मेरा मतदान दिवस

हमारे देश में राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती के साथ ही वर्ष भर धार्मिक पर्व, त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाये जाने की प्रथा प्रचलित है। इन पर्व, त्यौहारों के अलावा पांच वर्ष के अंतराल में ‘मतदान दिवस’ के रूप में आम जनता का महोत्सव संसद, राज्य विधान सभा, नगरीय निकायों से लेकर ग्राम पंचायतों के चुनाव के रूप में हमारे सामने जब-तब आ धमकता है।  यह चुनाव रूपी पर्व घोषणा के बाद एक माह से लेकर 40 दिन तक शहर की सड़कों से लेकर गांवों की गलियों में हर दिन बारात जैसी रौनक लिए आम जनता के दिलो-दिमाग पर छाया रहता है।  
          यूँ तो मैंने शुरूआती दौर के मत पत्र के माध्यम से उम्मीदवार के चुनाव चिन्ह पर ठप्पा लगाने के जमाने से लेकर आज इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों "ईवीएम" के माध्यम से मतदाता के रूप में भाग लिया है, लेकिन इस बार 31 जनवरी 2015 को शनिवार का दिन मेरे लिए अहम रहा। क्योंकि इस दिन नगरपालिका के महापौर और पार्षद चुनाव में पहली बार मेरी मतदान अधिकारी के रूप में ड्यूटी लगी तो मुझे मतदान प्रक्रिया को प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर मिला। यद्यपि मतदान का समय सुबह 7 बजे से लेकर सायं 5 बजे तक निर्धारित था, लेकिन इसके लिए एक दिन पूर्व से बहुत सी चुनाव पूर्व तैयारियों की भागदौड़ में कब सुबह से शाम हो गई पता ही नहीं चला। कड़ाके की ठण्ड में सुबह 8 बजे लाल परेड ग्राउंड में बजे पहुंची तो वहांँ मेला जैसा दृश्य नजर आया। कोई अपना वार्ड क्रमांक तो कोई मतदान केन्द्र की टेबल ढूंढ रहा था।  कोई मोबाइल पर अपने दल के सदस्यों की खोज-खबर ले रहा था। मैं घंटे भर की मशक्कत के बाद मतदान क्रमांक टेबल पर पहुंची। उसके एक घंटे बाद मतदान सामग्री का एक थैला मिलने के पश्चात महापौर की दो ईवीएम कंट्रोल यूनिट और एक पार्षद की ईवीएम कंट्रोल यूनिट सहित प्राप्त हुई, जिसकी पूरी तरह जांच पड़ताल करने बाद लगभग 3 बजे पुलिस सुरक्षा के साथ बस द्वारा हम अपने नियत मतदान केन्द्र पर पहुंचे, तो बड़ी राहत मिली। 
          मतदान दिवस के दिन सुबह 6 बजे ठण्ड में ठिठुरते हुए मतदान स्थल पर पहुंचना चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन नियत समय पर अपने कत्र्तव्य पर पहुंचने से मन को आत्मसंतुष्टि मिली। हमारा मतदान केन्द्र एक प्रायवेट स्कूल का एक छोटा से कमरा था, जिसमें पीठासीन अधिकारी के नेतृत्व में 4 मतदान अधिकारियों को सहयोगी भूमिका निभानी की जिम्मेदारी दी गई। मतदान प्रक्रिया संबंधी पूर्ण कार्यवाही के लिए पीठासन अधिकारी जिम्मेदार होता है। सुबह मतदान के 15 मिनट पूर्व सभी उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों के समक्ष पीठासीन अधिकारी ने डेमो के लिए ईवीएम में सभी उम्मीदवारों के चुनाव चिन्ह की पुष्टि एवं ईवीएम के सुचारू संचालन की जानकारी दी। पोलिंग एजेंटों की संतुष्टि के उपरांत पीठासीन अधिकारी द्वारा कंट्रोल यूनिट को सीलबंद कर अपने हस्ताक्षर के साथ उनके भी हस्ताक्षर कराए। तत्पश्चात् निर्धारित समय सुबह 7 बजे से ईवीएम के कंट्रोल यूनिट को मतदान के लिए चालू कर दिया गया।
