सीहोर के सिद्ध चिंतामन गणेश

सीहोर के सिद्ध चिंतामन गणेश

देश में चिंतामन सिद्ध गणेश की चार स्वंयभू प्रतिमाएं हैं, जिनमें से एक सीहोर में विराजित हैं। यहां साल भर लाखों श्रृद्धालु भगवान गणेश के दर्शन करने आते हैं तथा अपनी मन्नत के लिए उल्टा सातिया बनाकर जाते हैं।  भोपाल से लगभग 45 कि.मी. निकट बसे सीहोर जिला मुख्यालय से करीब तीन किलोमीटर दूरी पर स्थित चिंतामन गणेश मंदिर वर्तमान में प्रदेश भर में अपनी ख्याति और भक्तों की अटूट आस्था को लेकर पहचाना जाता है। प्राचीन चिंतामन सिध्द गणेश को लेकर पौराणिक इतिहास है। जानकारों के अनुसार चिंतामन सिद्ध भगवान गणेश की देश में चार स्वंयभू प्रतिमाएं हैं। इनमें से एक रणथंभौर सवाई माधोपुर राजस्थान, दूसरी उगौन स्थित अवन्तिका, तीसरी गुजरात में सिद्धपुर और चौथी सीहोर में चिंतामन गणेश मंदिर में विराजित हैं। इन चारों स्थानों पर गणेश चतुर्थी पर मेला लगता है। 
इस मंदिर का इतिहास करीब दो हजार वर्ष पुराना है। श्रुति है कि सम्राट विक्रमादित्य सीवन नदी से कमल पुष्प के रूप में प्रगट हुए भगवान गणेश को रथ में लेकर जा रहे थे। सुबह होने पर रथ जमीन में धंस गया। रथ में रखा कमल पुष्प गणेश प्रतिमा में परिवर्तित होने लगा। प्रतिमा जमीन में धंसने लगी। बाद में इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया गया। आज भी यह प्रतिमा जमीन में आधी धंसी हुई है। इस मंदिर में विराजित गणेश प्रतिमा के प्रकट होने के संबंध में एक अन्य किवदंती के अनुसार सीहोर से करीब सोलह किलोमीटर की दूरी पर पार्वती नदी का उद्गम स्थल है। सैकड़ों वर्ष पहले पार्वती नदी की गोद में श्री गणेश श्यामवर्ण काले पत्थर की सोने के रूप में दिखने वाली मूर्ति के रूप में एक ऊंचे स्थान पर विराजित थे। उस समय आसपास के रहवासी और योगी और संताें ने भी यहां पर कई सिध्दियां अर्जित की है। इतिहासविद बताते है कि करीब साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व पेश्वा युध्दकाल के दौरान पूर्व प्रतापी मराठा पेशवा बाजीराव प्रथम ने अपने साम्राज्य विस्तार की योजना से पार्वती नदी के उस पार पड़ाव डालने का मन बनाया, लेकिन नदी के बहाव के आगे बाजीराव प्रथम की राज्य विस्तार की योजना खटाई में पड़ गई। जब पेशवा बाजीराव नदी में उठे बहाव के थमने का इंतजार कर रहे थे उस समय रात्रि में राजा पेशवा को स्थानीय रहवासियाें ने यहां पर विराजित भगवान गणेश की महिमा के बारे में बताया। जिसे जानकर पेशवा बाजीराव में रात्रि के समय यहां विराजित श्री गणेश की प्रतिमा के दर्शन करने की लालसा मन में जागी और पेशवा बाजीराव अपने मंत्री व सैनिकाें के साथ प्रतिमा के दर्शन करने के लिए नियत स्थान की ओर रवाना हुए, जिसके बाद पेशवा बाजीराव ने प्रतिमा की खोज के बाद अपनी सेना सहित यहां विराजित भगवान श्री गणेश की प्रतिमा की विधिवत पूजा अर्चना की और साम्राज्य विस्तार के लिए निकले। पेशवा बाजीराव ने श्री गणेश की प्रतिमा से मनोकामना की कि साम्राज्य विस्तार कर लौटने के बाद मैं नदी के तट पर देवालय बनवाऊँगा। ऐसी प्रतिज्ञा कर पेशवा बाजीराव अपनी सेना के साथ युध्द विजय के लिए चल पड़ा।
