नए साल के लिए कुछ जरूरी सबक

नए साल के लिए कुछ जरूरी सबक


उठिए - जल्दी घर के सारे, घर में होंगे पौबारे
लगाइए - सवेरे मंजन, रात को अंजन
नहाइए - पहले सिर, हाथ-पैर फिर
पीजिए - दूध खड़े होकर, दवा-पानी बैठकर
खिलाइए - आए को रोटी, चाहे पतली हो या मोटी
पिलाइए  - प्यासे को पानी, चाहे कुछ होवे हानि
छोडि़ए    - अमूचर की खटाई, रोज की मिठाई
कीजिए - आये का मान, जाते का सम्मान
जाइए - दुःख में पहले, सुख में पीछे
बोलिए - कम से कम, दिखाओ ज्यादा दम
देखिए - माँ का ममत्व, पत्नी का धर्म
भगाइए   - मन के डर को, बूढे़ वर को
खाइए - दाल-रोटी-चटनी, कितनी भी कमाई हो अपनी
धोइए - दिल की कालिख को, कुटुम्ब के दाग को
सोचिए - एकांत में, करो सबके सामने
चलिए - अगाड़ी, ध्यान रहे पिछाड़ी
बोलिए   - जुबान संभालकर, थोड़ा बहुत पहचानकर
सुनिए  - पहले पराये की, फिर अपनों की
रखिए - याद कर्ज चुकाने की, मर्ज को मिटाने की
भूलिए     -  अपनी बड़ाई को, दूसरे की भलाई को
छिपाइए  - उम्र और कमाई, चाहे पूछे सगा भाई
लीजिए - जिम्मेदारी उतनी, संभाल सको जितनी
रखिए -  चीज़ जगह पर, जो मिले समय पर


बाबा आमटे के जन्मदिन  पर एक कविता

बाबा आमटे के जन्मदिन पर एक कविता

नर्मदा घाटी के आदिवासी मछुआरों, किसानों की आवाज बुलन्द कर नर्मदा बचाओ आन्दोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाले बाबा आमटे का जन्म 26 दिसम्बर 1914 को हिंगणापुर में हुआ। बाबा जीवन भर दुःखी और रोगी लोगों की सेवा में लगे रहे। वे कहते हैं, "जिन्हें वेदना का वरदान नहीं, वे शरीर से उन्मत हैं और जो यातनाहीन हैं, वे सपने नहीं देख सकते।" युवाओं के लिए वे हमेशा प्ररेणास्रोत बने रहे, जिनके लिए उनका मूल मंत्र था- "हाथ लगे निर्माण में, नहीं मांगने, मारने में।" वे एक संवेदनशील कवि और साहित्यकार भी हैं। सरकार द्वारा उपेक्षित आदिवासियों के दुःख-दर्द को उन्होंने करीब से जिया और उनके लिए जिन्दगी भर आखिरी सांस तक जूझते-लड़ते रहे, लेकिन हारे नहीं, यह बात उनकी कई कविताओं में साफ देखने को मिलती हैं। ऐसी ही एक कविता "एक  कुम्हलाते फूल का उच्छ्वास" में वे कहते हैं-

मैं सतासी का हूँ
एक रीढ़हीन व्यक्ति जो बैठ नहीं पाता
मुरझा  रहा हूँ मैं पंखुरी-ब-पंखुरी

लेकिन, क्या तुम नहीं देखते
मेरा रक्तास्रावी पराग?
मैं निश्चयी हूँ,
मगर ईश्वर मदद करे मेरी
कि रत रहूँ मैं गहरी हमदर्दी में
जो आदिवासियों की बेहाली से है।

वंचित विपन्न आदिवासियों की व्यथा का
किसी भी सत्ता द्वारा अपमान
अश्लील है और अमानवीय
सतासी पर
उम्र मुझे बांधे है दासता में
मैं पा चुका हूँ असह्य आमंत्रण अपने
आखिरी सफर का,
फिर भी मैं डटा हूँ

पाठको, मत लगाओ अवरोधक अपने
आवेग पर
कोई नहीं विजेता
सब के सब आहत हैं, आहत!
एक फूल की इस आह को कान दो!!

