स्वस्थ जीवन जीने का कला और विज्ञान

स्वस्थ जीवन जीने का कला और विज्ञान

हमारे भारतीय चिन्तन में शरीर को धर्म का पहला साधन माना गया है। महाकवि कालिदास की सूक्ति "शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्"  और इस हेतु सदैव स्वस्थ रहने को कर्तव्य निरूपित किया है। "धर्मार्थ काममोक्षाणाम् आरोग्यम् मूल मुत्तमम्।" इसीलिए अच्छा स्वास्थ्य महा-वरदान है। इसकी  रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का दायित्व है।  शरीर का स्वस्थ रहना परम आवश्यक है। यदि शरीर स्वस्थ नहीं हो, तो मन स्वस्थ नहीं रह सकता, मन स्वस्थ नहीं तो विचार स्वस्थ नहीं होते। उर्दू में एक सूक्ति है- 'तन्दुरूस्ती हजार न्यामत' अर्थात स्वास्थ्य हजार अन्य अच्छे भोगों से बढ़कर है। अंग्रेजी में भी कहावत है-  'Health is Wealth' अर्थात् स्वास्थ्य ही धन है। तुलसीदास जी ने इसे और सरल शब्दों में व्यक्त किया है- "बड़ भाग मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा।" अर्थात् अर्थात् बड़े भाग से मनुष्य जीवन मिलता है, सभी ग्रंथ कहते हैं कि यह देवताओं को भी दुर्लभ है। इसीलिए योगेश्वर कृष्ण ने भी अपने प्रिय शिष्य उद्धव को शरीर के विषय में कहा कि मनुष्य शरीर दुर्लभ है तथा पुण्य कर्मों से प्राप्त होता है।  मनुष्य के रूप में जन्म लेना वास्तव में भाग्य की बात है। स्वस्थ जीवन शैली की कला और विज्ञान के साथ ही भारतीय दर्शन "परहित सरिस धर्म नहिं भाई" सार्थक जीवन का भी संदेश हमें देता है।           
          वास्तव में कला और विज्ञान परस्पर विरोधी नहीं हैं। कला विज्ञान को भी कलात्मक रूप दे सकती है, वहीं विज्ञान कला को तर्कों के आधार पर वैज्ञानिक रूप प्रदान कर सकता है। व्यवहार में कहा जाता है कि कुशल सर्जन कितने कलात्मक रूप से सर्जरी करते हैं, वहीं दूसरी ओर नाड़ी परीक्षा करके चिकित्सा करने के विषय को वैज्ञानिक रूप से कसौटी पर कसने का प्रयास करते हैं।  स्वस्थ जीवन शैली के मूल प्रतिपाद्य विषय पर विचार करें तो स्वस्थ रहने के लिए आयुर्वेद और योग के नियम तथा निर्देशों को व्यवहार में लाना एक कला है जो परिवार में संस्कारों के रूप में प्राप्त होती है और जो धीरे-धीरे व्यवहार में आकर जीवन शैली बन जाती है। जैसे कि सूर्योदय के पूर्व जागरण, स्नान-ध्यान, व्यायाम-योग, विश्राम, जल्दी सोना, मौसम के अनुसार आहार-विहार आदि-आदि। 
            आयुर्वेद और योग व्यक्तिगत के साथ सामाजिक, संवेदनात्मक, भावनात्मक तथा सुचितापूर्ण जीवन जीने के विचार भी प्रस्तुत करता है, जो कि स्वस्थ जीवन शैली के अभिन्न अंग हैं।  हमारे मनीषियों ने स्वस्थ जीवन जीने के लिए मात्र संहिता ग्रंथों या शास्त्रों की रचना ही नहीं की बल्कि व्रत, पर्व और त्यौहार आदि के माध्यम से स्वस्थ जीवन के सूत्रों को जन-जन में व्याप्त किया। उपवास, विशेष प्रसाद तथा व्रत, त्यौहार आदि के विशेष आहार की योजना व ऋतु एवं प्रकृति को ध्यान में रखकर की।
हमारे देश के बहुलतावादी समाज में स्वास्थ्य व्यवस्थायें भी बहुआयामी रही। विभिन्न लोक स्वास्थ्य परम्परायें देश के अलग-अलग हिस्सों में विकसित हुई। हड्डी बिठाने, दाई, जड़ी-बूटी के जानकार, वैदू, भोपा आदि। देशज ज्ञान की यह कला मात्र उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें स्वास्थ्य रक्षा के सूत्र भी निहित हैं। ये विभिन्न लोक परम्परायें मात्र घरेलू उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि इनके ज्ञान का आधार 75 प्रतिशत से अधिक आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुकूल है।         
आयुर्वेद और योग के माध्यम से जो जीने की कला विकसित हुई, आधुनिक विज्ञान इसके वैज्ञानिक पक्ष को सामने लाने का प्रयास कर रहा है। उदाहरणार्थ- आयुर्वेद का मानना है कि भोजन में 50 प्रतिशत ठोस प्रतिशत तथा 25 प्रतिशत तरल पदार्थ रहें तथा शेष 25 प्रतिशत भाग वायु के आवागमन के लिए खाली रहे। विज्ञान भी इसका समर्थन करते हुए कहता है कि पेट भरने का संदेश दिमाग में पहुंचने में 20 मिनट लगते हैं। अतः भोजन के आखिरी दौर में पेट भरने के पहले ही हाथ खींच लें।  प्रातः जागरण के संस्कार को भी विज्ञान सही मानता है क्योंकि उस समय पिट्टूटरी ग्लैंड का स्त्राव अधिकतम् होता है। 
सम्पूर्ण विश्व में जापानी सबसे ज्यादा जीते हैं। उनमें रोगों का प्रतिशत भी तुलानात्मक रूप से कम हैं। उनके स्वस्थ व दीर्घायु जीवन पर अध्ययन करने पर जो सूत्र सामने आये हैं वे कोई रहस्यमय नहीं, बल्कि अत्यन्त सरल और व्यावहारिक हैं; जैसे कि-
  • भूख से 20 प्रतिशत कम खाते हैं। (हरा हची बू यानि पेट भर नहीं)
  •  सब्जी, दाल, फलों का सेवन ज्यादा करते हैं।
  • खाने की प्लेट छोटी रखते हैं।
  • भोजन के बाद मीठा नहीं बल्कि फल या ग्रीन टी लेते हैं।
  • खट्टे फर्मेन्टेड सब्जी का प्रयोग ज्यादा करते हैं क्योंकि इसमें पाचन अच्छा रखने वाले गुड लेक्टिक एसिट  बैक्टीरिया की अधिकता होती है।
  • सूक्ष्म व्यायाम की विधा ‘ताई ची’ नियमित रूप से करते हैं।
  •  ज्यादा पैदल चलना, साइकिल का उपयोग ज्यादा तथा कार की बजाय सार्वजनिक वाहन का उपयोग ज्यादा करते हैं।
  • संयुक्त परिवार को महत्व देते हैं। परस्पर मिलना-जुलना, सामाजिकता पर बल देते हैं।
            यही कारण है कि जापानियों की जीवन प्रत्याक्षा (Life Expentence)  82.5 वर्ष है, जो विश्व में सबसे ज्यादा है, जबकि भारत में 65 है। जापानी सिर्फ लम्बी उम्र ही नहीं जीते, बल्कि उनमें हृदय रोग, मोटापा, डायबिटीज जैसे विकृत जीवन शैली जनित रोगों का प्रतिशत भी काफी कम है।
            उपरोक्त सभी सूत्र भारतीय संस्कृति में पूर्व से विद्यमान है, लेकिन उनके प्रति उदासीनता के कारण जीवन शैली में बदलाव स्पष्ट देखा जा सकता है।  अब प्रश्न यह उठता है कि स्वस्थ जीवन शैली की ये कलात्मक जीवन सूत्र हमारे देश में मौजूद हैं, फिर भी हमारे यहाँ स्वास्थ्य की स्थिति चिन्ताजनक क्यों है?  इसका कारण यह है कि कला के साथ विज्ञान का समन्वय नहीं हो पाना। आज स्वस्थ जीवन के सूत्रों के वैज्ञानिक पक्ष को खुले दिमाग से सामने लाना होगा। 
            विवाह, गर्भाधान, बाल-किशोर, प्रौढ़ावस्था अर्थात् जीवन के प्रत्येक चरण को स्वस्थ रखने के लिए स्वस्थ जीवन शैली के सूत्र भारतीय चिन्तन में निहित हैं। ऐसे सूत्रों के कलात्मक और वैज्ञानिक पक्ष को चिन्तकों, अनुभवी विद्वानों, विषय विशेषज्ञों द्वारा व्यवहार में लाने हेतु संयुक्त प्रयास करने होंगे।

