भगवान परशुराम

भगवान परशुराम

बचपन में हम रामलीला देखने के लिए बड़े उत्सुक रहते थे। जब-जब जहाँ-कहीं भी रामलीला के बारे में सुनते वहाँ पहुंचते देर नहीं लगती। रामलीला में सीता स्वयंवर  के दिन बहुत ज्यादा भीड़ रहती, इसलिए रात को जल्दी से खाना खाकर बहुत पहले ही हम बच्चे पांडाल में चुपचाप सीता स्वयंवर के दृश्य का इंतजार करने बैठ जाते। सीता स्वयंवर में अलग-अलग भेषभूषा में उपस्थित विभिन्न  राज्यों से आये राजा-महाराजाओं के संवाद सुनने में बहुत आनंद आता था। सीता स्वयंवर में राम जी द्वारा जैसे ही धनुष भंग किया जाता तो ‘बोल सियापति रामचन्द्र जी की जय’ के साथ ही पांडाल तालियों की गूंज उठता और हम बच्चे भी खुशी से तब तक जय-जयकार करते जब तक कोई बड़ा हमें टोक नहीं देता। इस बीच जब पांडाल के बीच से गुस्से से दौड़ते हुए परशुराम मंच पर धमकते तो वहां उपस्थित राजा-महाराज भाग खड़े होने लगते तो हम बच्चों की भी सिट्टी-पिट्टी गुल हो जाती। 
         सीता स्वयंवर में राम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद को याद कर आज भी मन रोमांचित हो उठता है। तब हम नहीं जानते थे कि भगवान राम की तरह ही भगवान परशुराम भी विष्णु भगवान के ही अवतार हैं।  सीता स्वयंवर में राम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद में जहाँ भगवान राम ने परशुराम जी के बल, शक्ति और पौरुष के साथ ही भगवान होने के विकारात्मक वृक्ष को समूल नष्ट कर उनके अंतर्मन को शुद्ध किया वहीं दूसरी ओर शेषावतारी  लक्ष्मण ने उनके धनुष के प्रति उत्पन्न मोह को उनकी वाणी में ही समझाते हुए त्यागने पर विवश कर दिया। शिव धनु भंग हुआ देख जब भगवान परशुराम अत्यंत क्रोध में थे, तब भगवान राम ने उनसे बड़ी विनम्रता से विनती की - 
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
इस पर भगवान परशुराम और क्रोधित होते हुए उनसे बोले-
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
यह सुनते हूँ शेषवतारी लक्ष्मण उन्हें याद दिलाकर कहते हैं कि - 
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें॥
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू॥
          इस प्रसंग पर शेषावतारी लक्ष्मण का कहना कि-
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
          अर्थात बचपन में ऐसे धनुष तो हमने बहुत तोड़े लेकिन तब तो आपने कभी क्रोध नहीं किया, के संदर्भ में रोचक कथा जुड़ी है-  हैहय वंशी राजा सहस्त्रबाहु ने परशुराम जी के पिता महर्षि जमदग्नि का वध इसलिए कर दिया था क्योंकि महर्षि ने राजा को अपनी कामधेनु देने से मना कर दिया था। जब परशुराम जी ने अपनी मां रेणुका को 21 बार अपनी छाती पीटकर करुण क्रन्दन करते देखा तो वे ये देखकर इतने द्रवित हुए कि उन्होंने प्रण किया कि मैं पृथ्वी को क्षत्रिय रहित कर