बाबा आमटे जी को सादर श्रद्धा सुमन!

मदन मोहन मालवीय और अटल बिहारी वाजपेयी जन्मदिवस पर एक परिचय

मदन मोहन मालवीय और अटल बिहारी वाजपेयी जन्मदिवस पर एक परिचय

हमारे हिन्दू धर्म में जिस तरह होली, दीवाली, दशहरा आदि त्यौहार धूमधाम से मनाये जाते हैं, उसी तरह दुनिया भर के ईसाई धर्म को मानने वाले ईसा मसीह के जन्मदिवस 25 दिसम्बर को क्रिसमस के रूप में बड़े धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन को बड़ा दिन भी कहते हैं। इस दिन सभी ईसाई लोग अपने घरों में क्रिममस का वृक्ष सजाते हैं। मान्यता है कि ईसा के जन्म पर देवताओं ने एक सदाबहार वृक्ष को सितारों से सजाकर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उनके माता-पिता को बधाई दी। 25 दिसम्बर का दिन भारतीय जनमानस के लिए भी विशेष है। इसी दिन हमारे बीच दो महान विभूतियों ने जन्म लिया। एक महामना मदन मोहन मालवीय तो दूसरे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ।
          महामना मदन मोहन मालवीय जी को एक समाज सुधारक, पत्रकारिता, वकालत, मातृ भाषा तथा भारत माता की सेवा में जीवन अर्पण करने वाले काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रणेता और इस युग के पहले और अंतिम ऐसे व्यक्ति के रूप में जाना जाता है, जिन्हें महामना के सम्मानजनक उपाधि से विभूषित किया गया। सत्यमेव जयते के नारे को बुलन्द करने वाले मालवीय जी को विभिन्न मत-मतांतरों के लोगों के बीच आपसी सांमजस्य बिठाने की अद्वितीय महारत हासिल थी। वे एक सच्चे देशभक्त के रूप याद किए जाते हैं। भारत निर्माण में उनका योगदान अमूल्य है। इसीलिए एनीबेसेंट ने उनके बारे मेें कहा कि “मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि विभिन्न मतों के बीच, मालवीय जी भारतीय एकता की मूर्ति बने खड़े हुए हैं।" आजीवन देशसेवा करते हुए वे 12 नवम्बर 1946 को स्वर्ग सिधारे।       
          एक ओजस्वी और वाक्पटु के साथ सिद्ध हिन्दी कवि रूप में हमारे बीच 11वें प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी जी ने कुशल नेतृत्व के बलबूते 24 दलों के साथ गठबंधन कर पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनाकर पूरे पांच वर्ष पूरे करते हुए महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की। इसमें देश की सुरक्षा के लिए दो परमाणु परीक्षण महत्वपूर्ण रहे। 1998 में राजस्थान के पोखरण का परमाणु परीक्षण इतने गुप्त ढंग से किया गया कि इसकी भनक अमेरिका की सीआईए को भी नहीं लगने पायी।  
         अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रखर वक्ता के साथ सहृदय कवि के रूप में सुविख्यात हैं। उनकी कविताओं के मनन से स्पष्ट होता है कि वे एक राजनेता से पहले कवि हैं। एक ऐसे कवि जो काल्पनिक नहीं, बल्कि यथार्थवादी हैं। उन्होंने अपनी कविताओं में देशप्रेम का ढोंग नहीं रचा, बल्कि डंके की चोट पर यथार्थता सबके सम्मुख प्रस्तुत की। इसका एक छोटा सा उदाहरण  'पड़ोसी' कविता के रूप में देखिए, जिसमें वे दुश्मन को सिंह की तरह ललकारते हुए कहते हैं-

धमकी, जेहाद के नारों से, हथियारों से
कश्मीर कभी हथिया लोगे, यह मत समझो
हमला से, अत्याचारों से, संहारों से
भारत का भाल झुका लोगे यह मत समझो।