          कुछ ही दिनाें में पेशवा बाजीराव को अभूतपूर्व सफलता मिलने के बाद उन्हाेंने अपनी प्रतिज्ञा अनुसार पार्वती नदी पर विराजित सिध्दपुर सीहोर में सीवन नदी के तट पर सुंदर देवालय बनवाया। श्री गणेश के प्रिय रक्त चंदन के रथ में भगवान को विराजमान कर विद्ववानाें द्वारा वेद उच्चारण और ढोल ढमाकाें के साथ अपनी सेना के साथ एक भव्य शोभायात्रा लेकर चल पड़े, लेकिन पेशवा बाजीराव द्वारा गणेश प्रतिमा को अन्यत्र ले जाने पर स्थानीय गांववासियाें ने राजा को मान मनोहार कर रोकने का प्रयास किया, लेकिन पेशवा बाजीराव अपनी प्रतिज्ञा अनुसार श्री गणेश की प्रतिमा को रथ के माध्यम से अन्यत्र ले जाने पर अड़िग थे। इस मंदिर से जुड़ी किवदंतियाें में यह उल्लेखित है कि पेशवा द्वारा पार्वती नदी से निकाली गई यह शोभायात्रा नियत स्थान पर पहुंचने से पूर्व ही रूक गई, जिसके लिए पूरे प्रयास कई दिन तक चलते रहे, लेकिन सभी प्रयास असफल ही रहे और रथ के पहिये धसने लगे। रथ को निकालने के तमाम प्रयासाें के बीच जब पेशवा बाजीराव पस्त होकर थक हार गए तब उन्होंने सेना सहित वहीँ रात्रि विश्राम किया। वहीँ राजा की निंद्रा अवस्था में क्षणिक स्वप्न दिखा इस स्वप्न ने श्री गणेश ने पेशवा बाजीराव को दर्शन देते हुए बताया कि राजन तुम अब ओर प्रयास न कराें मैं मां पार्वती के भक्तों की इच्छानुसार यही विराजूंगा और यह स्थान भी सिध्द हो गया है। तब पेशवा बाजीराव ने स्वप्न के बाद श्री गणेश की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए इसी जगह मंदिर का निर्माण करवाया, जो वर्तमान में चिंतामन श्री गणेश मंदिर के रूप में जाना पहचाना जाता है।
         यहाँ आकर श्रद्धालु अपनी मन्नत के लिए उल्टा सातिया बनाकर जाते हैं और जब उनकी मन्नत पूरी हो जाती है, तो मंदिर आकर सीधा सातिया बनाकर फिर अपने घर जाते हैं.... श्रोत: दैनिक भास्कर
आओ मिलकर गायें.........
गजानन कर दो बेड़ा पार, आज हम तुम्हें बुलाते हैं ।
तुम्हें मनाते हैं गजानन, तुम्हें मनाते हैं ।।
सबसे पहले तुम्हें मनावें, सभा बीच में तुम्हें बुलावें ।
गणपति आन पधारो, हम तो तुम्हें मनाते हैं ।।
आओ पार्वती के लाला, मूषक वाहन सुंड -सुन्डाला ।
जपें तुम्हारे नाम की माला ,ध्यान लगाते हैं ॥
उमापति शंकर के प्यारे, तू भक्तों के काज सँवारे ।
बड़े-बड़े पापी तारे, जो शरण में आते हैं ॥
लड्डू पेड़ा भोग लगावें ,पान सुपारी पुष्प चढ़ावें ।
हाथ जोड़ के करें वंदना ,शीश झुकाते हैं ॥
सब भक्तों ने टेर लगायी, सब ने मिलकर महिमा गाई ।
रिद्धि -सिद्धि संग ले आओ, हम भोग लगाते  हैं ॥ 
श्री गणेश जन्मोत्सव