डाॅ. मधुसूदन देशपांडे, आयुर्वेद चिकित्सक, ओजस पंचकर्म सेंटर भोपाल के सहयोग से .......
....कविता रावत
हिन्दी दिवस: दो पाटन के बीच में

हिन्दी दिवस: दो पाटन के बीच में

किसी भी देश में राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान, राष्ट्र चिन्ह की भांति ही राष्ट्रभाषा का भी बराबर  महत्व होता है। जिस व्यक्ति के मन में इन सबका सम्मान नहीं, उसकी राष्ट्र के प्रति भी अपनी कोई आस्था नहीं हो सकती है। राष्ट्रभाषा किसी भी स्वतंत्र देश की संपत्ति होती है और हमारे देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी है। राष्ट्रभाषा का महत्व राष्ट्रीय सम्मान की दृष्टि से होता है। एक ही राष्ट्र के निवासी जब आपस में मिलने पर बात विदेशी भाषा में करें तो यह एक सीधे से अर्थ में विपत्ति टूटना है। एक ही घर के दो व्यक्ति किसी विदेशी भाषा को अभिव्यक्ति का माध्यम बनायें तो माना जा सकता है कि वह दोनों वैचारिक स्तर पर दरिद्र हैं। दूसरे देश से भाषा का आयात कर अपना काम चलाना किसी भिखारीपन से कम नहीं कहा जा सकता। जिसकी अपनी भाषा है वह दूसरे की भाषा का सम्मान तो कर सकता है मगर दूसरी भाषा पर आश्रित होना दिवालियेपन से कम नहीं। राष्ट्रभाषा के बिना किसी भी राष्ट्र की उन्नति अधूरी है। अपनी राष्ट्रभाषा के प्रयोग से जो आत्मीयता का बोध होता है, वह किसी दूसरी भाषा से नहीं हो सकता है। तभी तो भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी कहते हैं कि-
निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को शूल।।
     
