल" (चर्चा मंच-1615) (चर्चा मंच-1614) पर भी होगी!
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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May 19, 2014 at 8:34 PM

वाह भोपाली सूरमा हो गये आप तो।

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May 20, 2014 at 1:01 PM

हास्य व्यंग के माध्यम से बहुत कुछ कह दिया आपने ... शब्दों के माध्यम से खाका खींच दिया भोपाली का ... वाह गज़ब ...

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May 20, 2014 at 9:46 PM

achchha wyagy hai, तबीयत खुश हो गयी

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May 22, 2014 at 4:33 PM

यह हम भोपालियों की पहचान है

कुछ आये न आये हमको
पर आती है प्यार भरी गाली
हमसे बढ़ती शान
हम कहलाते हैं भोपाली।
waah!

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May 27, 2014 at 8:18 PM

हम कहलाते हैं भोपाली
हर बात हमारी है निराली
सूरमा भोपाली

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May 29, 2014 at 5:44 PM

बधाई शुक्रिया आपकी टिप्पणियों का।

बढ़िया व्यंग्य चित्र।

एक और भी हैं भैया बाज़ीगर भोपाली ,

राजनीति के दुर्मुख कहते -

दिग पराजय सिंह ई भाईसाहब !सशक्त लेखनी को प्रणाम।

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May 31, 2014 at 4:26 PM

हर बात हमारी है निराली
हमसे बढ़ती शान
हम कहलाते हैं भोपाली।

........... व्यंग के माध्यम से बहुत कुछ कह दिया आपने !

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Anonymous
September 16, 2014 at 5:37 AM

Aw, this was an extremely good post. Taking the time and actual effort to make a top notch
article… but what can I say… I put things off a whole lot and never manage to
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