जब तक गंगा की धार, सिंधु में ज्वार
अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष
स्वातंत्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे
अगणित जीवन यौवन अशेष।
एक अन्य जगह उन्होंने लिखा …
एक हाथ में सृजन, दूसरे में हम प्रलय लिए चलते हैं
सभी कीर्ति में जलते, हम अंधियारे में जलते हैं।
आंखों में वैभव के सपने, पग में तूफानों की गति हो
राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता, आए जिस-जिस की हिम्मत हो।

          यह दुःखद है कि अस्वस्थता के चलते आज वे व्हीलचेयर में हैं और कुछ पढ़-लिख नहीं पा रहे हैं। जीवन की इस ढलती शाम को शायद उन्होंने बहुत पहले भांप लिया, तभी तो “जीवन की ढलने लगी सांझ“ कविता में वे लिखते हैं-
उमर घट गई
डगर कट गई
जीवन की ढलने लगी सांझ।
बदले हैं अर्थ
शब्द हुए व्यर्थ
शांति बिना खुशियां हैं बांझ।
सपनों से मीत
बिखरा संगीत
ठिठक रहे पाँ और झिझक रही झांझ।
जीवन की ढलने लगी सांझ।

          पदम विभूषण, कानपुर विश्वविद्यालय से डी.लिट उपाधि, लोकमान्य तिलक पुरस्कार, श्रेष्ठ सांसद पुरस्कार, भारत रत्न पंडित गोविन्द वल्लभ पंत पुरस्कार के बाद अटल जी और महामना मदन मोहन मालवीय जी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान "भारत रत्न" से सम्मानित किए जाने की सुखद घोषणा की गई है। देश के इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान "भारत रत्न" पाने के बाद वे क्रमशः 44वें और 45वें व्यक्ति होंगे। 

अटल जी को जन्मदिन पर हार्दिक मंगलकामना और महामना मालवीय जी को श्रद्धा सुमन! 

सबको क्रिममस की हार्दिक शुभकामनाओं सहित ....कविता रावत
क्रांतिकारी कवि रूप में बिस्मिल की याद

