हम भाँति-भाँति के पंछी हैं

हम भाँति-भाँति के पंछी हैं

हम भाँति-भाँति के पंछी हैं पर बाग़ तो एक हमारा है
वो बाग़ है हिन्दोस्तान हमें जो प्राणों से भी प्यारा है
हम  हम भाँति-भाँति के पंछी ………………………

बाग़ वही है बाग़ जिसमें तरह-तरह की कलियाँ हों
कहीं पे रस्ते चंपा के हों कहीं गुलाबी गलियाँ हों
कोई पहेली कहीं नहीं है, सीधा साफ़ इशारा है
हम  हम भाँति-भाँति के पंछी ………………………

बड़ी ख़ुशी से ऐसे-वैसे इकड़े तिकड़े बोलो जी
लेकिन दिल में गिरह जो बाँधी  है वो पहले खोलो जी
सुर में चाहे फर्क हो फिर भी इक  तारा इक तारा
पंजाबी या बंगाली मद्रासी या गुजराती हो
प्रीत की इक बारात है यह हम सबके साथी हो
भेद या बोली कुछ भी हो हम एक शमां  के परवाने
आपस में तकरार करें हम ऐसे तो नहीं दीवाने
मंदिर मस्जिद गिरजा अपना, अपना ही गुरुद्वारा है
हम  हम भाँति-भाँति के पंछी ……………………… 
                                                      …राजेन्द्र कृष्ण

सभी ब्लोग्गर्स एवं पाठकों को गणत्रंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!
नेताजी सुभाषचंद्र बोस जयंती

नेताजी सुभाषचंद्र बोस जयंती

उड़ीसा की राजधानी और महानदी के तट पर बसे कटक नगर में रायबहादुर जानकीनाथ बोस के यहाँ 23 जनवरी, 1897 को सुभाष बाबू का जन्म उस समय हुआ जब देश पराधीनता की बेडि़यों में जकड़ा हुआ था। भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रेस की स्थापना हो चुकी थी। देश में राजनैतिक चेतना आ रही थी। उनकी माता प्रभावती बोस पुराने कट्टर धार्मिक विचारों में विश्वास रखनी वाली महिला होने के बावजूद भी सरल हृदय, अच्छे स्वभाव वाली सीधी-साधी महिला थी। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की पांच बहनें और छः भाई थे। संपन्न परिवार के होने के बावजूद नेताजी स्वार्थ और लालच जैसी बुराई से कोसों दूर थे। 
नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने जाति-पांति के भेदभाव को कभी भी महत्व नहीं दिया। वे हिन्दू-मुसलमानों में भेद नहीं रखते थे। दोनों को भाई मानते थे। इसका एक उदाहरण है- एक दिन उनकेे मोहल्ले में छोटी जाति के एक व्यक्ति ने  उनके घर वालों को खाने पर बुलाया। सबने न जाने का निश्चय किया, लेकिन सुभाष बाबू ने अपने माता-पिता की आज्ञा का उल्लंघन कर उनके यहां जाकर खाना खाया। एक अन्य प्रसंग पर कटक में हैजे के दौरान उन्होंने रोगियों की घर-घर जाकर सेवा की। इस रोग से पीडि़त एक गुण्डे हैदर के घर जब कोई डाॅक्टर, वैद्य उनके बुलावे पर नहीं आये तो उन्होंने स्वयं उसके घर जाकर अपने साथियों के साथ मिलकर उसके घर की साफ सफाई की, जिसे देखकर वह कठोर हृदय वाला गुण्डा द्रवित होकर एक कोने में जाकर रोने लगा। उसे बड़ी आत्मग्लानि हुई। तब नेता सुभाषचंद जी ने उसे सिर पर हाथ फेरते कहा-“ भाई तुम्हारा घर गंदा था, इसलिए इस रोग ने तुम्हें घेर लिया। अब हम उसकी सफाई कर रहे हैं। दूसरों के सुख-दुःख में जाना तो मनुष्य का कर्तव्य है।