दूंगा। इसी कारण उन्होंने सहस्त्रबाहु के साथ ही 21 बार अपने फरसे से पृथ्वी को क्षत्रिय रहित कर दिया। माना जाता कि इन क्षत्रियों से प्राप्त अस्त्र-शस्त्र, धनुष-बाण, आयुध आदि का कोई दुरूपयोग न हो इसके लिए धरती ने मां का तथा शेषनाग ने पुत्र का रूप धारण किया और वे परशुराम जी के आश्रम में गए। जहां धरती मां ने अपने पुत्र को उनके पास कुछ दिन रख छोड़ने की विनती की,  जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया, जिस पर धरती मां ने यह वचन लिया कि यदि मेरा बच्चा कोई अनुचित काम कर बैठे तो आप स्वभाववश कोई क्रोध नहीं करेंगे, जिसे परशुराम जी ने मान लिया। एक दिन उनकी अनुपस्थिति में धरती पुत्र बने शेषनाग ने सभी अस्त्र-शस्त्र, धनुष-बाण, आयुध आदि सब नष्ट कर दिए, जिसे देख परशुराम जी को पहले तो बहुत  क्रोध आया, लेकिन  वचनबद्ध होने से उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया और शेषावतारी लक्ष्मण ने भी उन्हें अपना असली रूप दिखाकर शिव धनुष भंग होने पर पुनः संवाद का इशारा किया और अंतर्ध्यान  हो गए।
          जब विश्वमित्र ने परशुराम से कहा कि लक्ष्मण को बच्चा समझ कर क्षमा कर दीजिए तो परशुराम जी बोले कि आपके प्रेमभाव से मैं इसे छोड़ रहा हूँ-  “न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें॥ जिसे सुनकर शेषवतारी लक्ष्मण हंसकर कहते हैं कि- माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें॥ सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा।। इस संवाद से संबंधित परशुराम जी के गुरु ऋण से जुड़ी रोचक कथा प्रचलित है- भगवान शिव कुमार कार्तिकेय के साथ ही परशुराम जी के भी गुरु हैं। उन्होंने ने ही दोनों को अस्त्र विद्या सिखाई। एक बार शिव ने कुमार कार्तिकेय को कैलाश पर्वत के सर्वोच्च शिखर को बेधकर मानसरोवर तक हंसों के जाने हेतु मार्ग बनवाने का काम सौंपा, लेकिन वे बहुत प्रयास करने के बाद भी सफल नहीं हुए। तब भगवान परशुराम ने अपने तीव्र वाणों से  कैलाश पर्वत के शिखर को बेधकर एक बड़ा छिद्र हंसों के आने-जाने हेतु बना दिया। परशुराम की वीरता से संतुष्ट होकर शिव ने उन्हें घर जाने की अनुमति दी, लेकिन वे गुरुदक्षिणा देने की हठ करने लगे। तब शिव ने कहा कि यदि तुम्हारा हठ है तो मेरे कंठ में पड़ी हुई मुंडों की माला, जिसमें एक मुण्ड कम है, उसके लिए एक सिर काट लाओ तो तुम्हारी गुरु दक्षिणा पूरी हो जायेगी। यह सुनकर परशुराम दंग रह गये। वे बोले- भगवान भला कौन अपना सिर काटकर देगा। तब शिवजी ने कहा कि शेषनाग के 1000 सिर हैं, उन्हीं का एक सिर काट ले आओ तो गुरुदक्षिणा पूरी हो जायेगी। गुरु दक्षिणा के लिए परशुराम ने शेषनाग का एक सिर काटने के लिए अपना पूरा बल लगा दिया लेकिन सफल नहीं हुए। इसलिए शेषावतारी लक्ष्मण स्वयंवर में उन्हें याद दिलाते हैं।  