क्रांतिकारी कवि रूप में बिस्मिल की याद

वन्दे मातरम् का उद्घोष के साथ फाँसी के तख्ते से “मैं ब्रिटिश साम्राज्य का नाश चाहता हूँ। I wish the downfall of British Empire!" का सिंहनाद करने वाले महान क्रांतिकारी पं. रामप्रसाद बिस्मिल को 19 दिसम्बर, 1927 को फाँसी दी गई, जिसे शहादत दिवस के रूप में याद किया जाता है। 9 अगस्त को सहारनपुर-लखनऊ पैसेजर ट्रैन  से जाने वाले खजाने को ‘काकोरी’ नामक स्टेशन पर लूटकर दुनिया में पं. रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ और उनके नौ साथियों ने तहलका मचा दिया। इसके लिए उन पर सभी पर मुकदमा चला, जिसमें से ‘बिस्मिल, रोशन, लहरी और अशफाक को फाँसी की सजा  सुनाई गई। बिस्मिल को बचाने के लिए 250 रईस, आनरेरी मजिस्ट्रेट तथा जमींदारों के अतिरिक्त विधान सभा तथा विधान परिषद् के 78 सदस्यों ने भी अलग-अलग अपीलें की, लेकिन वाइसराय सबकी अपीलें खारिज कर दी।
          11 जून 1897 को उत्तरप्रदेश में जन्में बिस्मिल ने अपनी  30 वर्ष की अल्पायु में पूरे 11 वर्ष क्रांतिकारी जीवन जिया और अंग्रेजों की गुलामी की बेड़ियों से जकड़ी भारत माता को आजाद कराने  के लिए सशस्त्र क्रांतिकारी अभियान के साथ ही अपनी कलम की तीखी धार से ‘बोलशेविक कार्यक्रम’, ‘अमेरिका ने आजादी कैसे प्राप्त की’ और ’स्वदेशी रंग’ आदि पुस्तकों का प्रकाशन कर हताशा और निराशा में डूबे जनमानस को स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए जगाया। एक क्रांतिकारी कवि के रूप में वे हमेशा युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत रहे हैं। तत्समय उनकी रचनाएं युवा क्रांतिकारी मंत्र की तरह जपा करते थे-
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है
रहबरे-राहे-मुहब्बत रह न जाना राह में
लज्जते-सहरा-नवर्दी दूरिए-मंजिल में है?
आज मक्तल में ये कातिल, कह रहा है बार-बार
अब भला शौके-शहादत भी किसी के दिल में है
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है
ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत हम तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत की चर्चा गैर की महफिल में है।
बिस्मिल को जेल की चारदीवारी में बंद कर उन पर जुल्म ढहाये गये, बेड़ियों में जकड़े गए, लेकिन जेल की चारदीवारी उनके क्रांतिकारी कदमों को आगे बढ़ने से रोक न पायी। उन्होंने जेल में कलम को अपना मारक हथियार बनाकर अग्रेजों  के इरादों का माकूल जवाब दिया-
तेरी इस जुल्म की हस्ती को ऐ जालिम मिटा देंगे
जुबां से जो निकालेंगे वो हम करके दिखा देंगे।
हमारे सामने सख्ती है क्या इन जेलखानों की
वतन के वास्ते सूली पे हम चढ़कर दिखा देंगे।
हमारी फांका-मस्ती कुछ न कुछ रंग लाके छोड़ेगी
निशां तेरा मिटा देंगे तुझे जब बद्दुआ देंगे।
जिन्दगी के आखिरी समय में ’बिस्मिल’ को भारत माता को आजाद न करा पाने का मलाल सालता रहा, लेकिन उन्हें इतना विश्वास जरूर था कि उनकी इन्कलाबी आग एक दिन रंग लायेगी।  वे दृढ़ता से कहते हैं कि भले ही उन्हें एक दिन मौत मिटा देगी लेकिन उनका नाम कभी नहीं मिटा पायेगी-
दुश्मन के आगे सर यह झुकाया न जायेगा
बारे अलम अब और उठाया न जायेगा
अब इससे ज्यादा और सितम क्या करेंगे वो
अब इससे ज्यादा उनसे सताया न जायेगा
यारो! अभी है वक्त हमें देखभाल लो
फिर कुछ पता हमारा लगाया न जायेगा
हमने लगायी आग है जो इन्कलाब की
उस आग को किसी से बुझाया न जायेगा
कहते हैं अलविदा अब अपने जहान को
जाकर के खुदा के घर से तो आया न जायेगा
अहले-वतन अगरचे हमें भूल जाएंगे
अहले-वतन को हमसे भुलाया न जायेगा
यह सच है मौत हमको मिटा देगी एक दिन
लेकिन हमारा नाम मिटाया न जायेगा
आजाद हम करा न सके अपने मुल्क को
‘बिस्मिल’ यह मुँह खुदा को दिखाया न जायेगा
स्वदेशी के प्रचार-प्रसार के लिए बिस्मिल किसी से पीछे नहीं रहे। स्वतंत्रता के लिए संघर्षों के ‘स्वदेशी रंग’ में रंगते हुए उन्होंने उसे आगे बढ़ाने के लिए जनमानस को प्रेरित करते हुए कहा-
तन में बसन स्वदेशी, मन में लगन स्वदेशी,
फिर से भवन-भवन में विस्तार हो स्वदेशी ......
सब हों स्वजन स्वदेशी, होवे चलन स्वदेशी,
मरते समय कफन भी, दरकार हो स्वदेशी।
‘बिस्मिल’ की भारत माता पर अपने प्राणों को एक बार नहीं सौ बार न्यौछावर करने की तीव्र उत्कंठा उनके द्वारा गोरखपुर जेल से फाँसी के एक घंटे पूर्व माँ को संबोधित एक पत्र में देखने को मिलती है, उन्होंने लिखा कि-
देश दृष्टि में माता के चरणों का मैं अनुरागी था,
देशद्रोहियों के विचार से मैं केवल दुर्भागी था।
माता पर मरने वालों की नजरों में मैं त्यागी था,
निरंकुशों के लिए अगर मैं कुछ था तो बस बागी था।
जाता हूँ, तो मातृ! यही वर, भारत में फिर जन्म धरूँ।
एक नहीं, तेरी स्वतंत्रता पर जननी! सौ बार मरूँ!
बिस्मिल अच्छी तरह जानते थे कि राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति युवा होते हैं। युवाओं के दम पर ही विश्व में बड़ी-बड़ी क्रांतियाँ हुई हैं। इतिहास गवाह है कि भारतीय युवा शक्ति भी इसमें किसी से पीछे नहीं रही है। समय-समय पर देश की सीमाओं का अतिक्रमण कर भीतर घुसने वाले मंगोल, कोल और हूण आक्रमणकारियों के साथ ही यूनान के महान कहा जाने वाले सिकन्दर का भी मुँहतोड़ जवाब देकर उनके दुस्साहस को युवाओं ने ही कुचला है। देशोपकार के लिए सैकड़ों बार मर मिटने को तैयार बिस्मिल को विश्वास था कि उनके मरने के बाद उनके लहू से सैकड़ों बिस्मिल, रोशन, लहरी और अशफाक जन्म लेंगे जो भारत माता को जंजीरों से मुक्त कराकर ही दम लेंगे-
यदि देश हित में मरना पड़े मुझको सहस्त्रों बार भी,
तो भी मैं इस कष्ट को निज ध्यान में न लाऊँ कभी
हे ईश! भारतवर्ष में शतबार मेरा जन्म हो
कारण सदा ही मृत्यु भी, देशोपकार कर्म हो
मरते ‘बिस्मिल’, रोशन, लहरी, अशफाक अत्याचार से
होंगे पैदा सैकड़ों, उनकी रुधिर की धार से
उनके प्रबल उद्योग से उद्धार होगा देश का
तब नाश होगा सर्वदा दुःख, शोक के लवलेश का।
गोरखपुर जिले में राप्ती नदी के किनारे बिस्मिल की अन्तिम इच्छानुसार बाबा राघवदास ने उनका अंतिम संस्कार कर उनके भस्मावशेष से बरहज देवरिया जिला में उनकी समाधि का वैदिक रीति से निर्माण करवाया, जहाँ उनकी अभिचित्रित रचना बड़ी ओजस्वी और सारगर्भित हो उठी-
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का, यही बाकी निंशा होगा।
इलाही वो भी दिन होगा, जब अपना राज देखेंगे
तब अपनी भी जमीं होगी और अपना आसमां होगा।।