“ यह सुनकर हैदर से उनके पांव पकड़ कर बोला-“ नहीं, नहीं मेरा घर तो गंदा था ही, मेरा मन उससे भी ज्यादा गंदा था। आपकी सेवा ने मेरी गंदगी को निकाल दिया। मैं किस मुंह से आपको धन्यवाद दूं। परमात्मा करें आपकी कीर्ति संसार के कोने-कोने में फैले।“   
          नेताजी के भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु अमूल्य योगदान के लिए हम सभी सदैव ऋणी रहेंगे। उनके जैसे ओजस्वी वाणी, दृढ़ता, स्पष्टवादिता और चमत्कारी व्यक्तित्व वाले लोकप्रिय नेता की आज सर्वथा कमी महसूस होती है। स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु उनका भारतवासियों का उद्बोधन भला कौन भुला सकता है-“ अब आपका जीवन और आपकी सम्पत्ति आपकी नहीं है, वह भारत की है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि आप इस सरल सत्य को समझते हैं कि हमें किसी भी उपाय से स्वतंत्रता प्राप्त करनी है और अब हम एक ऐसे स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में हैं जो युद्ध की स्थिति में है तब आप सहज ही समझ जायेंगे कि कुछ भी आपका नहीं है। और आपका जीवन, धन, सम्पत्ति कोई भी चीज आपकी नहीं है। आपके लिए स्पष्टतः दूसरा रास्ता खुला हुआ है। वही रास्ता जो अंग्रेजों द्वारा अपनाया गया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए कोई मध्य स्थिति नहीं हो सकती। तुम सभी को स्वतंत्रता के लिए पागल बनना होगा। तुम में से किसी को भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़े जाने वाले इस युद्ध में केवल अपनी सम्पत्ति का पांच प्रतिशत और दस प्रतिशत देने के अर्थों में सोचने का अधिकार नहीं है। हजारों संख्या मंे जो वीर सैनिक भारत को स्वतंत्र करने के लिए सेना में भर्ती हुए हैं, वे इस बात का भाव-ताव नहीं करते कि हम रणभूमि में केवत पांच प्रतिशत ही अपना खून बहायेंगे। सच्चे देशभक्त सैनिक का अमूल्य जीवन एक करोड़ रुपये से भी अधिक कीमती है। तब आप लोग जो धनवान हैं, उन्हें क्या अधिकार है कि वे मोल-भाव करें और कहंे कि हम अपनी सम्पत्ति का केवल अमुक प्रतिशत ही देंगे। ’करो सब निछार-बनो सब फकीर।’ मैं आप सभी लोगों से यही चाहता हूं। भारत की स्वतंत्रता के लिए सर्वस्व दे डालो और फकीर बन जाओ। वह बहुत त्याग नहीं है। मुझे अपना खून दो और मैं तुम्हें स्वतंत्रता देने का वचन देता हूँ।“
 सुभाषचन्द्र जयंती पर सादर श्रद्धा सुमन अर्पण सहित..



