अन्धेरी राहों का चिराग   (भाग-दो)

अन्धेरी राहों का चिराग (भाग-दो)

समय बीतता गया। रमा परिस्थितियों के अनुकूल ढल गई। इसी आस में सब कुछ सहन करती रही कि एक दिन उसके दिन फिरेंगे। जब उसका बेटा बड़ा हुआ तो घर में बहू आ गई तो उसे लगा उसके अच्छे दिन आ गये। लड़का शहर कमाने गया तो कुछ दिन बहू के साथ ठीक-ठाक चलता रहा। लेकिन यह बहुत समय तक नहीं चला, पति और ननद के हौसले से बहू बात-बात पर उससे झगड़ने लगी, उसे कामचोर कहने लगी तो उसका दिल बैठने लगा। उसे बहू से ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी। एक बार रमा के सिर फिर दुःखों की गठरी लद गई। वह चुपचाप सब कुछ झेलती रही, इस आस में कि एक दिन जब उसका बेटा शहर से घर वापस आयेगा तो बहू को समझा-बुझाकर सब कुछ ठीक कर देगा। 
         रमा का बेटा शहर में एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था। उसे साल भर में एक बार ही बमुश्किल छुट्टी मिलती थी। जब वह गर्मियों के दिन छुट्टी लेकर घर आया तो रमा को बहुत खुशी हुई। उसने एक दिन अपनी आप-बीती उसे सुनाई, लेकिन उससे पहले ही घर के अन्य सदस्यों ने उसके कान भर दिए थे, इसलिए वह उल्टे अपनी मां को समझाने लगा कि सबके साथ अच्छा रहा कर, हर घर में थोड़ी बहुत कहासुनी चलती रहती है। तू किसी भी बात को राई का पहाड़ मत बनाया कर आदि-आदि। रमा समझ गई कि जब बेटा मां को समझाने लगे तो फिर वह अपना न रहकर किसी और का हो जाता है। अपने जिगर के टुकड़े की बातें सुनकर वह निराशा और दुःख में डूब गई। उसका दुःख यहीं खत्म नहीं हुआ। एक दिन पास के गांव में मेला लगा, जहां उसकी बहू जा रही थी, लेकिन उसे अपनी साड़ी नहीं मिल रही थी तो वह रमा के पास आकर बोली- “मेरी साड़ी कहांँ गई, क्या तुमने देखी उसमें मैंने रुपये भी रखे थे। कहीं तुमने तो नहीं चुरा ली?“
         अकस्मात् सरासर झूठे आरोप सुनकर रमा तिलमिला उठी-“ अब मेरे ये दिन आ गये कि मैं तेरी साड़ी चुराऊँ? पैसे चुराऊँ।“
हल्ला सुनकर यशोदा भी पास आ धमकी-“ जरूर इसने ही चुराई होगी और दूसरा कौन है यहांँ?“
          रमा से रहा नहीं गया वह दौड़कर अपने बेटे के पास गई। उसके मन में इतना विश्वास बाकी था कि उसका बेटा कम से कम इस झूठे आरोप में ननद और बहू का साथ नहीं देगा। वह बेटे से कुछ कह पाती इससे पहले ही शंकर बीच में आ धमका- “क्यों इतना चिल्ला चोट मचा है? क्या बात है? कोई मुझे भी बतायेगा कि नहीं?“ इस बीच उसका बेटा और यशोदा भी वहां पहुंच गई। यशोदा ने आते ही सुनाना शुरू कर दिया- “लो पूछ लो महारानी जी को। बहू के कपड़े और रुपये चुराकर भोली बन रही है।“ इतना सुनकर शंकर को बड़ा गुस्सा आया। बात-बात में दो-चार लात-घूसे जमाने का आदि होने से वह रमा को मारने लपका कि बीच में बेटा आ गया। बेटे ने पास जाकर पूछा -“क्या हुआ माँ! तू ही सच-सच बतला दें!् क्या तूने सचमुच चोरी की?“