महान क्रांतिकारी पं. रामप्रसाद बिस्मिल को शहादत दिवस पर नमन!
जय हिन्द
.....कविता रावत 

समझदार धन-दौलत से पहले जबान पर पहरा लगाते हैं

समझदार धन-दौलत से पहले जबान पर पहरा लगाते हैं

बैल  को  सींग और आदमी  को उसकी  जबान से  पकड़ा  जाता  है।
अक्सर रात को दिया वचन सुबह तक मक्खन सा पिघल जाता है।।

तूफान  के  समय की शपथें उसके थमने पर भुला दी जाती हैं।
वचन देकर नहीं मित्रता निभाने से कायम रखी जा सकती हैं।।

एक रुपये वचन की कीमत आधे रुपये के बराबर भी नहीं होती है।
वचन    और    पंख   को    अक्सर    हवा    उड़ा   ले   जाती   है।।

एक छोटा-सा उपहार बहुत बड़े वचन से बढ़कर होता है।
वचन    के  देश   में   मनुष्य   भूखा   मर   सकता   है।।

अंडे और कसमें तोड़ने में कोई देर नहीं लगती है।
तंगदिल इंसान की जबान बहुत लम्बी रहती है।।

दो बातूनी साथ-साथ बहुत दूर तक यात्रा नहीं कर पाते हैं।
समझदार धन-दौलन से पहले जबान पर पहरा लगाते हैं।।