भगवान परशुराम जयंती की हार्दिक शुभकामनाओं सहित … कविता रावत 

दलित वर्ग के प्रतिनिधि और पुरोधा थे  डाॅ. भीमराव रामजी अंबेडकर

दलित वर्ग के प्रतिनिधि और पुरोधा थे डाॅ. भीमराव रामजी अंबेडकर

डाॅ. भीमराव आम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले के अम्बावड़े गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीरामजी सकवाल तथा माता का नाम भीमाबाई था। उनके  "आम्बेडकर" नाम के मूल में एक रोचक प्रसंग है। जब उन्होंने स्कूल में दाखिला लिया तो अपने नाम भीमराव के आगे  ‘अम्बावडेकर’ लिखवाया। इस पर गुरु ने इसका रहस्य जानना चाहा तो उन्होंने बतलाया कि वे अम्बावड़े गांव का निवासी है, इसलिए अपने नाम के आगे अम्बावडे़कर लिख दिया है। गुरु जी अपने नाम के आगे "आम्बेडकर" लिखते थे, अतः उन्होंने भी भीमराव के आगे ‘आम्बेडकर’ उपनाम जोड़ दिया। उन्हें गुरु की यह बात अजीब लगी क्योंकि वे जानते थे कि नाम बदलने से उनकी जाति नहीं बदल सकती है। लेकिन वे यह सोचकर चुप रहे कि निश्चित ही गुरुजी ने कुछ सोच विचार कर ही ऐसा किया होगा। गुरु ने उन्हें  "अम्बावड़ेकर" से "आम्बेडकर" बनाकर उनके विचारों में क्रांति ला दी। उन्होंने सिद्ध कर दिखलाया कि- "जन्मना जायते शूद्रोकर्मणा द्विज उच्यते।"  
          बाबा आम्बेडकर को उनके बचपन में दलित और अछूत समझे जाने वाले समाज में जन्म लेने के कारण कई घटनाएं कुरेदती रहती थी। स्कूल में पढ़ने में तेज होने के बावजूद भी सहपाठी उन्हें अछूत समझकर उनसे दूर रहते थे, उनका तिरस्कार करते थे, घृणा करते थे। ऐसे ही एक बार बैलगाड़ी में बैठने के बाद जब उन्होंने स्वयं को महार जाति का बताया तो गाड़ीवान ने उन्हें गाड़ी से उतार दिया और कहा कि उसके बैठने से गाड़ी अपवित्र हो गई है जिससे धोना पड़ेगा और बैलों को भी नहलाना पड़ेगा। उनके पानी मांगने पर गाड़ीवान ने उन्हें पानी तक नहीं पिलाया। बचपन में उन्हें अनेक कटु अनुभव हुए जिनके कारण उनके मन में उच्च समझे जाने सवर्णों के प्रति घृणा उत्पन्न हो गई। वस्तुतः वह समय ही कुछ ऐसा था जब अछूतों के प्रति सवर्ण वर्ग की कोई सहानुभूति न थी। गंदे नालियों की सफाई करना, सिर पर मैला ढ़ोना तथा मरे जानवरों को फेंकना, उनकी चमड़ी निकालना जैसे कार्य अछूतों के अधिकार माने जाते थे। उन्हें जानवरों से भी हीन श्रेणी का दर्जा दिया जाता था। दलित जाति की यह दुर्गति देखकर ही वे दलितों के उधार के लिए दृढ़ संकल्पित हुए।  