“नहीं बेटा! चोरी जैसा घिनौना काम मैं सपने में भी नहीं कर सकती।“ यह सुनते ही यशोदा बड़बड़ाई-“बड़ी आयी सपने वाली, इसको तो आदत ही पड़ गई है चोरी करने की।“ शंकर ने भी हाँ में हाँ मिलाई तो वह जड़वत हो गई। “मां क्या ये सच है कि तू पहले भी चोरी करती आई है।“ बेटे ने उसे झिंझौड़ते हुए पूछा- “नहीं रे! तू भी इनकी बातों में आ गया, उन पर विश्वास करने लगा जो हमेशा मुझे इस घर से निकालने की फिराक में रहते हैं, जाने किस जन्म का बैर निकाल रहे हैं मुझसे।“ वह फूट-फूटकर रोने लगी। 
बेटा, बहू, ननद और पति की प्रताड़ना से दुःखी होकर वह चुपचाप दूर कहीं भाग जाने की सोच निकलने लगी तो बेटा चिल्लाया -“कहां जा रही है, बताती क्यों नहीं तू।“ बेटे की बौखलाहट से परेशान होकर उसके मुंह से बरवस ही बोल फूट पड़े- “हां मैंने चोरी की। तू भी अपने बाप जैसे ही निकला।“
         इतना सुनते ही बेटे ने उसका हाथ पकड़ा और उसे धक्का मारते हुए कहा-“चली जा, फिर कभी घर मत आना?“ यह सुनकर रमा तो घर आंगन में दहाड़े मार रोने लगी, जिसे देखकर यशोदा, बहू और शंकर खुश दिख रहे थे। आस-पास के लोग तमाशा देखने इकट्ठे हो गये। रमा का दिल बैठ गया। उसने सोचा भी नहीं था कि उसका जिस पर सहारा था वह इतना बेरहम और निर्लज्ज होगा कि उसे धक्के मारकर घर से बाहर कर देगा। बेटा बहू को लेकर मेला चला गया और घर वाले अपने कामकाज में लेकिन रमा वहीं सीढि़यों पर दिनभर रोती कलपती रही। उसकी ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। जैसे-तैसे दिन कटा और शाम हुई तो रमा भारी मन से उठी और अपनी सबसे अच्छी साड़ी पहनकर गौशाला की ओर निकल पड़ी। गौशाला पहुंचकर वह बहुत सारा बाहर पड़ा सूखा घास-फूस गौशाला के अंदर समेटने लगी तो पास के गौशाला वाली औरत को शंका हुई कि आज इसे क्या हो गया जो इतना घास गौशाला के अंदर भर रही है। पास जाकर उसके पूछने पर वह बड़ी लापरवाही से बोली-“रोज-रोज घास को बाहर से अंदर करो, तंग आ गई हूं यह सब करते-करते। यह रोज-रोज का झंझट.....अब बर्दाश्त नहीं होता।“
“रोज-रोज का झंझट“ पड़ोसी समझी नहीं।
“हाँ रोज-रोज का झंझट नहीं तो और क्या है?“ वह घूरते हुए बोली तो पड़ोसन ने सोचा आज इसका दिमाग खराब है, चुप रहने में ही भलाई है। वह शंकित मन अपने घर निकल पड़ी। रमा ने भी गौशाला को बंद किया और घर आ गई। आज न तो उससे किसी ने बात की और नहीं खाने को पूछा। बेटा-बहू मेले से बहुत सी चीजे खरीद कर लाये, लेकिन उसे किसी ने नहीं पूछा। एक बार भी उसे मां के कमरे में झांकने की जरूरत महसूस नहीं हुई। वह दुःखी मन से सबके सोने का इंतजार करने लगी। जैसे ही सब घरवाले सो गये, उसने भारी मन से चुपके-चुपके दबे पांव अपनी मां के घर की राह पकड़ी। कुछ ही देर में वह अपनी मां के घर पहुंच गई। उसने इधर-उधर झांकते हुए जैसे ही भराई आवाज में “मां! दरवाजा खोल।“ कहा।
उसकी बूढ़ी मां ने आशंकित होकर तुरन्त दरवाजा खोला-“इतनी रात गई, क्यों आई?“। “कहाँं से आऊंगी! भाग फूटे हैं मेरे! मैं तुझसे कहती थी न कि जैसे बाप वैसा ही बेटा भी निकलेगा तो मैं क्या करूंगी। लेकिन तू कहती रही ऐसा कुछ नहीं होगा। क्यों ब्याह दिया तूने मुझे उस घर में।“ एक सांस में कहते हुए रमा उससे लिपट गई। “क्या करती मैं बेटी, मैं भी तो मजबूर थी, गरीब की कौन सुनता है।“ 
