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RAJ
October 20, 2015 at 11:32 AM

सुन्दर बहुत सुन्दर
माता रानी की जय!

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October 20, 2015 at 3:21 PM

जय माता रा नी की...
जय श्री राम....

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October 20, 2015 at 3:28 PM

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (21-10-2015) को "आगमन और प्रस्थान की परम्परा" (चर्चा अंक-2136) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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October 20, 2015 at 4:55 PM

माँ की शक्ति और भक्ति का उत्सव दुर्गोत्सव की धूम पर बच्चें क्या बड़े भी समय निकाल ही लेते हैं ...इन दिनों धूम मची है शहर में .......बहुत अच्छा लगा पढ़के

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October 20, 2015 at 8:06 PM

सुन्दर पोस्ट , बच्चे तो हर पर्व की रौनक होते हैं ।

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October 20, 2015 at 9:48 PM

बच्चों के बिना त्योहारों के कोई रंग नहीं होते हैं .........!

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October 21, 2015 at 12:14 AM

सच कहा। बच्‍चों के बिना तो त्‍यौहार फीके ही लगते हैं।

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October 23, 2015 at 10:37 PM

कविता जी मैं जानना चाहता हुं कि आपके साहित्य पुरस्कार लौटाने वाले साहित्यकारो के लिए क्या राय है।

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