शक्ति और शिक्षा पर विवेकानन्द का चिंतन

शारीरिक दुर्बलता :  महान् उपनिषदों का ज्ञान होते हुए भी तथा अन्य जातियों की तुलना में हमारी गौरवपूर्व संत परम्पराओं का सबल होते हुए भी मेरे विचार में हम निर्बल हैं। सर्वप्रथम हमारी शारीरिक निर्बलता ही हमारी विपदाओं और कष्टों का विषम आधार है। हम आलसी हैं, हम कृतत्वहीन हैं, हम संगठित नहीं हो सकते, हम परस्पर स्नेह नहीं करते, हम अत्यधिक स्वार्थी हैं, हम सदियों से केवल इस बात पर आपस में लड़ रहे हैं कि मस्तक पर टीका लगाने का ढंग कैसा हो? और ऐसे तर्कहीन विषयों पर हमने अनेक ग्रन्थों की रचना कर डाली कि किसी के देखने मात्र से हमारा भोजन दूषित हो जाता है अथवा नहीं! यह नकारात्मक भूमिका हम विगत कुछ शताब्दियों से लगातार अपना रहे हैं। क्या कोई जाति ऐसे कुतर्कपूर्ण, अनुपयोगी समस्याओं और उनके अन्वेषणों पर अपने बौद्धिक चातुर्य का दुरुपयोग कर किसी महान् अभिलाषा की कल्पना कर सकती है? और इसके कारण हम आत्म-लज्जित भी नहीं हैं! हाँ, इसके कारण हम ऐसा सोचते भी हैं और मानते हैं कि ये तुच्छ विचार हैं, परन्तु उन्हें छोड़ नहीं पाते!
 हम अनेक विचार ‘तोता-रटंत’ की तरह दोहराते हैं परन्तु उनका कभी पालन नहीं करते, किसी बात को कहना परन्तु उसका पालन नहीं करना हमारी आदत और नियति बन चुकी है, इसका कारण क्या है? हमारी शारीरिक दुर्बलता के कारण हमारी कमजोर बुद्धि किसी काम को करने में समर्थ नहीं है, हमें इस कमजोरी को ताकत बनाना चाहिए, ऐसी आपको मेरी सलाह है। आप गीता पढ़ने की बजाय, फुटबाल के द्वारा स्वर्ग के अधिक पास पहुँच सकते हो! ये शब्द बेधड़क किन्तु सुस्पष्ट हैं और मैं ये इसलिए कह रहा हूँ कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ, मुझे मालूम है कि तुम्हें जूता कहाँ पर काट रहा है, मुझे इस विषय का कुछ अनुभव भी हुआ है। तुम्हें अपने घुटनों के और भुजाओं के तनिक से अधिक बल पर गीता ज्ञान का कुछ अधिक बोध हो सकता है, जब तुम अपने मजबूत पैरों पर खड़े होकर अपने पुरुषत्व का अनुभव करोगे तभी तुम उपनिषदों को भली प्रकार समझ सकोगे। तब तुम्हें महान् प्रतिभा और भगवान कृष्ण की महान् शक्ति का आभास होगा जब तुम्हारी रगों में कुछ तेज रक्तप्रवाह का संचार होगा। इस प्रकार तुम अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उठ सकोगे।
आधुनिक औषधि विज्ञान के अनुसार हम जानते हैं कि किसी भी व्याधि के आने के दो कारण होते हैं, बाहरी विषाणु और शारीरिक अल्प-आरोग्यता। जब तक शरीर में जीवाणु प्रवेश के प्रति अवरोध शक्ति है, जब तक शरीर की आंतरिक शक्ति जीवाणु-प्रवेश, उनके पनपने एवम् संवृद्धि के प्रतिकूल है तब तक कोई जीवाणु इतना शक्तिशाली नहीं है कि वह शरीर में रोग उत्पन्न कर सके। वास्तव में लाखों जीवाणु लगातार मानव शरीर में आते-जाते रहते हैं, परन्तु जब तक शरीर हृष्ट-पुष्ट है वह उनसे अप्रभावित रहता है। शरीर कमजोर होने पर ही जीवाणु उस पर हावी होते हैं और रोग उत्पन्न करते हैं। 