          मतदान प्रक्रिया के अंतर्गत पहले अधिकारी के पास मतदाताओं की सूची रहती है, जिसके आधार पर वह मतदाता पर्ची के आधार पर सूची से मिलान करता है। दूसरा अधिकारी रजिस्ट्रर में मतदाता सूची क्रमांक और पहचान पत्र अंकित कर मतदाता के हस्ताक्षर लेता है। तीसरा अधिकारी मतदाता की बांयीं हाथ की उंगली पर अमिट स्याही लगाकर मतदान के लिए पर्ची देता है। इसके बाद चैथा अधिकारी मतदाता से पर्ची प्राप्त कर ईवीएम की कंट्रोल यूनिट से ईवीएम का बटन चालू कर देता है, जहां मतदाता “मतदान प्रकोष्ठ“ में जाकर ईवीएम में अंकित उम्मीदवार के चुनाव चिन्ह के सामने का बटन दबाकर अपना पसंदीदा उम्मीदवार चुनता है।
         मैं दूसरे मतदान अधिकारी के रूप में कार्यरत थी। हमारे मतदान केन्द्र पर लगभग 600 मतदाता थे, लेकिन सायं 5 बजे तक लगभग 450 ही मतदाताओं ने अपने मत का उपयोग किया। मतदान के दौरान जब-जब कुछ मतदाता “मतदान प्रकोष्ठ“ में जाकर कहते कि, “अब क्या करना है“ तो तब-तब पीठासीन अधिकारी को बार-बार उन्हें ईवीएम में अंकित अपने पंसदीदा महापौर और पार्षद उम्मीदवार के चुनाव चिन्ह के सामने वाले बटन दबाने के लिए कहना पड़ रहा था, तो वे खिसियाते हुए जाने कौन सा बटन दबाकर भाग खड़े होते, तो यह क्षण हमारे लिए एक गंभीरता का विषय बन पड़ता कि हमारे देश में आज भी अधिकांश मतदाताओं में मतदान के प्रति भारी अज्ञानता और जागरूकता की कमी है। इस विषय में मुझे अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी का कथन स्मरण हो उठाता  कि- “जनतंत्र में एक मतदाता का अज्ञान सबकी सुरक्षा को संकट में डाल देता है।“ लेकिन हमारे भारत का अधिकांश मतदाता तो आज भी वोट के महत्व को गंभीरता से नहीं समझता है। यही कारण है कि चुनाव में उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देकर अथवा जाति, बिरादरी, क्षेत्रीयता के दबाव या शराब में मदमस्त किया जाकर भय और आतंक दिखाकर अपने पक्ष में मतदान के लिए तैयार करने की भरपूर कोशिश की जाती है। एक सर्वे के अनुसार आज भी हमारे देश में लगभग 40 प्रतिशत मतदाता अनपढ़ अथवा अशिक्षित हैं, जिनसे सोच-समझकर कर मतदान की अपेक्षा करना बेमानी है। इसके साथ ही 10 प्रतिशत मतदाता 18 से 20 वर्ष के आयुवर्ग के हैं, जिन्हें हमारी सरकारें विवाह के दायित्व वहन करने के लिए अयोग्य समझती है, लेकिन मतदान के लिए नहीं, यह स्थिति मतदान की उपयुक्तता पर पर एक प्रश्न चिन्ह है? लोकतंत्र में मतदाता का समझदार होना जरूरी है, क्योंकि इसके अभाव में सच्चे देशभक्त और त्यागी प्रतिनिधि का चुनाव संभव नहीं हो सकता। इस विषय में महान दार्शनिक प्लेटो का कहना साथक है कि- "जहां मतदाता मूर्ख होंगे, वहाँं उसके प्रतिनिधि धूर्त होंगे।" ऐसे धूर्त प्रतिनिधियों को देखकर ही बर्नाड शाॅ को कहना पड़ा कि- "सच्चा देशभक्त और त्यागी नेता चुनाव के रेगिस्तान में निरर्थकता की फसल बोते-बोते दम तोड़ देता है और धूर्त एवं छली व्यक्ति मैदान मार लेता है।" अज्ञेय जी का कहना था कि "जनतंत्र व्यवहारतः विश्वास या आस्था के ही सहारे चलता है।" लेकिन यह गंभीर दुःखद पहलू है कि आज ये दोनों शब्द ही बेमानी लगते हैं। क्योंकि जब-जब "व्यक्ति" तथा "पार्टी-स्वार्थ" से राष्ट्र का लोकतंत्र चलता है, तब-तब वहाँ लोकतंत्र की सार्थकता कई प्रश्न उठ खड़े होते हैं।
         जब चुनाव निष्पक्ष हों। धन, धमकी, जाति, सम्प्रदाय और धर्म के नाम पर मत डालने के लिए जनता को प्रेरित न करते हुए जनप्रतिनिधि सच्चाई और ईमानदारी से राष्ट्र की सेवा करने के लिए आगे आयेंगेे, तभी अब्राहम लिंकन द्वारा प्रतिपादित लोकतंत्र की परिभाषा "जनता के लिए, जनता द्वारा, जनता का शासन" की सार्थकता सिद्ध होगी।
...कविता रावत