        दोनों मां-बेटी यूं ही बहुत देर तक अपने दुःखों की सुनते-सुनाते रहे। रमा बोली- “मां अब मैं तेरे साथ ही रहूंगी। अब उस घर कभी नहीं जाऊँगी?“ यह सुनकर उसकी मां ने उसे समझाया- “देख बेटी, हम एक ही गांव में रहते हैं, अगर मैं दूसरे गांव रहती तो तुझे अपने घर रखने में मुझे कोई परेशानी नहीं होती, लेकिन एक ही गांव में रहकर गांव वालों के बीच रहकर किस-किस को जवाब देती फिरूंगी। हुक्का पानी बंद हो जायेगा तो हम तो पहले ही मर जायेंगे?“ “ठीक है तू क्यों मेरे लिए अब इस बुढ़ापे में दुःख झेल पायेगी। मैं ही चली जाती हूँ सबसे दूर.......हमेशा के लिए।“  यह कहते हुए उसने बाहर से दरवाजे पर सांकल डाली और वहीं बाहर दरवाजे पर अपने शरीर पर लिपटे कुछ जेवर उतारकर रख गई।
         माँ अंदर ही अंदर चिल्लाती रही लेकिन रमा कठोर मन से गौशाला की ओर निकल पड़ी। उसनेे बड़ी निष्ठुरता से यह कदम उठाया कि वह आज पहले गौशाला को जलाकर खाक कर देगी और फिर घर जाकर सारे घर को आग में झौंक कर फांस लगा लेगी। उसे अंधेरी राहों में कोई चिराग जल उठने की आस शेष न रही। पति, ननद और बहू को तो वह इसलिए झेलती रही क्योंकि उसे वे कभी भी अपने नहीं लगे, लेकिन जब उसके जिगर के टुकड़े ने उसे कटु वचन और उपेक्षा का दंश मारा तो उसकी सोचने-समझने की शक्ति कुंद हो गई और जीने की इच्छा जाती रही। उसने वहीं पहले से ही जमा घास-फूस पर आग लगा ली और छुपते-छुपते घर की ओर निकल गई। कुछ ही पल में गौशालाा धू-धू कर जल उठा। रमा के जाने के बाद उसकी मां ने जैसे-तैसे दरवाजे का सांकल खोला और सीधे प्रधान के घर पहुंची। उसके हाथ में रमा के जेवर की पोटली थी। उसने प्रधान का दरवाजा खटकाया तो आधी रात को किसी अनहोनी की आशंका के चलते प्रधान से फौरन दरवाजा खोला। सामने रमा की मां हड़बड़ाई खड़ी थी। रमा की बात चली तो दोनों आशंकित होकर शंकर की घर की ओर निकल पड़े। वे अभी बाहर आकर कुछ कदम ही होंगे कि प्रधान अंधेरी रात में उजाला दिखा तो उसकी नजर गौशाला की ओर गई जोे धू-धू कर जल रहा था। वह चिल्लाया- “अरे बाप रे! ये क्या हो रहा है!“ उसने गौशाला की ओर इशारा करते हुए कहा-“हो न हो ये आग रमा ने ही लगाई होगी।“ दोनों दौड़ते-दौड़ते, हांफते-हांफते शंकर के दरवाजे पर पहुंचे और जोर-जोर से दरवाजा खटकाते हुए -“शंकर! शंकर! जल्दी उठ, जल्दी उठ, देख! तेरे गौशाला में आग लग गई है।“ चिल्लाने लगे। शोरगुल सुनकर शंकर बदहवास उठा और जोर-जोर से दहाड़ मारते हुए गौशाला की ओर भागा। उसके चीखने-चिल्लाने से पूरा गांव जाग गया और उसके पीछे-पीछे बर्तन-भांडों में पानी भर-भर गौशाला की ओर भागने लगे। लोगों ने अंदर-बाहर धू-धू कर जलते गौशाला में पानी डालकर आग तो बुझा ली लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी, अंदर गाय, भैंस, बैल सभी जानवरों का तड़फ-तड़फकर दम निकल चुका था। सब खाक हो गया। शंकर की मां, यशोदा और बेटे-बहू बिलख-बिलख, दहाड़े मार सबको यकीन कोशिश दिलाने की कोशिश में थी कि रमा आग लगाकर भाग गई है। 