         बल :  यह एक बड़ा सत्य है कि बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मरण। बल ही अनन्त सुख है, अमर और शाश्वत जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु। 
लोग बचपन से ही शिक्षा पाते हैं कि वे दुर्बल हैं, पापी हैं। इस प्रकार की शिक्षा से संसार दिन-ब-दिन दुर्बल होता जा रहा है। उनको सिखाओ कि वे सब उसी अमृत की संतान हैं- और तो और, जिसके भीतर आत्मा का प्रकाश अत्यन्त क्षीण है, उसे भी यही शिक्षा दो। बचपन से ही उनके मस्तिष्क में इस प्रकार के विचार प्रविष्ट हो जायें, जिनमें उनकी यथार्थ सहायता हो सकें, जो उनको सबल बना दें, जिनसे उनका कुछ यथार्थ हित हो। दुर्बलता और अवसादकारक विचार उनके मस्तिष्क में प्रवेश ही न करें। सच्चिन्तन के स्त्रोत में शरीर को बहा दो, अपने मन से सर्वदा कहते रहो, ‘मैं ही वह हूँ, मैं ही वह हूँ।’ तुम्हारे मन में दिन-रात यह बात संगीत की भाँति झंकृत होती रहे और मृत्यु के समय भी तुम्हारे अधरों पर सोऽहम्, सोऽहम् खेलता रहे। यही सत्य है- जगत की अनन्त शक्ति तुम्हारे भीतर है।
वह क्या है जिसके सहारे मनुष्य खड़ा होता है और काम करता है? वह है बल। बल ही पुण्य है तथा दुर्बलता ही पाप है। उपनिषदों में यदि कोई एक ऐसा शब्द है जो वज्र-वेग से अज्ञान-राशि के ऊपर पतित होता है, उसे तो बिल्कुल उड़ा देता है, वह है ‘अभीः’ - निर्भयता। संसार को यदि किसी एक धर्म की शिक्षा देनी चाहिए तो वह है ’निर्भीकता’।  यह सत्य है कि इस एैहिक जगत में अथवा आध्यात्मिक जगत में भय ही पतन तथा पाप का कारण है। भय से ही दुःख होता है, यही मृत्यु का कारण है तथा इसी के कारण सारी बुराई होती है और भय होता क्यों है?- आत्मस्वरूप के अज्ञान के कारण।
बलिष्ठ एवम् निर्भीक बनो!
       बलिष्ठ बनो! बहादुर बनो! शक्ति एक महत्वपूर्ण विधा है, शक्ति जीवन है। निर्बलता मृत्यु है। खड़े हो जाओ। निर्भीक बनो। शक्तिशाली बनो। भारत वीरों का आह्वान कर रहा है। नायक बनो। चट्टान की भाँति अटल खड़े हो जाओ। भारत माता अनन्त ऊर्जा, अनन्त उत्साह और अनन्त साहस का आह्वान कर रही है। 
स्वामी विवेकानंद ने संस्कारित शिक्षा-प्रणाली पर जोर दिया। वे चाहते थे कि समाज में संस्कार युक्त शिक्षा प्रणाली का विकास हो। उन्होंने देश में ऐसी शिक्षा प्रणाली का विकास किया, जो देश व समाज की सांस्कृतिक जीवनदर्शी व राष्ट्रीय परम्पराओं के अनुरूप हो। स्वामी विवेकानंद चाहते थे कि व्यक्ति की श्रेष्ठता, महानता व इसके असीम विकास का आधार मात्र-शरीर, बुद्धि कौशल व शिक्षा नहीं है, बल्कि इसका आधार है ज्ञानार्जन के साथ-साथ संस्कारित शिक्षा पद्धति। इसके साथ ही अन्दर की पवित्रता तथा आचरण की श्रेष्ठता। 
