दाढ़ी बढ़ा लेने पर सभी साधु नहीं बन जाते हैं




गुलाब को कुछ भी नाम दो उससे उतनी ही सुगंध आयेगी।
शक्कर सफेद हो या भूरी उसमें उतनी ही मिठास रहेगी।।

कभी चित्रित फूलों से सुगंध नहीं आती है।
हर चमकदार वस्तु स्वर्ण नहीं होती है।।

धूप में धूल के कण भी चमकदार मालूम पड़ते हैं।
हाथी के खाने और दिखाने के अलग दाँत होते हैं।।

सुन्दर सेब के भीतर कीड़ा लगा तो वह किसी काम नहीं आता है।
बन्दर को शाही पोशाक पहना देने पर वह बंदर ही कहलाता है।।

किसी पेड़ को उसकी छाल से नहीं जाँचना चाहिए।
सिर्फ चेहरा देख उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए।।

जंग में जाने वाले सब लोग सैनिक नहीं होते हैं।
दाढ़ी बढ़ा लेने पर सभी साधु नहीं बन जाते हैं।।
      
  ...  कविता रावत 


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October 16, 2014 at 11:30 AM

किसी पेड़ को उसकी छाल से नहीं जाँचना चाहिए।
सिर्फ चेहरा देख उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए।।
...............कम से कम आज तो आँख मूंधकर कर विशवास कर लेने का ज़माना बिलकुल भी नहीं है .....
....उम्दा रचना

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October 16, 2014 at 12:01 PM

सुन्दर रचना कविता जी !
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है !

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October 16, 2014 at 12:24 PM

भावपूर्ण ,सशक्त, सुन्दर और नसीहत देती रचना

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October 16, 2014 at 12:48 PM

सभी पंक्तियाँ सुन्दर और शिक्षाप्रद !

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October 16, 2014 at 1:33 PM

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (17.10.2014) को "नारी-शक्ति" (चर्चा अंक-1769)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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October 16, 2014 at 1:43 PM

सार्थक और सुन्दर प्रस्तुति....

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October 16, 2014 at 1:44 PM

बेहतरीन व उम्दा लेखन , पढ़कर बहुत हि अच्छा लगा , आपको धन्यवाद !
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October 16, 2014 at 1:54 PM

सुन्दर आनुभूतिक सत्य ,निचोड़ .........-आभार !

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October 16, 2014 at 2:00 PM


कल 17/अक्तूबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद !

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October 16, 2014 at 4:48 PM

सुन्दर सेब के भीतर कीड़ा लगा तो वह किसी काम नहीं आता है।
बन्दर को शाही पोशाक पहना देने पर वह बंदर ही कहलाता है।।

लोकोक्तियों के माध्यम से बहुत अच्छा सन्देश दिया है आपने...

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October 16, 2014 at 5:01 PM

गुलाब को कुछ भी नाम दो उससे उतनी ही सुगंध आयेगी।
शक्कर सफेद हो या भूरी उसमें उतनी ही मिठास रहेगी।।
,,,,,बहुत बहुत बढ़िया ................

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October 17, 2014 at 6:42 AM

बहुत सुन्दर लोकोक्ति में कविता !
इश्क उसने किया .....

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October 17, 2014 at 7:55 AM

बहुत बढ़िया....बेहद सटीक रचना..

अनु

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October 17, 2014 at 11:52 AM

गुलाब को कुछ भी नाम दो उससे उतनी ही सुगंध आयेगी।
शक्कर सफेद हो या भूरी उसमें उतनी ही मिठास रहेगी।।
बहुत सुन्दर सटीक रचना..

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October 17, 2014 at 12:05 PM

जॉच परख कर ही निर्णय करना चाहिए।

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October 17, 2014 at 6:00 PM

लोकोक्ति में सटीक कविता !

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RAJ
October 17, 2014 at 6:04 PM

जंग में जाने वाले सब लोग सैनिक नहीं होते हैं।
दाढ़ी बढ़ा लेने पर सभी साधु नहीं बन जाते हैं।।
.........लेकिन आज ऐसों का ही जमाना है ....
सटीक कविता ......

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October 17, 2014 at 7:14 PM

किसी पेड़ को उसकी छाल से नहीं जाँचना चाहिए।
सिर्फ चेहरा देख उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए।।

Behtreen.... Vicharniy Panktiyan Hain

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October 17, 2014 at 9:17 PM

जी सही बात
हमारी दाढ़ी भी बढ़ी
फिर भी
किसी काम की नहीं ।

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October 17, 2014 at 9:42 PM

बहुत सुन्दर चित्रण

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October 17, 2014 at 11:44 PM

Bilkul saarthak aur steek ... Koi shak nhi isme ... Umdaa prastuti !!

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October 18, 2014 at 11:22 AM

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October 20, 2014 at 10:41 AM

धूप में धूल के कण भी चमकदार मालूम पड़ते हैं।
हाथी के खाने और दिखाने के अलग दाँत होते हैं।।

गंभीर और सटीक बात। बेहद सुंदर

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October 21, 2014 at 5:55 AM

लोकोक्तियों में समाये जीवन-दर्शन का सुन्दर उपयोग !

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October 28, 2014 at 10:09 PM

अच्छी ज्ञान-वर्द्धक प्रस्तुति !

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October 14, 2015 at 7:20 PM

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार,15 अक्तूबर 2015 को में शामिल किया गया है।
http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमत्रित है ......धन्यवाद !

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