         सब लोग गौशाला में हुए नुकसान की बातें करते हुए अपने-अपने घरों की ओर निकल गये। क्या वाकई रमा आग लगाकर भाग गई? यह जानने को कोशिश किसी ने नहीं की और आपस में बातें  करते-करते एक-एक कर खिसकते चले गए।  बहुत से गांव वाले उसकी व्यथा समझते थे, लेकिन वे लाचार और बेवस थे। सब प्रधान व शंकर की दबंगई के चलते मौन रहने में ही अपनी भलाई समझते। बदहवास शंकर अपने मृत जानवरों के बीच रमा को तलाशने लगा, लेकिन वह न मिली तो वह उल्टे पांव घर की ओर भागा। घर आकर उसने रमा को मारने के इरादे से बाहर रखी कुल्हाड़ी उठाई और आग बबूला हो उसके कमरे की ओर लपका। इससे पहले कि वह अपने मंसूबों में सफल होता, उसने देखा कि रमा जमीन पर बेजान चिराग हाथ में लिए मृत पड़ी हुई है। चेहरे पर आत्मसंतुष्टि भरी स्मित् मुस्कान लिए मानो कह रही हो यही तो था मेरी अंधेरी राहों का चिराग

समाप्त !
......कविता रावत 

अन्धेरी राहों का चिराग

अन्धेरी राहों का चिराग

निष्ठुर सर्दी का मौसम। सुबह तड़के रमा घर की एक सुनसान अन्धेरी कोठरी में चिमनी के सहारे भारी दुःखी मन से चक्की पीसे जा रही थी। बाहर ठंड का प्रकोप बढ़ता जा रहा था। आसमान गरज-चमक दिखाकर ओले बरसा रहा था। सारा गांव ठंड से अपने घरौंदों में दुबका हुआ था। परिवार के अन्य सदस्य भी नींद के आगोश में थे। रमा सबसे बेखबर चुपचाप चक्की के साथ ही हुए अपनी उपेक्षित, तनाव व कडुवाहटभरी जिन्दगी के बारे में सोच-सोच पिसी जा रही थी। 
बाहर घोर अन्धकार छाया था। रमा सारा अनाज पीसकर गौशाला में जानवरों को चारा डालने और भैंस दुहने के लिए अंधेरा छंटने का इंतजार करने लगी। ओले गिरने बन्द हुए ही थे कि तेजी से बर्फ गिरनी लगी, जिससे ठंड और बढ़ती चली गई। रमा ने जैसे ही दरवाजा खोला उसे सीढि़याँ और आंगन के साथ-साथ पेड़-पौधे भी सफेद चादर ओढ़े मिले। बर्फ गिरना बंद हुआ तो रमा बाल्टी लेकर नंगे पैर उस भयानक ठण्ड में गौशाला की ओर चल पड़ी। वह जल्दी-जल्दी अपने कंपकपाते कदम गौशाला की ओर बढ़ाये जा रही थी। ठंड से उसका बदन सुन्न हुआ जा रहा था।  गौशाला में पहुंचते ही जब उसने आग जलाई तो उसे ठंड से कुछ राहत मिली। जानवरों को घास-पात देकर और भैंस दुहने के बाद उसने घर की राह पकड़ी। गौशाला से बाहर निकलते ही फिर वह ठंड की चपेट में थी। ठिठुरते हुए उसके दांत किटकिटा रहे थे। सारा बदन कंपकंपा रहा था। वह इस आस में घर की ओर तेजी से अपने कदम बढ़ा रही थी कि शायद जल्दी घर पहुंचकर उसे राहत मिल जाय। किन्तु ऊपर वाले ने उसका ऐसा भाग्य रचा ही न था। अभी उसने घर के आंगन में पांव धरे ही थे कि उसके कानों में जो कर्कश और चुभते शब्द सुनाई दिए, उन्हें सुनकर उसके पांव जहां की तहां ठिठक गये- ’अभी तक नहीं आई महारानी जी, न जाने क्या करती रहती है? जहाँं जायेगी वहीं चिपक जायेगी, मैं तो तंग आ चुकी हूँ इससे।’ और फिर ’अरे शंकर! देख के आना जरा अपनी देवी जी को। सुबह-सुबह मनहूस गई कहां? देख! कहीं मर तो नहीं गई।’