जिन्दगी गुलाब सी बनाओ साथियो

जिन्दगी गुलाब सी बनाओ साथियो

किसी ने गुलाब के बारे में खूब कहा है- “गीत प्रेम-प्यार के ही गाओ साथियो, जिन्दगी गुलाब सी बनाओ साथियो।" फूलों के बारे में अनेक कवियों, गीतकारो और शायरो ने अपने मन के विचारों को व्यक्त किया है, जैसे-  “फूल-फूल से फूला उपवन, फूल गया मेरा नन्दन वन“। “फूल तुम्हे भेजा है खत में, फूल में ही मेरा दिल है“ और “बाहरो फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है।“ आदि।  यह सर्वविदित है कि जब भी हम किसी सामाजिक, पारिवारिक या अन्य खुशी के प्रसंग पर अपने प्रियजन से मिलने जाते हैं, तो उन्हें केवल फूल ही भेंट करते हैं, कोई भी व्यक्ति कांटे भेंट नहीं करता। इसीलिए कहा गया है कि अपने दयालु हृदय का ही सुन्दर परिचय देते हुए फूल बोना हमें सीखना चाहिए। फूलों से ही हमें प्यार करना सीखना चाहिए। जब हम फूलों को प्यार करेंगे, स्वीकार करेंगे तो हमारा जीवन भी फूलों की कोमलता, सुन्दरता के साथ ही उनके रंग, सौंदर्य और खुशबू की तरह महकता रहेगा।
बात फूलों की हो और उसमें अगर उनके राजा गुलाब की बात न हो, तो समझो वह बात अधूरी है। संसार में शायद ही कोई व्यक्ति हो, जिसके चेहरे पर इस बेजोड़ फूल को देखकर गुलाबी रंगत न छाये। प्रकृति के इस खूबसूरत रचना को करीब से देखने-समझने के अवसरों की मैं अक्सर तलाश में रहती हूँ। ऐसा ही एक सुअवसर मुझे नये वर्ष के प्रारम्भ में जनवरी माह के दूसरे और कभी-कभी तीसरे सप्ताह के शनिवार और रविवार को मिलता है, जब शासकीय गुलाब उद्यान में मध्यप्रदेश रोज सोसायटी और संचालनालय उद्यानिकी की ओर से दो दिवसीय अखिल भारतीय गुलाब प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है, जिसमें हजारों किस्म के गुलाब देखने और समझने का अवसर मिलता है।
इस वर्ष 16-17 जनवरी को 35वीं अखिल भारतीय गुलाब प्रदर्शनी देखने के साथ ही यह बताते हुए खुशी है कि आज गुलाब का फूल सिर्फ घर के बाग-बगीचों और किसी को भेंट करने का माध्यम भर नहीं है, बल्कि आज कृषक गुलाब की खेती कर बड़े पैमाने पर अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ कर रहे हैं। हमारे मध्यप्रदेश में गुलाब आधारित सुंगन्धित उद्योग एवं खेती संगठित क्षेत्र में पूर्व वर्षों में नहीं की जाती थी, जिसके फलस्वरूप कृषकों को सीमित क्षेत्र में अधिक आमदानी नहीं होती थी। प्रारम्भिक वर्षों में आवश्यक खाद्य पदार्थ जैसे-फल, सब्जी एवं मसाले के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हेतु विशेष प्रयास किये गये, जिसमें आशातीत सफलता नहीं मिली, लेकिन आज कृषक सीमित क्षेत्र में नवीनतम तकनीकी से फूलों की खेती कर अधिक आय प्राप्त कर रहे हैं, जिससे उनका रूझान फूलों की खेती की ओर बढ़ा है।
भारत में गुलाब की खेती का इतिहास लगभग 5000 वर्ष पुराना है। मोहन जोदड़ो-हड़प्पा आदि जिनका इतिहास 3000 वर्ष पुराना है, तब भी गुलाब की बगियों और गुलाब प्रमियों का उल्लेख मिलता है। धार्मिक ग्रन्थों में भी गुलाब की बगियों और गुलाबों का उल्लेख मिलता है। हिमालय की वादियों से लेकर उत्तर-पूर्व अर्थात् संपूर्ण भारत में गुलाब की खेती होती थी। गुलाब का उपयोग न केवल सौन्दर्यीकरण अपितु चरक-संहिता आदि के अनुसार दवाईयों विशेषकर आयुर्वेद में किया जाता रहा है।  इस प्रकार यह सर्वमान्य है कि गुलाब के प्रति लोगों में अगाध प्रेम की अभिव्यक्ति प्राचीनकाल से ही है तथा तब से ही भारत में सौन्दर्य, प्रेम, शांति, संस्कृति एवं खुशहाली का प्रतीक रहा है, जिसका उल्लेख विशेषकर मुगलकाल में पाया जाता है। 
आज हमारे देश में गुलाब की लगभग तीन हजार किस्में उपलब्ध हैं, जिनमें से लगभग 400 किस्में मध्यप्रदेश में उपलब्ध हैं। प्रत्येक किस्म उसके रंग के आधार पर अपनी महत्ता एवं सम्बन्ध का प्रतीक रखती है। एक मात्र गुलाब ही ऐसा पुष्प है, जो अपनी रंगों की सुन्दरता और महक के कारण विशिष्ट स्थान पाकर फूलों का राजा कहलाता है। इस तरह की प्रदर्शनी एवं संगोष्ठियों का आयोजन शहरी क्षेत्रों के अलावा ग्रामीण स्तर पर भी किए जाने चाहिए, जिससे इस दिशा में कृषकों को अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त हो सके और वे इसका समुचित लाभ उठा सके।    ....कविता रावत 







