विवशता में फायदे का सौदा नहीं किया जा सकता है

विवशता में फायदे का सौदा नहीं किया जा सकता है

विवशता की हालत में कोई नियम लागू नहीं होता है।
कीचड़ में फँसे हाथी को कौआ भी चोंच मारता है।।

कुँए में गिरे शेर को बंदर भी आँखें दिखाता है।
उखड़े हुए पेड़ पर हर कोई कुल्हाड़ी मारता है।।

मुसीबत में फँसा शेर भी लोमड़ी बन जाता है।
मजबूरी के आगे किसी का जोर नहीं चलता है।।

विवशता नई सूझ-बूझ को जन्म देती है।
विवशता लोहे के सलाखों को तोड़ सकती है।।

विवशता में ईमानदार भी धूर्त  बन जाता है।
विवशता कायर को भी शूरवीर बना सकता है।।

जरूरत पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है।
विवशता में फायदे का सौदा नहीं किया जा सकता है।।

....  कविता रावत 
गुलाबों  के साथ एक शाम

गुलाबों के साथ एक शाम

मध्यप्रदेश रोज सोसायटी संचालनालय उद्यानिकी एवं प्रक्षेत्र वानिकी की ओर से बीते रविवार को जब मैं सपरिवार भोपाल स्थित शासकीय गुलाब उद्यान में आयोजित 32वीं अखिल भारतीय गुलाब प्रदर्शनी देखने पहुँची तो सप्ताह भर का थका-हारा मन देशभर से आए प्रतिभागियों के 600 से अधिक प्रजातियों के गुलाबों की खूबसूरती के रंग में डूबकर तरोताजा हो उठा।  
लगभग 30 स्टॉल्स पर पिटोनिया, लिबोनिका, पैंजी, फलॉक्स,  डायम्पस, गुलदाउदी, डहेलिया, लिफोरिया, सालविया, पंसेटिया और सकीलैंड्स जैसे पौधों के बहुत से प्रकार  सतरंगी गुलाबी खुशबुओं से अपनी महक चारों ओर फैला रहे थे। दिल्ली, कोलकाता, हैदराबाद, महाराष्ट्र, जमशेदपुर, नागपुर, इन्दौर, पचमढ़ी, जयपुर आदि शहरों से लाए गए गुलाब की विभिन्न किस्मों जैसे- कबाना, ब्लैक बकारा, डकोलेंडी, डायना प्रिंसिंस ऑफ  द वॉल, डीप सीक्रेट, जस जॉय, रोज ओ बिन, हैडलाइनर की खूबसूरती और खूबियों में लोग डूबते-उतर रहे थे। 
गुलाबों की महक और उनके शोख इन्द्रधनुषी रंगों को हर कोई देखने वाला  अपने मोबाइल कैमरे में कैद करने को आतुर दिख रहा था। इसके साथ ही बहुत से फोटोग्राफर भी अपने कैमरे से रंग-बिरंगे गुलाबों की खूबसूरती के साथ लोगों की तस्वीरें  उतारने के बाद थोड़ी देर बाद उन्हें देते जा रहे थे। यह सब आधुनिक फोटोग्राफी तकनीकी का ही कमाल है कि जहाँ फोटो लेने के बाद उसे मिलने में 3-4 दिन लग जाते थे, वह 5 मिनट में मिलने लगे हैं।   
गुलाब उद्यान में लगे टैंट के अन्दर सुन्दर लाल, गुलाबी, सफेद और पीले गुलाब अपनी सुन्दरता बिखेर रहे थे तो बाहर विभिन्न प्रजातियों के कतारबद्ध बहुरंगी फूल उद्यान की शोभा में चार चांद लगा रहे थे। हरे-भरे उद्यान में ईएमई सेंटर भोपाल के म्यूजिकल बैंड की समधुर धुन पर देशभक्ति गीतों में डूबना दर्शकों को खूब रास आ रहा था। अपनी-अपनी पसंद के अनुसार कुछ लोग प्रदर्शनी में लगे स्टॉल्स पर खाने-पीने में डटे दिख रहे थे तो कुछ लोग गुलाब के पौधे खरीद कर उनकी देखभाल के गुर देश-विदेश से आए गुलाब विशेषज्ञों से जानने में लगे थे।   
एक ओर जहाँ हर वर्ष की तरह इस बार भी गुलाब प्रदर्शनी में गुलाब प्रेमियों के सिर पर गुलाबी रंग चढ़कर बोला तो वहीं दूसरी ओर पहली बार तीन बोनसाई क्लबों की विशिष्ट बोन्साई कला भी अपने सार्थक प्रदर्शन के कारण सबका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने में कामयाब रहा। बरगद, पीपल, साइकस पाम, आम, नीबू, अमरूद, शहतूत, नारंगी, लोलिना पाम, टी साइकस आदि  बोन्साई  पेड़-पौधों की खूबसूरती ने सबका मन मोह लिया। मैं भी इन सुन्दर सजावट के साथ रखे बोनसाई पेड़-पौधों की सुन्दरता निहारते-निहारते कई घंटे इनमें समाहित पर्यावरणीय उपयोगिता में डूबती-उतरती रही।
आज शहरों में बढ़ती पर्यावरण प्रदूषण की समस्या शहरवासियों से प्राकृतिक वायु और शुद्ध जल छीन रही है तथा नई-नई असाध्य बीमारियों की ओर धकेल रही है। शुद्ध हवा जीवन-जीने का अनिवार्य तत्व है, जिसके स्रोत हैं- वन, हरे-भरे बाग-बगीचे और लहलहाते पेड़-पौधे। हम क्यों भूल जाते हैं कि इनके संरक्षण में ही हम सबका हित समाहित है। जिस प्रकार माता अपना स्तनपान से शिशु को पालती है, उसी प्रकार पेड़-पौधे अपनी ऑक्सीजन से पर्यावरण को स्वस्थ और शुद्ध रखते हैं। आइए हम भी पर्यावरण की शुद्धि के लिए तथा प्रदूषण से मानवों की रक्षा के लिए अपने आस-पास पेड़-पौधों को उपजाकर पल्लवित-पुष्पित करने का संकल्प करें।  
      .......कविता रावत