          ‘कहाँ गई होगी मां जी? अपनी मौसी के पास बैठी होगी अड्ड मारकर। अभी जाता हूँ। देखता हूं वहां क्या चुगली कर रही है?“ और इसी के साथ शंकर ने तेजी से गुस्से में जैसे ही बाहर कदम बढ़ाये तो सामने रमा को देखते ही बरस पड़ा- “कहां मर गई थी इतनी देर तक? तुझे फिकर है कि नहीं घर द्वार की?“ बेचारी रमा अवाक उसका मुंह ताकते रही, बोली कुछ नहीं। जानती थी कि कुछ बोलूंगी तो सुबह-सुबह बखेड़ा खड़ा हो जायेगा और जानवरों की तरह मार पडे़गी। उसने चुपचाप घर के अंदर घुसने में ही अपनी भलाई समझी। घर में उसकी ननद यशोदा जो कि अपने ससुराल से एक बार भागकर जो आई तो फिर यहां घर की मालकिन बन बैठी, चूल्हे के पास पसरकर आग सेंक रही थी। दो भाईयों की इकलौती बड़ी बहिन होने से उसका सारे घर में हुक्म चलता था। रमा बेचारी ठंड से कांपती हुई चूल्हे के पास खड़ी क्या हुई कि वह बरस पड़ी-“तो आ गई महारानी! आ बैठ जा? अपनी हड्डियां अच्छी से सेंक ले तू भी। ठंडा गई होगी न?“ रमा को यशोदा के कडुवे बोल चुभे तो वह बिफर पड़ी- “बाहर निकलकर काम करके देखो तब पता चले? अंदर ही अंदर बस हुकम भर चलाना है?   
        रमा का इतना क्या कहना था कि यशोदा ने सुबह-सुबह सारा घर आसमान पर चढ़ा लिया, लगी चिल्लाने- “अरे शंकर!“ सुनता है कि नहीं?
“क्या हुआ दीदी?“ शंकर भागता आ धमका।
“पूछता है; क्या हुआ?“ सुना तूने! ये चुडै़ल मुझे क्या कह रही है?“
“क्या कहा इस कमीनी ने तुझे?“ शंकर ने आवेश में आकर रमा के बाल झिंझोड़ते हुए पूछा।  “कहती है कि तू सिर्फ हुकम चलाना जानती है। काम-धाम कुछ नहीं करती।“ यशोदा ने आपत्ति दर्ज की।
“तेरी ये मजाल चाण्डाल कहीं की। निकल जा .... मेरे घर से। निकल अभी... अभी निकल ... तेरी इस घर को कोई जरूरत नहीं। तू क्या सोचती है तू नहीं रहेगी तो हम भूखों मर जायेंगे। निकल जा .... जा।“ शंकर उसके बाल बेदर्दी से झिंझोड़ते हुए उसे घसीट-घसीट कर बाहर ले आया और लगा पीटने।
बेचारी रमा बुरी तरह मार खाकर रोती कलपती रही लेकिन यशोदा का दिल बिल्कुल नहीं पसीजा। सुबह-सुबह चिल्ला चोट सुनकर आस-पडोस वाले इकट्ठा होकर तमाशबीन बन  खुसर-फुसर करने लगे तो यशोदा दौड़ी-दौड़ी शंकर के पास गई और रमा को बचाने का उपक्रम करते हुए बोली- “अरे क्यों मार रहा है? छोड़ दे.... इंसान रहती तो कुछ समझती। जानवर को कितना भी मारो वह फिर अपनी चाल पर आ जाता है?“ फिर लोगों को सुनाते हुई बोली- “देख! कैसा तमाशा देख रहे हैं लोग! कुछ तो ख्याल कर! कल को सभी यही कहेंगे कि बेचारी को मारते रहते हैं। लक्षण तो इसके किसी को देखने हैं नहीं?“ यशोदा की बात मानकर शंकर ने रमा को तो छोड़ दिया किन्तु रमा अपनी ननद के कटु वचन सुन सुबकते-सुबकते गुस्साई- “क्या लक्षण हैं मेरे? बता तो जरा सब लोगों को, वे भी तो देखे आज!“ घायल शेरनी की तरहवह एकाएक पास पड़ी दरांती की ओर लपकी और उसे लहराते हुए चीखी-“बता! नहीं तो तेरे अभी सारे गांव वालों के सामने टुकड़े-टुकड़े कर दूँगी।“ 
“है अपने बाप की बेटी“ यशोदा अपना सिर रमा की ओर झुकाकर बौरायी-“धौंस दिखाती है गांव वालों की .....कर मेरे टुकड़े?“ 