सूर्योपासना का पर्व है मकर संक्रांति

सूर्योपासना का पर्व है मकर संक्रांति

हमारे भारतवर्ष में मकर संक्रांति, पोंगल, माघी उत्तरायण आदि नामों से भी जाना जाता है। वस्तुतः यह त्यौहार सूर्यदेव की आराधना का ही एक भाग है। यूनान व रोम जैसी अन्य प्राचीन सभ्यताओं में भी सूर्य और उसकी रश्मियों को भगवान अपोलो और उनके रथ के स्वरूप की परिकल्पना की गई है। अपोलो मतलब ऊष्मा, प्रकाश तथा स्वास्थ्य व उपचार के देवता। अर्थात् जब से मानव में समझ का विकास हुआ, तब से ही उसे यह भी स्पष्ट आभास हो गया कि सूर्य इस धरती के नियंताओं में सर्वोपरि है। सूर्य का उत्तरायण होना एक खगोलीय घटना भर नहीं है। संक्रांति पर पर्व और उल्लास की परम्परा शायद मानव जाति की ओर से सूर्यदेव को धन्यवाद ज्ञापन है अथवा शायद हर नई पीढ़ी को हमारे पुरखों की नैसर्गिक विद्वता में लिपटा संदेश है, जिसे उन्होंने गहन अनुभव शोधन से समझा था। 
          मकर संक्रांति आध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पर्व है। इसी दिन सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ता है। इसी दिन उत्तरायण शुरू होता है, अभी तक दक्षिणायण रहता है। खगोलीय दृष्टि से भी यह बहुत महत्वपूर्ण दिन है। पुराणों में कहा गया है कि दक्षिणायण देवताओं की रात और उत्तरायण देवों के लिए दिन माना जाता है। यह दिन दान, पूजा-हवन, यज्ञ करने के लिए सर्वाधिक श्रेष्ठ है। मकर संक्रांति से सम्बंधित कई कथाएं है- एक समय दुर्वासा ऋषि कौरव-पांडव के गुरु द्रोणाचार्य के आश्रम में समिधा की खोज में पहुंचे। उस समय उनकी पत्नी कृपी आश्रम में थी। कृपी ने ऋषि से निवेदन किया कि संतान प्राप्ति का कोई उपाय बताएं।दुर्वासा ने कहा कि वह मकर संक्रांति को स्नान कर सूर्य की उपासना करें। कृपी ने ऐसा ही किया तो उन्हें अश्वथामा जैसा प्रतापी पुत्र प्राप्त हुआ। एक अन्य कथा के अनुसार यशोदा ने जब कृष्ण जन्म का व्रत लिया तो सूर्य की गति उत्तरायण में आरम्भ हुयी थी और उस दिन मकर संक्रांति थी।भीष्म पितामह ने उत्तराणी सूर्य होने के कारण इसी दिन प्राण त्यागे। पितरों के लिए 16 दिन तर्पण करने से जो शास्त्रोक्त फल प्राप्त होता है उतना पुण्य मकर संक्रांति के दिन तर्पण करने से मिलता है।
          इस माह कहीं पूर्णिमा से माह की शुरुआत होती है तो कहीं मकर संक्रांति से होती है। मकर राशि में सूरज जिस दिन प्रवेश करता है, उसे सौरमान कहते हैं। यह दिन अच्छा पुण्यकाल माना जाता है इसलिए किसी नदी में आह्वान करके स्नान करने का विधान है। पद्मपुराण में उल्लेख है कि भगवान विष्णु ने इस दिन असुरों का वध करके, नाश करके भूमि पर शांति स्थापित की थी। अधर्म का नाश हुआ और धर्म की प्रतिष्ठा हुई इसलिए इसे मुख्य पर्व माना गया। मकर संक्रांति पर सूरज की पूजा, अपने पूर्वजों के लिए तर्पण और नदी स्नान करना चाहिए। नई फसल का दान करना चाहिए। अन्य पर्वों का उद्देश्य होता है कि खा-पीकर खुश हो जाना, जबकि मकर संक्रांति पर दान करके आनन्द प्राप्त किया जाता है। स्मृतियों में कहा गया है कि जो आप कमाई करते हैं, उसका दो फीसदी धर्म कार्यों के लिए खर्च करना चाहिए, जो पूरे साल राशि संचित की है, उसको मकर संक्रांति पर खर्च करना चाहिए। अर्थात् 12 माह में जुटाई गई 24 फीसदी कमाई का दान करना चाहिए। इससे दान पाने वाले गरीब का जीवन