श्री गणेश जन्मोत्सव

उत्सव, त्यौहार, पर्वादि हमारी भारतीय संस्कृति की अनेकता में एकता की अनूठी पहचान कराते हैं। रक्षाबन्धन के साथ ही त्यौहारों का सिलसिला शुरू हो जाता है। वर्ष के 365 दिन में से 111 दिन भारतीय समाज त्यौहारों और पर्वों को अलग-अलग रूपों में मनाता है। सदियों से चलती आयी हमारी यह उत्सवधर्मी परम्परा जीवन की एकरसता को दूर करने के साथ ही परिवार और समाज को एकसूत्र में बांधने का काम भी करती है। यह मात्र परम्परा नहीं है, यदि सूक्ष्मता से चिन्तन करें तो प्रत्येक पर्व के पीछे मानव कल्याण का भाव निहित है। हमारी भारतीय संस्कृति सर्व कल्याणकारिणी है, मंगलमयी है, जिसमें एक जाति, धर्म या राष्ट्र की नहीं, अपितु ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की मंगलकामना निहित हैः- "सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।"          
इन दिनों विघ्न हर्ता, बुद्धि और सुख-समृद्धि के देवता श्री गणेश की भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक दस दिन तक चलने वाले गणेश जन्मोत्सव की पूरे शहर के चौक, चौराहों, कालोनियों सहित घर-घर धूम मची है। घर से लेकर गली.मोहल्लों और बाजारों में गणपति मनमोहक रूपों में विराजमान हैं। हर वर्ष की भांति हमारे घर में भी गणपति विराजमान हैं। उनके बारे में जितना लिखा जाय, बहुत कम होगा। कहा जाता है कि गणपति जी से प्रार्थना कर महर्षि वेदव्यास ने लोक कल्याणार्थ 60 लाख श्लोकों के रूप में महाभारत की रचना की, जिसमें कहा जाता है कि इनमें से 30 लाख देवलोक, 14 लाख असुर लोक, 15 लाख यक्ष लोक और केवल 1 लाख पृथ्वी लोक पर हैं। महाभारत को वेद भी माना जाता है। भगवान गणेश की महिमा संसार में सर्वत्र व्याप्त है। आज सिंघ और तिब्बत से लेकर जापान और श्रीलंका तक तथा भारत में जन्मे प्रत्येक विचार एवं विश्वास में गणपति समाए हैं। जैन सम्प्रदाय में ज्ञान का संकलन करने वाले गणेश या गणाध्यक्ष की मान्यता है तो बौद्ध के वज्रयान शाखा का विश्वास कभी यहां तक रहा है कि गणपति के स्तुति के बिना मंत्रसिद्धि नहीं हो सकती। नेपाल तथा तिब्बत के वज्रयानी बौद्ध अपने आराध्य तथागत की मूर्ति के बगल में गणेश जी को स्थापित रखते रहे हैं। सुदूर जापान तक बौद्ध प्रभावशाली राष्ट्र में भी गणपति पूजा का कोई न कोई रूप मिल जाता है। प्रत्येक मनुष्य अपने शुभ कार्य को निर्विध्न समाप्त करना चाहता है। गणपति मंगल.मूर्ति हैं, विध्नों के विनाशक हैं। इसलिए इनकी पूजा सर्वप्रथम होती है। शास्त्रों में गणेश को ओंकारात्मक माना गया है, अतः उनका सबसे पहले पूजन-विधान है।
           भगवान श्री गणेश जीवन में श्रेष्ठ और सृजनात्मक कार्य करने की प्ररेणा देते हैं। उनकी अनूठी शारीरिक संरचना से हमें बड़ी सीख देती है। जैसे- उनका बड़ा मस्तक बड़ी और फायदेमंद बातें सोचने के लिए प्रेरित करता है तो छोटी-छोटी आंखे हाथ में लिए कार्यों को उचित ढंग से और शीघ्र पूरा करने एवं हिलती-डुलती लम्बी सूूंड हमेशा सचेत रहने की ओर इशारा करती हैं। उनके सूप जैसे बड़े कान हमें नये विचारों और सुझावों को धैर्यपूर्वक सुनने की सीख देते हैं तो लम्बी सूंड हमें अपने चारों ओर की घटनाओं की जानकारी और ज्यादा सीखने के लिए प्रेरित करती हैं । उनका छोटा मुंह हमें कम बोलने की याद दिलाता है तो जीभ हमें तोल मोल के बोल की सीख देती है।        
त्यौहारों के आगमन के साथ ही घर-घर से भांति-भांति के पकवानों की महक से वातावरण खुशनुमा हो जाता है। इसमें भी अगर मिठाईयां न हो तो त्यौहारों में अधूरापन लगता है। दूध मिठाईयों का आधार है। इसी से निर्मित मावे और घी से अनेक व्यंजन तैयार होते हैं, लेकिन आज यह अधिक मुनाफे के फेर में मिलावटी बनकर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहा है। मिलावटी दूध, घी हो या मावा सेहत के लिए वरदान नहीं बल्कि कई बीमारियों की वजह बनती है। इसलिए बाजार से मिठाई-नमकीन आदि जाँच-पड़ताल कर ही खरीदें, अच्छा तो यही होगा कि त्यौहार में घर पर पकवान बनाएं और स्वस्थ्य तन-मन से पूजा-अर्चना करें!