शिक्षा समाप्ति के पश्चात् वे बड़ौदा महाराजा के रियासत में सैनिक सचिव पद पर नियुक्त हुए लेकिन अपने अधीनस्थ सवर्णों द्वारा छुआछूत बरते जाने के कारण उन्होंने वह पद त्याग दिया। दलितों की उपेक्षा, उत्पीड़न और छुआछूत से क्षुब्ध होकर उन्होंने दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए राष्टव्यापी आंदोलन चलाया। उन्होंने जातीय व्यवस्था की मान्यताओं को उखाड़ फेंकने के लिए एक साहसी क्रांतिकारी भूमिका निभाई। उन्होंने  धर्म के प्रति अपना दृष्टिकोण प्रकट करते हुए कहा- “जो धर्म विषमता का समर्थन करता है, उसका हम विरोध करते हैं। अगर हिन्दू धर्म अस्पृश्यता का धर्म है तो उसे समानता का धर्म बनना चाहिए। हिन्दू धर्म को चातुर्वण्य निर्मूलन की आवश्यकता है। चातुर्वण्य व्यवस्था ही अस्पृश्यता की जननी है। जाति भेद और अस्पृश्यता ही विषमता के रूप हैं। यदि इन्हें जड़ से नष्ट नहीं किया गया तो अस्पृश्य वर्ग इस धर्म को निश्चित रूप से त्याग देगा।“  
          डाॅ. आम्बेडकर दलितों के मसीहा के साथ ही ऐतिहासिक महापुरुष भी हैं। उन्होंने अपने आदर्शों और सिद्धांतों के लिए आजीवन संघर्ष किया जिसका सुखद परिणाम आज हम दलितों में आई हुई जागृति अथवा नवचेतना के रूप में देख रहे हैं। वे न केवल दलित वर्ग के प्रतिनिधि और पुरोधा थे, अपितु अखिल मानव समाज के शुभचिंतक महामानव थे। भारतीय संविधान के निर्माण में उनका योगदान सर्वोपरि है। उन्हें जब संविधान लेखन समिति के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई तो उन्होंने कहा- "राष्ट्र ने एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी मुझे सौंपी है। अपनी पूरी शक्ति केन्द्रीभूत कर मुझे यह काम करना चाहिए।"  इस दायित्व को निभाने के लिए उनके अथक परिश्रम को लेखन समिति के एक वरिष्ठ सदस्य श्री टी.टी.कृष्णामाचारी ने रेखांकित करते हुए कहा कि-"लेखन समिति के सात सदस्य थे, किन्तु संविधान तैयार करने की सारी जिम्मेदारी अकेले आम्बेडकर जी को ही संभालनी पड़ी। उन्होंने जिस पद्धति  और परिश्रम से काम किया, उस कारण वे सभागृह के आदर के पात्र हैं। राष्ट्र उनका सदैव ऋणी रहेगा।" 
          आज लोकसभा का कक्ष उनकी प्रतिमा से अलंकृत है जिस पर प्रतिवर्ष उनकी जयंती पर देश के बड़े-बड़े नेता और सांसद अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व महान् है। वे सच्चे अर्थों में भारतरत्न हैं। उनकी जयंती संपूर्ण राष्ट्र के लिए महाशक्ति का अपूर्व प्रेरणा स्रोत है। इस अवसर पर उनके जीवन और कार्यों का स्मरण करना हम सबके लिए अपनी भीतरी आत्मशक्ति को जगाना है। आइए, हम उनकी जयंती के अवसर पर संकल्प लें कि हम उनके विचारों और आदर्शों केा अपनाकर अपने जीवन को देश-प्रेम और मानव-सेवा में समर्पित करने का प्रयास करेंगे, जो हमारी उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।  
 भक्ति और शक्ति के बेजोड़ संगम हैं हनुमान