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February 5, 2015 at 12:04 PM

मतदान विषयक बहुत अच्छी ज्ञानवर्धक जानकारी ............

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February 5, 2015 at 12:07 PM

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (06.02.2015) को "चुनावी बिगुल" (चर्चा अंक-1881)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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February 5, 2015 at 12:52 PM

नया अनुभव नयी स्फूर्ति देता है।

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February 5, 2015 at 1:18 PM

सुन्दर उपयोगी प्रस्तुति ...

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February 5, 2015 at 2:06 PM

लोकतंत्र की जान है मतदान ............
एक नया अनुभव ....अच्छा आलेख ...

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February 5, 2015 at 2:06 PM

लोकतंत्र की जान है मतदान ............
एक नया अनुभव ....अच्छा आलेख ...

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February 5, 2015 at 2:35 PM

बहुत ही सुन्दर विवरण और जानकारी से भरपूर ... यह भी जानकार अच्छा लगा की 600 मतदाताओं में से 450 मतदाताओं ने अपने अधिकार का प्रयोग किया था जो की 75% था, एह भी एक अच्छा आकड़ा है ... 100% तो शायद ही कभी हो पाए लेकिन एह ही काबिले तारीफ है ... अपने अनुभव सांझा करने के लिए आपका धन्यवाद....
मेरे ब्लॉग पर आप सभी लोगो का हार्दिक स्वागत है.

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February 5, 2015 at 3:10 PM

बहुत सुंदर प्रस्तुति.
नई पोस्ट : ओऽम नमः सिद्धम

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February 5, 2015 at 4:16 PM

सुन्दर प्रस्तुति !!!!

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RAJ
February 5, 2015 at 5:16 PM

अरे वाह! आपकी मतदान अधिकारी के रूप में ड्यूटी लगी तो आपको अच्छा लगा ..लेकिन यहाँ तो ये हाल है हम तो मारे डर के जुगाड़ कर कैंसिल करने में पीछे नहीं रहते हैं .....

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February 5, 2015 at 6:03 PM

अच्छी जानकारी शेयर की है आपने ......
अच्छा अनुभव हुआ .......

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February 6, 2015 at 5:36 AM

your writing skills and thoughts are heart touching keep it up dear
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February 6, 2015 at 1:30 PM

उपयोगी प्रस्तुति ...

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February 6, 2015 at 2:19 PM

मननीय प्रस्तुति.....

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February 6, 2015 at 4:50 PM

बहुत ही सुन्दर विवरण और जानकारी से भरपूर ..उपयोगी प्रस्तुति

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February 6, 2015 at 6:52 PM

वैचारिक और सार्थक विचार

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February 6, 2015 at 6:59 PM

सुंदर एवं ज्ञानवर्धक प्रस्तुति! मैंने एक ही बार चुनाव ड्यूटी की है और मेरा अनुभव यही रहा कि एक सरकारी कर्मचारी जैसे तलवार की धार पर चलते हुए यह ड्यूटी करता है। हो सकता है गलत बात को चुपचाप न बर्दाश्त करने के मेरे स्वभाव के कारण मुझे ऐसा अनुभव हुआ हो।

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February 7, 2015 at 10:35 PM

मतदान ज़रूरी भी हैं..... आज देश की जरूरत भी...
http://savanxxx.blogspot.in

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February 8, 2015 at 12:05 PM

इस विषय को बहुत ही विस्तार से रखा है आपने ... लोकतंत्र में न सिर्फ स्वतंत्र बल्कि हर किसी को ज्ञान होना भी जरूरी है की स्वतंत्रता कैसे लाइ जाती है .. उसकी रक्षा का होना भी , ज्ञान का होना भी जरूरी है ... जो सरकारी नौकरी में नहीं हैं उनको तो इस प्रक्रिया के बारे में पता नहीं चल पाता ... अच्छा आलेख ...

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February 8, 2015 at 2:10 PM

बहुत सरलता से गंभीर बात उठाई हैं अपने।

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February 8, 2015 at 11:14 PM

जनता का जागरूक होना ज़रूरी है...स्वस्थ लोकतंत्र के लिए...

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February 9, 2015 at 11:37 AM

लोकतंत्र में एक-एक वोट की बहुत अहमियत है। Voice Of The Electorate=VOTE...

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February 17, 2015 at 12:16 AM

मतदान उत्‍सव आपका बेहतरीन लेख है। एक एक वोट की अहमियत पता चलती है।

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February 18, 2015 at 1:01 AM

बर्नॉड शॉ की बात एकदम ठीक है.......आपको मुबारक हो मतदान अधिकारी की नियुक्ति पर। एक अधिकारी के रूप में आपने सिर्फ ड्यूटी नहीं निभाई है। मतदान की सार्थकता औऱ जमीनी हकीकत को भी साफ शब्दों में लिखा है। ये स्थिती सच में चिंता करने वाली है। वैसे ये सोचना की 40 फीसदी अशिक्षित मतदाता सोच समझ कर वोट नहीं देता, पूरी तरह से सच नहीं है। इसी अशिक्षित जनता ने इंदिरा के शासन को उखाड़ फेंका था। इस बार इसी कम पढ़ी लिखी जनता ने दिल्ली में तख्त नई पार्टी को सौंप दिया। ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव है।

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February 19, 2015 at 2:51 PM

बहुत सुंदर प्रस्तुति.

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March 1, 2015 at 12:01 PM

मतदान का दिन चुनावकर्मियों के लिए हमेशा बेहद रोमांचक रहता है ! मंगलकामनाएं आपको !

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March 23, 2015 at 7:37 PM

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November 21, 2016 at 11:01 PM

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