         रमा का दुस्साहस देखकर शंकर का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। उसका चेहरा तमतमा उठा, आंखे बाहर निकल आयी। उसने रमा को कच्चा चबा डालने वाली निगाहों से तरेरा और दांत पीसते हुए उस पर बाज की तरह झपटा- “जरा हाथ तो बढ़ा, यहीं अभी तेरे हाथ काटकर कुकुरों को नहीं खिला दिया तो मैं अपने बाप की औलाद नहीं“ उसका रौद्र रूप देखकर पास खड़े लोगों ने चुपके से खिसकना ही उचित समझा। लोगों का  जाते देख रमा भी दरांती वहीं पटककर बड़बड़ाती हुई घर के दरवाजे पर निढाल होकर रोने लगी। शंकर पीछे-पीछे गाली-गलौच करता आया दरवाजे पर उसको बड़बड़ाते हुए दो-चार लात जमाकर घर के अंदर घुस गया। 
         रमा वहीं दरवाजे पर पड़ी-पड़ी अपने बीते दुर्दिनों की याद कर लम्बी-लम्बी सिसकियां भर रही थी। कितना नीरस जीवन है उसका, तनाव ही तनाव, दुःख ही दुःख, खुशी कभी देखी ही नहीं। बचपन में मां चल बसी तो घर के कामकाज में ही खप गई। बाप ने दूसरी शादी की लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली। कुछ साल बाद वह भी चल बसे। सौतेली माँ ने यद्यपि उसे अपनी बेटी जैसी पाला पोसा, फिर भी वह सोचती अगर आज उसकी मां जिन्दा होती तो वह कम से कम ऐसे घर में और उसी गांव में नहीं ब्याही होती। लेकिन अब जाऊँ भी तो कहाँ? वह सोच में डूबी ही थी कि उसने अपनी सौतेली माँ जो कि उसी गांव में अकेली दिन गुजार रही थी, जो लोगों से उनकी लड़ाई-झगड़े की बातें सुनकर दौड़ी-दौड़ी चली आयी थी, को सामने देखा तो उससे लिपट गई और बिलखते हुए बोली- “माँ मुझे इस नरक से बाहर निकाल ले चल, नहीं तो मैं फांस लगा लूंगी।“ उसके मुंह से फांस लगाने की बात सुन उसकी सौतेली माँ की रूह कांप उठी, क्योंकि इससे पहले भी गांव में दो-चार ऐसी दुर्घटनायें घट चुकी थी, जिस पर कभी किसी गांव वाले ने मुंह तक नहीं खोला।  यही सोच वह उसे समझाने लगी- “देख बेटी, मैं तेरी सौतेली माँ जरूर हूँं लेकिन मैंने कभी भी तेरे को सौतेला नहीं समझा। जरा सोच! अगर तूने कोई गलत कदम उठाया तो तेरा ये छोटा सा मासूम बच्चा तेरे बिना कैसे जियेगा। कौन देखभाल करेगा उसकी।“
“जब मैं ही नहीं रहूंँगी तो मेरी तरफ से कोई जिये या मरे। मुझे कुछ लेना-देना नहीं इससे। कल ये भी बड़ा होकर अपने बाप की तरह मारने दौड़ेगा तो तब क्या करूँगी मैं? कहाँ जाऊँगी मैं, बता? रमा रोते हुए बड़ी निराश होकर बोली।
         “नहीं बेटी, धीरज रख। मुझे विश्वास है ये तुझे जरूर सुख देगा।“ रमा की मां ने बच्चे की ओर देखते हुए कहा- “अब जा काम कर ले।“
          रमा को थोड़ी आत्मीय शांति मिली तो उसने पास ही सुबकते हुए मासूम बच्चे को अपनी सीने से चिपका लिया। सोचने लगी- सच ही कहती है माँ! जब वह मेरी मौसेरी मां होकर मेरा सगे बच्चों जैसा देखभाल कर सकती है तो मैं क्यों नहीं कर सकती। उसे अपने बेटे से आशा बंधी कि बड़े होकर जरूर वह उसका सहारा बनेगा, तब उसके जीवन में खुशी के फूल खिल उठेंगे। यह सोचकर वह जी उठी।“

शेष अगली पोस्ट में .....