         शिक्षा :  शिक्षा का अर्थ है, उस पूर्णता की अभिव्यक्ति, जो सब मनुष्यों में पहले ही से विद्यमान है। शिक्षा किसे कहते हैं? क्या वह पठन-मात्र है? नहीं। क्या वह नाना प्रकार का ज्ञानार्जन है? नहीं, यह भी नहीं। जिस संयम के द्वारा इच्छा-शक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और वह फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है। अब सोचो कि शिक्षा क्या वह है, जिसने निरन्तर इच्छा-शक्ति को बलपूर्वक पीढ़ी-दर-पीढ़ी रोककर प्रायः नष्ट कर दिया है, जिसके प्रभाव से नये विचारों की तो बात ही जाने दो, पुराने विचार भी एक-एक करके लोप होते चले जा रहे हैं, क्या वह शिक्षा है, जो मनुष्य को धीरे-धीरे यंत्र बना रही है?
मेरे विचार से तो शिक्षा का सार मन की एकाग्रता प्राप्त करना है, तथ्यों का संकलन नहीं। यदि मुझे फिर से अपनी शिक्षा आरम्भ करनी हो और इसमें मेरा वश चले, तो मैं तथ्यों का अध्ययन कदापि न करूँ। मैं मन की एकाग्रता और अनासक्ति को सामथ्र्य बढ़ाता और उपकरण के पूर्णतया तैयार होने पर उससे इच्छानुसार तथ्यों का संकलन करता। बच्चों में मन की एकाग्रता और अनासक्ति का सामथ्र्य एक साथ विकसित होना चाहिए।
        संस्कारित शिक्षा:  “जो समाज गुरु द्वारा प्रेरित है, वह अधिक प्रेम से उन्नति के पथ पर अग्रसर होता है, इसमें कोई संदेह नहीं। किन्तु जो समाज गुरु विहीन है, उसमें भी समय की गति के साथ-साथ गुरु का उदय तथा ज्ञान का विकास होना उतना ही निश्चित है।“
       योग शिक्षा :  “हम सब योगी बनकर जीवन सफल बनाएँगे। भारत के हरेक व्यक्ति को योग सिखाएँगे।।“
प्रत्येक व्यक्ति में अनंत ज्ञान और शक्ति का आवास है। वह शिक्षा देता है कि जिस प्रकार वासनाएँ और अभाव मानस के अंतर में हैं, उसी प्रकार उसके भीतर ही मन के अभावों के मोचन की शक्ति भी है और जहाँ कहीं और जब कभी किसी वासना, अभाव या प्रार्थना की पूर्ति होती है, तो समझना होगा, कि वह इस अनंत भंडार से ही पूर्ण होती है। हम लोग अपने वर्तमान सविशेष अर्थात् सापेक्ष भाव के पीछे विद्यमान एक निर्विशेष भाव में लौटने के लिए लगातार अग्रसर हो रहे हैं। स्वामी विवेकानंद जी ने योग शिक्षा के माध्यम से एक नई शिक्षा प्रणाली का प्रचार कर जन-जन को योग शिक्षा के महत्व से परिचित कराया। उन्होंने योग शिक्षा को जीवन में महत्वपूर्ण स्थान देने के लिए प्रेरित किया। आज भी प्रत्येक व्यक्ति योग शिक्षा के महत्व को जानता है और उसे अपने जीवन में अपनाता है।
        आज हमारे देश को आवश्यकता है लोहे के मांसपेशियों, इस्पात की तंत्रिकाओं और अति विशाल आत्मविश्वास की, जिसको कोई नकार न सके।
“उठो! जागो! और लक्ष्य प्राप्त होने तक रुको मत।“  