सभी को गणेशोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ।
                                     ....कविता रावत 
 हिन्दी दिवस हिन्दी का पर्व है

हिन्दी दिवस हिन्दी का पर्व है

प्रतिवर्ष 14 सितम्बर को मनाये जाने वाला हिन्दी दिवस हिन्दी के राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित होने का गौरव, उसके प्रति निष्ठा व्यक्त करने और विश्व भर में हिन्दी चेतना जागृत कर हिन्दी की वर्तमान स्थिति का सिंहावलोकन कर उसकी प्रगति पर विचार करने का दिन है। हिन्दी दिवस एक पर्व है, जिसमें प्रदर्शनी, मेले, गोष्ठी, सम्मेलन तथा समारोह आयोजन किए जाकर हिन्दी सेवियों को पुरस्कृत तथा सम्मानित किया जाता है। इसके साथ ही सरकारी, अर्द्ध सरकारी कार्यालयों तथा बड़े उद्योगों में हिन्दी सप्ताह और हिन्दी पखवाड़ा आयोजित कर हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया जाता है। हिन्दी दिवस हिन्दी का पर्व है। 
           हमारे देश में अन्य समस्याओं के साथ ही भाषा भी एक समस्या है। देश के हर कोने में अलग-अलग भाषा-भाषी लोग रहते हैं। देश में प्रशासन की भाषा, राजभाषा, न्याय की भाषा आदि बिन्दुओं पर मतभेद रहता है और विभिन्न समस्याएं भी भाषा को लेकर उत्पन्न होती हैं। शिक्षा के माध्यम पर उत्पन्न गहरा मतभेद आज एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह है। शिक्षा शास्त्रियों का मत है कि शिक्षा का माध्यम प्राथमिक स्तर से लेकर शोध स्तर पर मातृभाषा में होना चाहिए, इस प्रक्रिया से मातृभाषा का उत्थान तो होगा ही साथ ही राष्ट्रभाषा हिन्दी को भी बल मिलेगा। विदित हो कि भारत सहित कई देशों में विदेशी भाषाएं शिक्षा का माध्यम रही हैं, जो आदर्श स्थिति नहीं कही जा सकती है, क्योंकि विदेशी भाषा में मौलिक शोध सम्भव नहीं हो सकता, विदेशी चिन्तन से स्वयं के मौलिक चिन्तन की हत्या प्रायः हो जाती है, चिन्तन दब जाता है। 
           महावीरप्रसाद द्विवेदी लिखते हैं,’ अपने देश, अपनी जाति का उपकार और कल्याण अपनी ही भाषा के साहित्य की उन्ननति से हो सकता है।’ महात्मा गांधी का कहना है, ’अपनी भाषा के ज्ञान के बिना कोई सच्चा देशभक्त नहीं बन सकता। समाज का सुधार अपनी भाषा से ही हो सकता है। हमारे व्यवहार में सफलता और उत्कृष्टता भी हमारी अपनी भाषा से ही आएगी।’ कविवर बल्लतोल कहते हैं, ’आपका मस्तक यदि अपनी भाषा के सामने भक्ति से झुक न जाए तो फिर वह कैसे उठ सकता है।’ डाॅ. जाॅनसन की धारणा है, ’भाषा विचार की पोशाक है।’ भाषा सभ्यता और संस्कृति की वाहन है और उसका अंग भी। माँ के दूध के साथ जो संस्कार मिलते हैं और जो मीठे शब्द सुनाई देते हैं, उनके और विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय के बीच जो मेल होना चाहिए वह अपनी भाषा द्वारा ही सम्भव है, विदेशी भाषा द्वारा संस्कार-रोपण ससम्भव है। हमारे सामने राष्ट्र की वैज्ञानिक तथा औद्योगिक उन्नति और प्रगति के प्रत्यक्ष साक्ष्य हैं- अमेरिका और जापान। अमेरिका वैज्ञानिक दृष्टि से और जापान औद्योगिक प्रगति से विश्व में सर्वोच्च शिखर पर आसीन हैं। इन दोनों को अपनी-अपनी भाषा पर गर्व है। वे अपनी-अपनी भाषा द्वारा राष्ट्र को यश प्रदान कराने में गौरव अनुभव करते हैं। 
कालरिज कहते हैं, ’भाषा मानव-मस्तिष्क की वह प्रयोगशाला है, जिसमें अतीत ही सफलताओं के जय-स्मारक और भावी सफलताओं के लिए अस्त्र-शस्त्र, एक सिक्के के दो पहलुओं की तरह साथ रहते हैं।’ इसका अर्थ है कि भाषा के द्वारा प्राचीन गौरव अक्षुण्ण रहता है और उज्जवल भविष्य के बीज उसमें निहित रहते हैं। आज भारत राष्ट्र का प्राचीन गौरव उसकी महिमा, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक उन्नति और प्रगति के लिए हिन्दी से बेहतर और कोई भाषा नहीं है। आज पं. नेहरू तथा उनके कांगे्रसी प्रबल समर्थकों द्वारा ‘फूल डालो और राज्य करो’ की नीति के तहत् ’हिन्दी बनाम प्रांतीय भाषाओं’ का जो विवाद खड़ा कर भारत राष्ट्र को दो भागों उत्तर (हिन्दी पक्षधर) और दक्षिण (हिन्दी विरोधी) में विभक्त कर सुनियोजित षड़यंत्र कर अंग्रेजी को देश की एकता बनाए रखने के नाम पर थोपा गया है, उसे बाहर का रास्ता दिखाया जाकर उसके स्थान पर हिन्दी को पूर्ण रूप से राजभाषा के पद पर सिंहासनारूढ़ करने का समय आ गया है। 

 हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं सहित।

5 सितम्बर - शिक्षक दिवस

5 सितम्बर - शिक्षक दिवस

            शिक्षकों द्वारा किए गए श्रेष्ठ कार्यों का मूल्यांकन कर उन्हें सम्मानित करने का दिन है ‘शिक्षक दिवस‘। छात्र-छात्राओं के प्रति और अधिक उत्साह-उमंग से अध्यापन, शिक्षण और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संघर्ष के लिए उनके अंदर छिपी शक्तियों को जागृत करने का संकल्प-दिवस है ‘अध्यापक दिवस’। यह दिवस समाज और राष्ट्र में ‘शिक्षक’ के गर्व और गौरव को पहचान कराता है। इस दिन विभिन्न राज्यों से शिक्षण के प्रति समर्पित अति विशिष्ट शिक्षकों को पुरुस्कृत कर सम्मानित किया जाता है।

तमिलनाडु के तिरुतनी नामक गांव में 5 सितम्बर 1888 को जन्मे डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन् प्रकांड विद्वान, दार्शनिक, शिक्षा-शास्त्री, संस्कृतज्ञ और राजनयज्ञ थे। वे सन् 1962 से 1967 तक भारत के राष्ट्रपति भी रहे। इस पद पर आने के पूर्व वे शिक्षा जगत् से ही सम्बद्ध थे। मद्रास में प्रेजीडेंसी कालेज में वे दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक रहे। सन् 1936 से 1939 तक वे आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पूर्वी देशों के धर्म और दर्शन के ‘स्पाल्डिंग प्रोफेसर’ पद पर रहे। उन्होंने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शनशास्त्र से परिचित कराया। वे वर्ष 1939 से 1948 तक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उपकुलपति पद पर आसीन हुए। वे 1949 से 1952 तक रूस की राजधानी मास्को में भारत के राजदूत रहे। इस दौरान भारत-रूस मैत्री बढ़ाने में उनका भारी योगदान रहा। उनके उल्लेखनीय कार्यो के लिए भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद जी ने उन्हें देश का सर्वोच्च अलंकरण भारत रत्न प्रदान किया। राष्ट्रपति बनने के बाद जब उनके प्रशंसकों ने उनका जन्मदिवस सार्वजनिक रूप से मनाना चाहा तो उन्होंने जीवनपर्यन्त स्वयं शिक्षक रहने के नाते उन्होंने अपने जन्मदिवस 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाना स्वीकार किया। तभी से प्रतिवर्ष यह दिन ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
शिक्षक दिवस और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाओं सहित।