भक्ति और शक्ति के बेजोड़ संगम हैं हनुमान

चैत्रेमासि सिते मक्षे हरिदिन्यां मघाभिधे।
नक्षत्रे स समुत्पन्नो हनुमान रिपुसूदनः।।
महाचैत्री पूर्णिमायां समुत्पन्नोऽञ्जनीसुतः।
वदन्ति कल्पभेदेन बुधा इत्यादि केचन।।
अर्थात्-चैत्र शुक्ल एकादशी के दिन  मघा नक्षत्र में भक्त शिरोमणि, भगवान राम के अनन्य स्नेही शत्रुओं का विनाश करने वाले हनुमान जी का जन्म हुआ। कुछ विद्वान कल्पभेद से चैत्र की पूर्णिमा के दिन हनुमान जी का शुभ जन्म होना बताते हैं।
वायुपुराण के अनुसार- “आश्विनस्यासिते पक्षे स्वात्यां भौमे चतुर्दशी। मेषलग्नेऽञ्जनी गर्भात् स्वयं जातो हरः शिवः।।“ अर्थात्- आश्विन शुक्ल पक्ष में स्वाति नक्षत्र, मंगलवार, चतुर्दशी को मेष लग्न में अंजनी के गर्भ से स्वयं भगवान शिव ने जन्म लिया। हनुमान जी को भगवान शिव के ग्यारहवें अवतार ’महान’ के रूप में माना जाता है। इससे पूर्व मन्यु, मनु, महिनस, शिव, ऋतध्वज, उग्ररेता, भव, काल, वामदेव और धृतव्रत दस अवतार बताये गये हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने भी दोहावली में हनुमान जी को साक्षात् शिव होना सिद्ध किया है-
जेहि सरीर रति राम सों, सोइ आदरहिं सुजान।
रुद्र देह तजि नेह बस, संकर भे हनुमान।।
जानि राम सेवा सरस, समुझि करब अनुमान।
पुरुषा ते सेवक भए, हर ते भे हनुमान।।
हनुमान जी के जन्म के बारे में एक कथा आनन्द रामायण में उल्लेखित है, जिसमें हनुमान जी  को राम का सगा भाई बताया गया है। इस कथा के अनुसार ब्रह्म लोक की सुर्वचना नामक अप्सरा ब्रह्मा के शाप से गृध्री हुई थी। राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ में जो हव्य कैकेयी को खाने को दिया था उसे यह गृध्री कैकेई के हाथ से लेकर उड़ गई। यह हव्यांशा ही अंजना की गोद में गृध्री की चोंच से छूटकर गिरा, जिसे खाने से वानरराज कुंजर की पुत्री अर्थात् केसरी की पत्नी अंजनी के गर्भ से हनुमान जी का प्राकट्य हुआ। इस गृध्री की याचना पर ब्रह्मा ने यह कहा था कि दशरथ के हव्य वितरण करते समय जब तू कैकेई के हाथ से हव्य छीनकर उड़ जायेगी तो तू उस हव्य को नहीं खा सकेगी लेकिन उससे तेरी मुक्ति हो जायेगी। ब्रह्मा के वरदान के अनुसार यह गृध्री शाप से मुक्त होकर पुनः अप्सरा बन गई। 
हनुमान जी अपार बलशाली होने के साथ ही वीर साहसी, विद्वान, सेवाभावी, स्वामीभक्त, विनम्रता, कृतज्ञता, नेतृत्व और निर्णय क्षमता के धनी भी थे। हनुमान जी को भक्ति और शक्ति का बेजोड़ संगम माना गया है। वे अपनी निष्काम सेवाभक्ति के बलबूते ही पूजे जाते हैं। उनके समान भक्ति सेवा का उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है। आइए! हनुमान जयंती के शुभ अवसर पर हनुमान चालीसा का गुणगान कर उनकी कृपा के पात्र बने- 
दोहा -श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि। बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।। बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार। बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।।
चौपाई - जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।। रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।।
महावीर विक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।। कंचन बरन विराज सुवेसा। कानन कुण्डल कुंचित केसा।। हाथ बज्र और ध्वजा बिराजै। कांधे मूंज जनेऊ साजै।।
शंकर सुवन केसरी नन्दन। तेज प्रताप महा जगबन्दन।। विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।। सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्रजी के काज संवारे।। लाय संजीवन लखन जियाए। श्री रघुबीर हरषि लाए।।
रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।। सहस बदन तुम्हरो यश गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मदि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।। जम कुबेर दिक्पाल जहां ते। कवि कोविद कहि सके कहां ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राजपद दीन्हा।। तुम्हरो मंत्र विभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्त्र योजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गए अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।। राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना।। आपन तेज सम्हारो आपै। तीों लोक हांक ते कांपै।।
भूत पिचाश निकट नहिं आवै। महावीर जब नाम सुनावै।। नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
संकट ते हनुमान छुड़ावै। मन-कर्म-वचन ध्यान जो लावै।। सब पर राम तपस्वी राजा। तिनके काम सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै।। चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु सन्त के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।। अष्ट सिद्वि नव निधि के दाता। अस वर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।। तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुःख बिसरावै।।
अंतकाल रघुबर पुर जाई। जहां जनम हरि भक्त कहाई।। और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेई सर्व सुख करई।।
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।। जय जय जय हनुमान गुसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।
जो शत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महासुख होई।। जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महं डेरा।।
दोहा-  पवन तनय संकट हरण, मंगल मूरति रूप।
         राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
                        इति श्री हनुमान चालीसा।