संकलित  

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January 9, 2016 at 10:43 AM

आपने लिखा...
और हमने पढ़ा...
हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...
इस लिये आप की रचना...
दिनांक 10/01/2016 को...
पांच लिंकों का आनंद पर लिंक की जा रही है...
आप भी आयीेगा...

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January 9, 2016 at 11:53 AM

उठो! जागो! और लक्ष्य प्राप्त होने तक रुको मत।“

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January 9, 2016 at 3:16 PM

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-01-2016) को "विवेकानन्द का चिंतन" (चर्चा अंक-2217) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
नववर्ष 2016 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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January 9, 2016 at 3:34 PM

बहुत सुंदर प्रस्तुति.

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January 9, 2016 at 8:47 PM

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, शंख, धर्म और विज्ञान - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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January 10, 2016 at 10:17 AM

संदेश और संकलन दोनो ही उत्कृष्ट हैं।

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January 10, 2016 at 12:46 PM

नमन , उनका दृष्टिकोण और दर्शन जीवन को सही अर्थों में उत्कृष्ट बना सकता है । सार्थक पोस्ट

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January 10, 2016 at 3:49 PM

बहुत ही बेहतरीन और प्रेरणादायी लेख।

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January 10, 2016 at 4:44 PM

सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार!
नववर्ष की बधाई!

मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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January 12, 2016 at 1:53 PM

सारगर्भित लेख। मुझे लगता है कि ​स्वामी विवेकानंद को वर्तमान पीढ़ी को सरल शब्दों में समझाने की जरूरत है।
मेरे एक मित्र ने फेसबुक पर लिखा ''आज स्वामी विवेकानन्द जी का जन्मदिन है। उनको नमन करते हुए भगवदगीता का यह श्लोक स्मरण करते हैं जो उन्हें अति प्रिय था। इसके बारे मे स्वामी जी ने कहा था...." यदि कोई यह एक श्लोक भी पढ़ लेता है तो उसे संपूर्ण गीता पढ़ने का लाभ मिल जाता है, क्योंकि इस एक श्लोक में ही गीता का समूचा संदेश निहित है।"
क्लैब्य मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।
इस पर उनके पास जवाब आये कि काश आप इसका अर्थ भी साथ में देते तो अच्छा रहता।

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January 12, 2016 at 2:41 PM

‘अनुचित नपुंसकता तुम्हें हे पार्थ! इसमें मत पड़ो।
यह क्षुद्र कायरता परन्तप! छोड़ कर आगे बढ़ो।।’’

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January 12, 2016 at 9:10 PM

अनूठी व् उपयोगी रचना , आभार आपका !

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January 12, 2016 at 9:43 PM

सुन्दर, सारगर्भित और पठनीय आलेख।
स्वामी विवेकानंद जी की 153वीं जयंती पर उन्हें शत शत नमन। सादर ... अभिनन्दन।।

नई कड़ियाँ :- स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर विशेष - स्वामी विवेकानंद जी के महत्वपूर्ण उद्धरण और विचार

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January 13, 2016 at 2:57 PM

स्वामी जी के इन विचारों को हम व्यवहार में लाये क्या ?

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January 13, 2016 at 2:58 PM

स्वामी जी के इन विचारों को हम व्यवहार में लाये क्या ?

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January 13, 2016 at 4:57 PM

श्रेष्ठ लेखन - बधाई

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February 5, 2016 at 8:09 PM

स्वामी जी ने इतनी छोटी उम्र में जो कुछ समाज को दिया है वो अकल्पनीय है ... व्यवहारिक बातों से लेकर राष्ट्र गौरव का ज्ञान देते ... गर्व होता है उनपे ...

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February 11, 2016 at 2:39 PM

अनंत उत्साह का संचार हो रहा है ।

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March 24, 2016 at 10:19 PM

उठो! जागो! और लक्ष्य प्राप्त होने तक रुको मत।“

बहुत अच्छा जी।

विवेकानंद जी ने कहा

उठो... जागो...

दर्शको को उठना और जागना दोनों मैं फर्क भी बता दीजिये।

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January 13, 2017 at 10:15 PM

“उठो! जागो! और लक्ष्य प्राप्त होने तक रुको मत।“
लेकिन आजकल तो ये हाल है, लोगो सुबह दस बजे हो रही है


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January 14, 2017 at 2:04 AM

सारगर्भित, विचारणीय आलेख.

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January 16, 2017 at 7:56 PM

विवेकानंद जी की जीवनी आचार्य नरेंद्र कोहली की कार तोड़ो कार में पढ़ी थी और उनका चरित्र और चिंतन का विस्तार असीमित है .... बहुत ही सारगर्भित आलेख ...उनके दर्शन को बाखूबी समेटा है आपने इस पोस्ट में ....

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