नानी बनने की खुशखबरी

नानी बनने की खुशखबरी

मेरी सोनिया माँ बनी और मैं नानी माँ। जैसे ही मुझे उसने यह खुशखबरी दी, मैं खुशी से झूम उठी। इधर एक ओर बच्चों की परीक्षाओं का बोझ सिर पर था तो दूसरी ओर विधान सभा चुनाव के कारण छुट्टी नहीं मिलने से मन आकुल-व्याकुल होता रहा। लेकिन जैसे ही बच्चों की परीक्षा और चुनाव से मुक्ति मिली तो मैंने उसके ससुराल (गजियाबाद) की राह पकड़ ली। रेल और बस के सफर में “गूँथ कर यादों के गीत, मैं रचती हूँ विराट् संगीत“ की तर्ज पर मैं उसके बचपन की यादों में डूबती-उतराती रही। तब मैंने कालेज में प्रवेश लिया ही था कि उसी समय मेरे बडे़ भाई की बिटिया सोनिया मेरे परिवार में खुशियों की सौगात लेकर आयी। हम दो भाई और तीन बहिनों को जैसे कोई खिलौना मिल गया हो; उसे खिलाने-पिलाने के लिए आपस में खूब झीना-झपटी मची रहती थी। यह तब-तक चलता रहता जब तक माँ-पिताजी से एक जोरदार डाँट सुननी को न मिल जाती थी। बुआ-बुआ की सुमधुर बोल आज भी मेरे कानों में गूँज रहे हैं।
अपनी सोनिया के बचपन से लेकर विवाह तक की तमाम मधुर स्मृतियों में गोते खाते हुए जब मुझे अहसास हुआ कि अरे! अब तो मैं नानी बन गई हूँ और अब मुझे तो नानी की तरह नन्हें लाड़-दुल्लारे को कहानियाँ सुनाने पड़ेगी तो क्या कहूँगी? क्या सुनाऊँगी? इसी के बारे में सोचती चली गई। मैं तो जब चार अक्षर पढ़ना सीखी तभी नानी माँ की कहानियों के बारे में जान सकी कि नानी के पास मीठी-मीठी कहानियों का पिटारा होता है। जिसमें से नानी बारी-बारी से राजा-रानी, परियों से लेकर भूत-प्रेत, देवता-राक्षस इन सबको बाहर निकालकर अपने नाती-पोतों को अनूठे और रोचक ढ़ंग से परिचित कराती है। इस मामले मैं सौभाग्यशाली नहीं रही। क्योंकि मेरी नानी माँ मेरे आने से पहले से चल बसी। इसलिए बचपन में न नानी माँ का प्यार-दुलार मिला और न ही उनकी कहानियाँ सुननी को मिली। अब सोचने लगी हूँ कि भले ही मुझे यह सौभाग्य न मिला हो लेकिन अब जब मैं नानी बन गई तो अपने नाती को जब तक वह थोड़ा-बहुत बोलने-सुनने लायक होता है तब तक कुछ नहीं तो कुछ कहानियाँ ही रच लूँ, ताकि जब-तब वह मैं उसके पास जाऊँ या वह मेरे पास आये, तब-तब