अतुलितबलघामं हेमशैलाभदेहं, दनुजवनकृशानुं शानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं, रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।

हनुमान जयंती की हार्दिक मंगलकामनाएं!
                                    ... कविता रावत

महावीर जयंती

महावीर जयंती

महावीर स्वामी का जन्म 599 ई.पू. वृजिगण के क्षत्रिय कुल में वर्तमान बिहार राज्य के कुण्ड ग्राम में हुआ। इनकी माता त्रिशला वैशाली राज्य के पराक्रमी लिच्छवी नरेश की पुत्री थी। महावीर का बचपन का नाम वर्धमान था। "आचारांग सूत्र" के अनुसार महावीर की पत्नी का नाम यशोधरा और पुत्री का नाम प्रियदर्शनी था। अपने उदासीन प्रकृति के कारण लगभग तीस वर्ष की आयु में वे अपने बड़े भाई नन्दीवर्धन से आज्ञा लेकर सांसारिक वैभव से विरक्त होकर वन को चल दिए। गृह त्याग कर इन्होंने बारह वर्ष की कठोर और कष्ट-साध्य तपस्या के उपरांत श्रीम्भीक नामक गांव के बाहर ऋजुपालिका नदी के उत्तरी तट पर "कैवल्य" अर्थात मोक्ष प्राप्त किया और तब से वे अर्हंत अर्थात् पूज्य, जिन, विजेता, बंधनमुक्त महावीर कहलाये।  
          जैन धर्म का साहित्य में बहुत बड़ा योगदान है। जैन धर्म ने प्राकृत भाषा में 84 ग्रन्थों की रचना की है, जिसमें 41 सूत्र, अनेक प्रकीर्णक, 12 निर्युक्ति और एक महाभाष्य है। सूत्रों में 11 अंग, 12 उपांश, 5 छेद, 5 मूल और 8 प्रकीर्णक रचनाएं हैं, जिनकी भाषा अर्ध मागधी है। प्रकाण्ड विद्वान हेमचन्द्र भी जैन थे। द्वादश अंग के अंतर्गत “आचारांग सूत्र“ अन्यन्त महत्वपूर्ण है। यह ग्रन्थ जैन साधु और साध्वियों की आचार संहिता है। भगवतीसूत्र में जैन धर्म के सिद्धान्तों के अतिरिक्त स्वर्ग व नरक का विशद् विवरण मिलता है। जैन धर्म ग्रन्थों पर लिखित हरिभद्र स्वामी, शान्ति सूरी, देवेन्द्र गणी तथा अभयदेव की टीकाओं का बहुत महत्व है। 
         जनश्रुति के अनुसार ऋषभदेव से लेकर महावीर तक चौबीस तीर्थंकर हुए, जिनमें अन्तिम दो पार्श्वनाथ और महावीर की ऐतिहासिकता को पाश्चात्य विद्वान  भी स्वीकार करते हैं। महावीर ने अपने पूर्वगामी तेईस तीर्थंकरों के ही मत का प्रतिपादन किया। वे अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और अस्तेय नामक चार नियमों के साथ ही ब्रह्मचर्य पर भी जोर देते हुए मोक्ष मार्ग की शिक्षा देते थे। महावीर स्वामी जी देशाटन को ज्ञानार्जन का सर्वश्रेष्ठ साधन मानते थे। इसलिए उनका कहना था कि मनुष्य को अपने जीवनकाल में देशाटन अवश्य करना चाहिए। महावीर स्वामी हमें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मार्गदर्शन कराते हैं। उनकी दी गई शिक्षाओं में से यदि हम एक भी शिक्षा अंगीकार कर लें तो जीवन धन्य हो जायेगा। उनकी जयंती के अवसर प्रस्तुत हैं उनके उपदेश के कुछ अंश-
  • अपनी आत्मा को जीतना सब कुछ जीतना है।
  • क्रोध प्रेम का नाश करता है, माया मित्रता का नाश करती है, लोभ सभी गुणों का। 
  • जिस प्रकार कमल जल में पैदा होकर जल में लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार जो संसार में रहकर काम-भोगों से अलिप्त रहता है, उसे साधक कहते हैं।
  • शरीर को नाव कहा है, जीव को नाविक और संसार को समुद्र। इसी संसार समुद्र को महर्षि लोग पार करते हैं।
  • स्त्री, पुत्र, मित्र और बंधुजन सब जीते-जी के ही साथी है, मरने पर कोई भी साथ नहीं जाता है।
  • जो मनुष्य अपना भला चाहता है, उसे पाप को बढ़ाने वाले क्रोध, मान, माया, लोभ इन दोषों को छोड़ देना चाहिए।
  •  ज्ञानी होने का सार  यही है कि वह किसी भी प्राणी की हिंसा न करे।
  • जिस मनुष्य का मन अहिंसा, संयम, तप, धर्म में सदा लगा रहता है, उसे देवता नमस्कार करते हैं।
  • प्रत्येक साधक प्रतिदिन चिन्तन करे- मैने क्या कर लिया है और क्या करना शेष है, कौन सा ऐसा कार्य है, जिसको मैं नहीं कर पा रहा हूँ, इस पर विचार करें।
  • आत्मा ही अपने दुःख-सुख का कर्त्ता तथा भोक्ता है।
  • सिर काटने वाला शत्रु भी उतना अपकार नहीं करता, जितना की दुराचार में आसक्त आत्मा करती है।
  •  हे जीव! तू अजर-अमर है, महाशक्तिशाली है और सम्पूर्ण है, लेकिन दिखने वाला जगत् क्षणिक है, असमर्थ और निःसार है। तू इससे न्यारा है और यह तुझसे न्यारा है। 
  • तू शरीर को स्व आत्मा और विषयभोग का सुख, परिग्रह को सम्पदा, नाम को वैभव, रूप को सुन्दरता, पशुबल को वीरता मानता है। यह गलत है।

                                                     महावीर जयंती की हार्दिक शुभकामनायें!