अति से सब जगह बचना चाहिए

प्रत्येक अति बुराई का रूप धारण कर लेती है।
उचित की अति अनुचित हो जाती है।।

अति मीठे को कीड़ा खा जाता है।
अति स्नेह मति बिगाड़ देता है।।

अति परिचय से अवज्ञा होने लगती है।
बहुत तेज हवा से आग भड़क उठती है।।

कानून का अति प्रयोग अत्याचार को जन्म देता है।
अमृत की अति होने पर वह विष बन जाता है।।

अत्यधिक रगड़ने पर चंदन से भी आग पैदा हो जाती है।
एक जगह पहुंचकर गुण-अवगुण में बहुत कम दूरी रह पाती है।।

अति नम्रता में अति कपट छिपा रहता है।
अत्यधिक कसने से धागा टूट जाता है।।

अति कहीं नहीं करनी चाहिए।
अति से सब जगह बचना चाहिए।

.. कविता रावत 

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September 19, 2016 at 12:05 PM

अति कभी भी ठीक नहीं होती .....सुन्दर
कहा भी है ...
अति का भला न बोलना,
अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना,
अति की भली न धूप।

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September 19, 2016 at 12:10 PM

अति सर्वत्र वर्जयेत्
सुन्दर ..

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September 19, 2016 at 2:39 PM

अति मीठे को कीड़ा खा जाता है।
अति स्नेह मति बिगाड़ देता है।।

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September 19, 2016 at 9:26 PM

आपके पोस्ट की अपडेट नहीं दिख रही है! इसलिये पता ही नहीं चला जन्माष्टमी के बाद!!
अति हमेशा बुरी होती है! इसका कोई अपवाद नहीं!

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September 20, 2016 at 11:21 AM

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 21 सितम्बर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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September 20, 2016 at 1:30 PM

पर .... अति सुंदर है ये अति ।

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September 20, 2016 at 4:09 PM

प्रत्येक अति बुराई का रूप धारण कर लेती है।
उचित की अति अनुचित हो जाती है।।
बहुत बढ़िया!

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September 23, 2016 at 10:20 PM

सभी छंद ज्ञान की धरा समेटे ... सच है अति हर बात की बुरी है ...

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November 30, 2016 at 7:42 PM

बहुत बढ़िया ! बहुत सुंदर शब्दों में दी गई सीख !

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January 7, 2017 at 1:41 PM

सुन्दर! अति सर्वत्र वर्जयेत्.

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