   ....कविता रावत
गैस त्रासदी के तीस साल

गैस त्रासदी के तीस साल

देखते-देखते भोपाल गैस त्रासदी के तीस बरस बीत गए। हर वर्ष तीन दिसंबर गुजर जाता है और उस दिन मन में कई सवाल हैं और अनुत्तरित रह जाते हैं। हमारे देश में मानव जीवन कितना सस्ता और मृत्यु कितनी सहज है, इसका अनुमान उस विभीषिका से लगाया जा सकता है, जिसमें हजारोें लोग अकाल मौत के मुँह में चले गए और लाखों लोग प्रभावित हुए। वह त्रासदी जहाँ हजारों पीडि़तों का शेष जीवन घातक बीमारियों, अंधेपन एवं अपंगता का अभिशाप बना गई तो दूसरी ओर अनेक घरों के दीपक बुझ गए। न जाने कितने परिवार निराश्रित और बेघर हो गये, जिन्हें तत्काल जैसी सहायता व सहानुभूति मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिली।       
            विकासशील देशों को विकसित देश तकनीकी प्रगति एवं औद्योगिक विकास और सहायता के नाम पर वहाँ त्याज्य एवं निरूपयोगी सौगात देते हैं।  इसका सबसे बड़ा उदाहरण यूनियन कार्बाइड काॅरपोरेशन था, जिसके कारण हजारों लोग मारे गए, कई हजार कष्ट और पीड़ा से संत्रस्त हो गए लेकिन उनकी समुचित सहायता व सार-संभाल नहीं हुई। पीडितों को आखिरकार उचित क्षतिपूर्ति के लिए कानूनी कार्यवाही और नैतिक दबाव का सहारा लेना पड़ा। अगर अमेरिका में ऐसी दुर्घटना होती तो वहाँ की समूची व्यवस्था क्षतिग्रस्तों को हर संभव सहायता मुहैया कराकर ही दम लेती और उस कंपनी के खिलाफ कड़ी कार्यवाई होती। अमेरिका में ऐसे कई उदाहरण हैं, जिसमें जनजीवन को जोखिम में डालने और अनिष्ट के लिए जिम्मेदार कम्पनियों एवं संस्थानों ने करोड़ों डालरों की क्षतिपूर्ति दी।  लेकिन गरीब देशों के नागरिकों का जीवन मोल विकसित देशों के मुकाबले अतिशय सस्ता आंका जाना इस त्रासदी के नतीजों और उसके बाद सरकारी रुख से समझ में आता है।
        इस विभाीषिका से एक साथ कई मसले सामने आए, गंभीर सवाल उठे। अव्वल तो ऐसे जोखिम पैदा करने वाले कारखाने को घनी आबादी के बीच लगाने की अनुमति क्यों दी गई, जिसमें विषाक्त गैसों का भंडारण और उत्पादों में खतरनाक रसायन प्रयोग होता है। यह देश का सबसे विशाल कारखाना था, जिसमें हुई दुर्घटना ने सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक सांठ-गांठ की पोल खोल दी। यह हादसा विश्व में अपने ढंग का पहला वाकया था। हालांकि तीन दिसंबर की  विभीषिका से पहले भी संयंत्र में कई बार गैस रिसाव की घटनायें घट चुकी थी, जिसमें कम से कम दस श्रमिक मारे गए थे। दो-तीन दिसम्बर 1984 की दुर्घटना मिथाइल आइसोसाइनेट नामक जहरीली गैस से हुई। कहते हैं कि इस गैस को बनाने के लिए फोस जेन नामक गैस का प्रयोग होता है। फोसजेन गैस भयावह रूप से विषाक्त और खतरनाक है। कहा जाता है कि हिटलर ने यहूदियों के सामूहिक संहार के लिए गैस चेम्बर बनाये थे,  उनमें वही गैस भरी हुई थी। ऐसे खतरनाक एवं प्राणघातक उत्पादनों के साथ संभावित खतरों का पूर्व आकलन और समुचित उपाय किए जाते हैं। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अगर सुरक्षा उपाय के लिए ठोस कदम उठाए होते तो उस विभीषिका से बचा जा सकता था। पूर्व की दुर्घटनाओं के बाद कारखाने के प्रबंधन ने  उचित कदम नहीं उठाए और शासन प्रशासन भी कर्त्तव्यपालन से विमुख व उदासीन बना रहा। तीस बरस बीत जाने पर भी दुर्घटना स्थल पर पड़े रासायनिक कचरे को अब तक ठिकाने न लगा पाना और गैस पीडि़तों को समुचित न्याय न मिल पाना शासन प्रशासन की कई कमजोरियों को उजागर करता  है।
          ....कविता रावत