मैं उसे बिना कहे सुना सकूँ। इस बारे में मुझे बड़ी सजगता बरतने और आज के जमाने के मुताबिक मशक्कत करने की जरूरत पड़ेगी। क्योंकि आज सूचना क्रांति के इस युग में नौनिहालों के लिए नानियों को नई कहानियाँ गढ़ने के साथ ही उनके साथ चलने के लिए तैयार रहना होगा, तभी वे उन्हें सुन सकेंगे, उनके करीब आ पायेंगे। यदि ऐसा न हुआ तो फिर वे घर-परिवार, नाते-रिश्ते सब भूलकर कम्प्यूटर, टी.वी. मोबाइल से रिश्ता बनाकर हर समय उससे ही चिपके रहेंगे।
दुनिया भर के बातों में उलझती-सुलझती जब मैं अपनी सोनिया के पास पहुँची और मैंने अपने नन्हे-मुन्ने, प्यारे-प्यारे लाड़-दुल्लारे नाती का मासूम हंसता-खिलखिलाता चेहरा देखा तो मुझे सुभद्राकुमारी जी की तरह अपना बचपन याद आने लगा-
बीते हुए बचपन की वह, क्रीडापूर्ण वाटिका है।
वही मचलना, वही किलकना, हँसती हुई नाटिका है।
जब मैंने भोले-भाले बच्चे को गोद में उठाया तो दौड़ती-भागती, संघर्षमय, अशांत और श्रांत-क्लांत जीवन में उसकी समधुर सुकोमल मुस्कान और किलकारी की गूँज मेरे कानों में गूँजकर मधुर रस घोलने लगी। विश्वास नहीं हो रहा था कि जैसे कल ही की तो बात हो; जिस नन्हीं सोनिया को मैंने इसी तरह गोद में उठाया था, आज वही माँ बन गई है। इस खुशी के माहौल में भरे-पूरे परिवार के साथ नाते-रिश्तेदारों को एक साथ हिल-मिल कर खुशियाँ मनाते देखकर मेरे मन को बड़ा सुकून मिला। अक्सर ऐसे सुअवसरों पर मेरा मन भावुक हो उठता है। हमारे हिन्दू-दर्शन में भले ही स्वर्ग और नरक की कल्पना है। लेकिन मुझे तो इसके परे हमेशा स्वर्ग घर-परिवारों के सुखद और उत्साहवर्द्धक वातावरण में ही मिलता है।

अभी फिलहाल मुझे नानी के रूतवे से नवाजने वाली मेरी सोनिया को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ यह नसीहत देती चलूँगी कि-

जिन्दगी आसान रखना

कम से कम सामान रखना
जिन्दगी आसान रखना । 
फिक्र औरों की है लाजिम
पहले अपना ख्याल रखना।।
हर कोई कतरा के चल दे
नहीं ऐसा अभिमान करना।
भीड़ में घुलमिल के भी तू 
अपनी पहचान रखना।।
राहों  पर रखना आंखे
आहटों पर कान रखना।
कर निबाह काँटों से लेकिन
फूल का भी ध्यान रखना।।

     ....कविता रावत