.....कविता रावत  


कालिंका देवी

कालिंका देवी

सुदूर हिमालय की गोद में बसे पहाड़ी प्रदेश उत्तराखंड देवभूमि के नाम से जाना जाता है। यहाँ पौराणिक काल से ही विभिन्न देवी-देवताओं का पूजन भिन्न भिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न रूप में प्रचलित है। इनमें से एक शक्ति-पीठ ‘कालिंका देवी’ (काली माँ) पौड़ी और अल्मोड़ा जिले के चैंरीखाल में बूँखाल चोटी पर अवस्थित है। इस चोटी से देखने पर हिमालय के दृश्य का आनन्द बहुत ही अद्भुत और रोमांचकारी होता है। सामने वृक्ष, लता, पादपों की हरियाली ओढ़े ऊंची-नीची पहाडि़याँ दिखाई देती हैं और पीछे माँ कालिंका के मंदिर का भव्य दृश्य।
माँ कालिंका के बारे में मान्यता है कि सन् 1857 ई. में जब गढ़वाल और कुमाऊँ में गोरखों का राज था, तब सारे लोग गोरखों के अत्याचार से परेशान थे। इनमें से एक वृद्ध व्यक्ति जो वडि़यारी परिवार का रहने वाला था, वह काली माँ का परम भक्त था। एक बार भादौ महीने की अंधेरी रात को  रिमझिम-रिमझिम बारिश में जब वह गहरी नींद में सोया था, तभी अचानक उसे बादलों की गड़गड़ाहट और बिजली चमकने के साथ ही एक गर्जना भरी आवाज सुनाई दी, जिससे वह भयभीत होकर हड़बड़ाकर उठ बैठा। जब उसने बाहर की ओर देखा तो माँ कालिंका छाया रूप में उसके सामने प्रगट हुई और उससे कार्तिक माह की एकादशी को पट्टी खाटली के बन्दरकोट गांव आकर उनका मंदिर बनवाने को कहकर अंतर्ध्यान हो गई। भक्त की भक्ति एवं माँ की शक्ति के प्रताप से देखते-देखते गांव में मन्दिर बन गया। दिन, महीने, साल बीते तो एक वडि़यारी परिवार का विस्तार तेरह गांव तक फैल गया। तब एक दिन मां कालिंका अपने भक्तों के सपनों में आकर बोली कि वे सभी मिलकर उनकी स्थायी स्थापना गढ़-कुमाऊँ में कर ममगांई परिवार को पूजा का भार सौंपे। माँ के आशीर्वाद से सभी गांव वालों ने मिलकर बूंँखाल की चोटी पर शक्तिपीठ कालिंका मंदिर की स्थापना की। जहाँ हर तीसरे वर्ष पौष कृष्ण पक्ष में शनि और मंगलवार के दिन मां कालिंका के मंदिर में मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर गांवों में बसे लागों के अलावा हजारों-लाखों की संख्या में देश-विदेश के श्रद्धालुजन आकर फलदायिनी माता से मन्नत मांगते हैं।    
कोठा गांव में मां कालिंका की पहली पूजा के साथ ही शुरू होता है मां कालिंका की न्याजा (निशाण) का गांव-गांव भ्रमण। अपने भक्तों की रक्षा करती हुई माता अंत में मेले के दिन मंदिर में पहुंचती है। इसके बाद विभिन्न पूजा विधियों के साथ ही शुरू होता है माँ का अपने पार्षद, हीत, घडियाल और भैरों बाबा के साथ अद्भुत तांडव नृत्य। जैसे ही जागरी (माँ का पुजारी) ’दैत संघार’ के स्वरों ‘जलमते थलमते दैता धारिणी नरसिंगी नारायणी’ आदि के साथ ’जै बोला तेरो ध्यान जागलो! ऊँचा धौलां गढ़ तेरा, दैत चढ़ी गैन जोग माया’ का ढोल, दमाऊँ, नगाड़े की थाप पर जोर-शोर से उच्चारण करता है, पश्वा (जिस पर देवी आती है) अपने सिर पर लाल चुनरी बांधकर दैत्य संहार करने को उद्धत होकर रौद्र रूप धारण कर भयंकार रूप से किलकारियां मारता है। उसकी भुजायें और रक्त वर्ण नेत्र फड़कने लगते हैं। वह एक हाथ में खड्ग और दूसरे में खप्पर, माथे पर सिंदूर के साथ अग्याल के चावल लेकर हुंकार मारता है, तो दैत्य संहार के निमित्त भैंसे की बलि दे दी जाती है और इसी के साथ मनौतियों के लिए आये नर भेड़-बकरियों का सामूहिक बलि का सिलसिला चल पड़ता है। लेकिन इस बार 23 दिसम्बर को प्रशासन ने मंदिर की 2 किमी की सीमा में पुलिस बल तैनात कर सख्त रवैया अपनाया तो पशु बलि प्रथा को रोकने में अभूतपूर्व कामयाबी मिली, जिससे यह पावन मंदिर आस्था के नाम पर हजारों बेजुबान पशुओं के खून से रंगने से बचकर अन्य शक्तिपीठ कालीमठ, चन्द्रबंदनी, धारी देवी, ज्वाल्पा एवं देलचैरी आदि सात्विक पूजा स्थलों की श्रेणी में शामिल हो गया।
इस मेले का मुख्य आकर्षण यह है कि जो भी भक्तगण मां कालिंका के मंदिर में मन्नत मांगते हैं, उनकी मनोकामना पूर्ण होती है तथा अगले तीसरे वर्ष जब यह मेला लगता है, तब वे खुशी-खुशी से मां भगवती के दर्शन के लिए आते हैं।
"देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यषो देहि द्विषो जहि।।"
इस वर्ष मेले की सबसे अच्छी बात यह रही कि एक ओर जहाँ प्रशासन की चाक-चौबंद चौकसी और सख्त रवैये से पशु बलि पर रोक लगी तो दूसरी ओर श्रद्धालुजनों का भी पूरा सहयोग मिला। सात्विक पूजा में शामिल होने के लिए भारी बर्फबारी और कड़ाके की ठण्ड में श्रद्धालुजनों के जोश में कोई कमी नजर नहीं आयी। हजारों भक्तजनों ने माँ के दरबार में नारियल, चुनरी, घंटी और चांदी की छप्पर आदि भेंट कर माँ का आशीर्वाद लिया। इस दौरान शक्तिपीठ के पुजारियों के सघोष वेद ध्वनियों का उच्चारण “ऊँ जयन्ती मंगलाकाली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गाक्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते। जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि, जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तुते।।“ के साथ-साथ “भेंट-सुभेंट यात्रा मांगन फल दे, पूजन वर दे, छत्र की छाया पित्र की माया, ज्योत जगाई, वंश बड़ाई“  आदि श्लोकों द्वारा माता का महिमामयी गुणगान कर प्रसाद वितरण का दृश्य मन को असीम शान्ति देते हुए सबके लिए यादगार बन गया ।
  जय माँ कालिंका!
.....कविता रावत