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September 10, 2015 at 1:54 PM

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (11.09.2015) को "सिर्फ कथनी ही नही, करनी भी "(चर्चा अंक-2095) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

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September 10, 2015 at 3:36 PM

सार्थक विचार ..... हिंदी का मान बना रहे

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September 10, 2015 at 3:49 PM

हिंदी हैं हमवतन हैं ..हिन्दोस्तान हमारा हमारा ..

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RAJ
September 10, 2015 at 6:00 PM

हिंदी है देश का अभिमान
इससे होगा देश का उत्थान

उत्तम आलेख

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September 10, 2015 at 6:13 PM

सार्थक लेखन

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September 10, 2015 at 9:14 PM

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, परमवीरों को समर्पित १० सितंबर - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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September 10, 2015 at 11:51 PM

मातृभाषा के दृष्टिकोण से आधुनिक हिंदी के जनक भारतेंदु की ये पंक्तियाँ महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हैं. हिंदी को आज भी वह स्थान नहीं मिल पाया है जिसकी वह हक़दार है. ब्रितानी हुकूमत के समय अंग्रेजी का जो महत्व था उससे कही अधिक आज है. अपने ही देश में हिंदी उपेक्षित है. भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की जयंती (९ सितम्बर) पर सुन्दर और सार्थक आलेख के लिए धन्यवाद.

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September 11, 2015 at 7:07 AM

बहुत उम्दा विचार...प्रकाशन हेतु बधाई!!

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September 11, 2015 at 10:03 AM

हिंदी देश की पहचान और अभिमान है.

प्रकाशन के बधाई.

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September 11, 2015 at 11:05 AM

Bahut khoob. Badhai.

Shubhkamnayen

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September 11, 2015 at 11:49 AM

हिंदी दिवस की बधाइयाँ

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September 11, 2015 at 1:58 PM

वाह बधाई ......प्रकाशन के लिए

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September 12, 2015 at 10:24 PM

जी हाँ हिंदी भाषा का मान -सम्मान बना रहना बहुत जरुरी है । प्रकाशन के लिए बधाई ।

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September 14, 2015 at 12:09 PM

बिलकुल सहमत हूँ इस बात से की निज भाषा की उन्नति से देश, समाज औरर खुद की प्रगति भी निश्चित है ... सार्थक आलेख ...

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September 14, 2015 at 5:33 PM

सार्थक आलेख के लिए धन्यवाद.

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September 14, 2015 at 9:05 PM

मातृभाषा का जो न करे सम्मान वह कैसे जुड़ेगा अपनी संस्कृति से.

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September 16, 2015 at 10:52 AM

हिंदी भाषा का मान -सम्मान बना रहना बहुत जरुरी है

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