         राष्ट्रभाषा राष्ट्र की आत्मा का प्रतीक है। हमारे साथ स्वतंत्र होने वाले पाकिस्तान ने उर्दू को राष्ट्रभाषा घोषित किया तो तुर्की के जनप्रिय नेता कमाल पाशा ने स्वतंत्र होने के तत्काल पश्चात् वहां तुर्की को राष्ट्रभाषा बना दिया। इतना ही नहीं अपने नाम के साथ ‘पाशा’ विदेशी शब्द हटाकर अपना नाम कमाल अतार्तुक कर दिया। हमारे पश्चात् स्वतंत्र होने वाले अनेक राष्ट्रों ने अपनी-अपनी राष्ट्रभाषा की घोषणा कर दी, किन्तु भारत के कर्णधार ‘  सबको खुश करने’ की नीति पर चले तो उन्होंने राष्ट्रभाषा हिन्दी की घोषणा करके उस पर अंग्रेजी की ऐसी तलवार लटका दी, जिसे हटाने में किसी सूरमा में ताकत शेष न रही। संविधान-निर्माण के समय हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित करवाने के लिए जिन असंख्य हिन्दी प्रेमियों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने प्रदर्शन किए, लाठियों का सामना किया, वे परतंत्रता-काल में हिन्दी के हिमायती कांग्रेसी नेताओं की राजनीति के चक्कर में फंस गए। जिसके परिणामस्वरूप हिन्दी के साथ अंग्रेजी के प्रयोग को सदैव के लिए प्रयोगशील बना दिया गया। संसद में भी हिन्दी के साथ  अंग्रेजी के प्रयोग को अनुमति मिल गई और कहा गया कि जब तक भारत का एक भी राज्य हिन्दी का विरोध करेगा, हिन्दी को राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहासनारूढ़ नहीं किया जाएगा। इसी की दुःखद परिणति है कि आज भी हमारी राष्ट्रभाषा  कबीरदास के दोहे, “चलती चाकी देखकर, दिया कबीरा रोय। दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।।“ जैसे हालातों से जूझते हुए राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहासनारूढ़ होने की राह बाट रही है।
            यह निर्विवाद सत्य है कि हिन्दी की पहचान हिमगिरि से लेकर कन्याकुमारी तक व्याप्त है। सांस्कृतिक दृष्टि से भी इसकी परम्परा अंततः पुष्ट और सुदीर्घ है। भक्तिकाल का सम्पूर्ण साहित्य भी हिन्दी भाषा में ही रचित है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्वतंत्रतता के 67 वर्ष बाद भी देश में हिन्दी पढ़ने, बोलने, समझने वालों की संख्या 75 प्रतिशत के लगभग होने के बावजूद भी उसे आज पर्यन्त राष्ट्रभाषा का उचित सम्मान और महत्व प्रदान करने में सफल नहीं हो पाये हैं। संविधान की धारा 351 के अंतर्गत भले ही हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया है, मगर सरकारी स्तर पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा का महत्व अभी प्राप्त न हो सका। 
            आज अंग्रेजी मानसिकता हिन्दी-अभिरुचि का गला घोंट रही है। हिन्दी के पक्षपाती, उसके कर्णधार तथा उसके नाम पर व्यवसाय करने वाले, राजनीति की रोटियाँ  सेंकने वाले उसे गंगा में समाधिस्थ करने पर तुले हुए हैं। ऐसे में कच्छप गति से आगे बढ़ती हिन्दी के रथ को गति प्रदान करने के लिए चाणक्य चाहिए जो हिन्दी के विरुद्ध 'उत्तर-दक्षिण की बात खड़ी करके भारतीय समाज को विघटित' किए जाने वाले षड्यंत्रों का पर्दाफाश करके, हिन्दी विरोधी ‘फूट डालो, राज्य करो’ नीति को उजागर करके लोभ, लालच, ममता, स्वार्थ के कंटकों को हटाकर जन-मानस में हिन्दी संस्कार का अमृत पहुंचा सके।

हिन्दी दिवस की असीम शुभकामनाओं सहित।
.....कविता रावत 
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जय हो तेरी गूगल बाबा!


जय हो तेरी गूगल बाबा!
तेरी जय जय गूगल बाबा!


.....कविता रावत