पेट की खातिर

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कुछ लोग भले ही शौक के लिए गाते हों, लेकिन बहुत से लोग पेट की खातिर दुनिया भर में गाते फिरते हैं।   ऐसे ही एक दिन दुर्गेलाल और उसका भाई गाते - भटकते हुए घर के द्वार पर आये तो, उनका गाना अच्छा लगा तो घर पर बिठाकर मैंने रिकॉर्डिंग की, जो आज मई दिवस पर प्रस्तुत है।     ..





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May 1, 2016 at 4:36 PM

मजदूर दिवस पर अच्छी सम-सामयिक प्रस्तुति है

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May 1, 2016 at 7:00 PM

बहुत बढिया कविता है... बधाई कविता जी.

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May 1, 2016 at 7:57 PM

बहुत अच्छी रचना है।मैं आपकी पोस्ट पढ़ता हूँ। अपने विचारों को आप सुन्दरता से अभिव्यक्त करती हैं।

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May 1, 2016 at 7:58 PM

बहुत अच्छी रचना है।मैं आपकी पोस्ट पढ़ता हूँ। अपने विचारों को आप सुन्दरता से अभिव्यक्त करती हैं।

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May 1, 2016 at 10:14 PM

बहुत सुंदर भावपूर्ण लिखा है ... मज़दूर दिवस को सार्थक किया है ... और दुर्गेलाल की रिकार्डिंग तो बहुत ही
मस्त है ... बहुत शुभकामनाएँ ....

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May 4, 2016 at 1:01 AM

भावपूर्ण ...मर्मस्पशी रचना

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May 6, 2016 at 11:19 AM

कविता जी, मजदुरों की व्यथा दर्शाती बहुत ही सुंदर रचना!

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May 6, 2016 at 2:16 PM

Behtreen Recording ki hai appne... Sun ke achha laga...

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May 6, 2016 at 9:25 PM

बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति...

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