अपना अपना दीपावली उपहार

ये जो तंग गली
सड़क किनारे बिखरा
शहर की बहुमंजिला इमारतों
घरों से
सालभर का जमा कबाड़
बाहर निकल आया
उत्सवी रंगत में
उसकी आहट से
कुछ मासूम बच्चे
खुश हो निकल पड़े हैं
उसे समेटने
यूँ ही खेलते-कूदते
आपस में लड़ते-झगड़ते
वे जानते हैं
त्यौहार में मिलता है
हर वर्ष सबको
अपना अपना दीपावली उपहार!
                             ...कविता रावत


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November 6, 2015 at 10:10 AM

वो उसी में ख़ुशी ढूँढ लेते हैं

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November 6, 2015 at 10:46 AM

सत्य कहा है आपने...

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November 6, 2015 at 11:39 AM

बस संतुष्टि की बात है ..ख़ुशी एक पल में मिल जाती है

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November 6, 2015 at 2:14 PM

हमारे सालभर के जमा कबाड़ से उपहार ढूंढ़ लेना ही जिनका नसीब है उनके लिए हम अपने और से थोड़ा बहुत भी कुछ कर लेंगे तो उनकी भी दीपावली हो जाएगी ख़ुशी से ......

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November 6, 2015 at 2:43 PM

सुखद अहसास |

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November 6, 2015 at 4:22 PM

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (07-11-2015) को "एक समय का कीजिए, दिन में अब उपवास" (चर्चा अंक 2153) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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November 6, 2015 at 6:51 PM

क्योंकि वे जान गए हैं
हर वर्ष उनके भाग्य का
सुनिश्चित है
अपना अपना दीपावली उपहार!
......
त्यौहार में खुश होने का कोई तो बहाना मिल ही जाता है सबको .....

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November 6, 2015 at 7:08 PM This comment has been removed by the author.
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November 6, 2015 at 7:13 PM This comment has been removed by the author.
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November 6, 2015 at 7:22 PM

आपकी इस पोस्ट की चर्चा कल 7/11/2015 को htttp://hindicharchablog.blogspot.com "हिंदी चर्चा ब्लॉग" पर की जाएगी ।
आपका स्वागत है ।

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November 6, 2015 at 8:06 PM

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, आज बातें कम, लिंक्स ज्यादा - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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November 7, 2015 at 12:19 AM

बहुत खूब। बहुत ही शानदार।

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November 7, 2015 at 12:16 PM

उत्सव के नये नये रंग।

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November 7, 2015 at 2:09 PM

उत्सव तो उत्सव है.

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November 7, 2015 at 4:31 PM

kya khoob...jo jis parivesh me rahta hai usi me khushi dundh leta hai..

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November 7, 2015 at 9:06 PM

कड़वा सच....सुंदर लि‍खा

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November 7, 2015 at 10:03 PM

हकीकत को बयां किया है,आपने.

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November 9, 2015 at 10:35 AM

एक ऐसा सच जिसे मानने का दिल न करे. काश सभी को सम्मानजनक जीने का मौका मिले.

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December 13, 2015 at 1:32 PM

बहुत खूब ,ख़ुशी स्थान और परिवेश की शायद मोहताज़ नहीं होती .वाह .

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