सुधरता है। धनी लोगों का पैसा निचले तबके के लोगों के पास जाता है जिससे उनके धन में भी वृद्धि होती है। इस दिन तेल से स्नान करना, तिल का दान करना, तिल से होम करना, तिल को जल में मिलाकर तर्पण करना, तिल को खाना और खिलाना श्रेयस्कर माना गया है। श्राद्ध के दौरान तो तिल में होम करते हैं, तर्पण नहीं करते हैं। इसलिए यह पर्व खास है। पूर्वजों के लिए यह पर्व अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। तिल का उपयोग सभी पापों से मुक्त कराता है। मकर संक्रांति जैसे पर्वों के बारे में नई पीढ़ी को संस्कारित किया जाना चाहिए। इसके लिए सामूहिक आयोजन कर उन्हें इसके महत्व की जानकारी देनी चाहिए। पूर्व में हर गांव, शहर, नगर में ऐसे आयोजन होते थे, अब नहीं होते हैं इसलिए ऐसे पर्वों के संस्कार पीछे छूट गए हैं।          
अथर्ववेद की ऋचा कहते है-  आभारिषं विश्वभेषजीमस्यादृष्टान् नि शमयत्।  अर्थात्, सूर्य किरणें सर्वरोगनाशक हैं। वे रोगकृमियों को नष्ट करें। इस विषय पर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी अपनी रिपोर्ट के अनुसार सूर्य की रोशनी में पाए जाने वाले अल्ट्रा वाॅयलेट विकिरण की अधिकता से होने वाले नुकसान की अपेक्षा सूर्य प्रकाश की कमी से होने वाली समस्याओं का बोझ कहीं ज्यादा है। विटामिन-डी लगभग एक हजार जीन के सही संचालन में मददगार है, वो जीन जो मुख्यतः कैल्शियम मेटाबाॅलिज्म, न्यूरोमस्कुलर तंत्र तथा प्रतिरक्षा तंत्र के लिए आवश्यक है। यह विटामिन हमारी त्वचा में सूर्य प्रकाश की मदद से ही बनता है, जिसमें कपड़े, तन की अतिरिक्त चर्बी और त्वचा का मेलैनिन पिगमेंट बाधा डालते हैं। कैल्शियम मेटाबाॅलिज्म पर विटामिन-डी की कमी का असर है हड्डियों का कमजोर होना और कमजोर हड्डी हर घड़ी के दर्द और टीस से लेकर स्त्रियों में गर्भावस्था के दौरान विभिन्न जटिलताओं का कारण बनती है। आजकल बहुत से वैज्ञानिक शोधों के उपरांत विटामिन-डी का उपयोगी किरदार समझ में आ रहा है। मेलाटोनिन, सेरोटोनिन जैसे जैव-रसायनों का बहुत गहन संबंध मानसिक स्वास्थ्य से भी है। विभिन्न अनुसंधानों में पाया गया है कि सूर्य की रोशनी का अभाव तनाव (डिप्रेशन) की समस्या को जन्म देता है। यह तो सर्वविदित है कि सूर्य की ऊर्जा मनुष्य के लिए हानिकारक लगभग सभी बैक्टीरिया, वायरस तथा फफूंद का नाश करती हैं। इसी वैज्ञानिक तथ्य के परिणामस्वरूप हमारे घरों में सदियों से सामान को धूप दिखाकर शुद्ध करने की परम्परा आज भी कायम है।

सभी ब्लॉगर्स साथियों और सुधि पाठकों को मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं!

 शक्ति और शिक्षा पर विवेकानन्द का चिंतन

शक्ति और शिक्षा पर विवेकानन्द का चिंतन

शारीरिक दुर्बलता :  महान् उपनिषदों का ज्ञान होते हुए भी तथा अन्य जातियों की तुलना में हमारी गौरवपूर्व संत परम्पराओं का सबल होते हुए भी मेरे विचार में हम निर्बल हैं। सर्वप्रथम हमारी शारीरिक निर्बलता ही हमारी विपदाओं और कष्टों का विषम आधार है। हम आलसी हैं, हम कृतत्वहीन हैं, हम संगठित नहीं हो सकते, हम परस्पर स्नेह नहीं करते, हम अत्यधिक स्वार्थी हैं, हम सदियों से केवल इस बात पर आपस में लड़ रहे हैं कि मस्तक पर टीका लगाने का ढंग कैसा हो? और ऐसे तर्कहीन विषयों पर हमने अनेक ग्रन्थों की रचना कर डाली कि किसी के देखने मात्र से हमारा भोजन दूषित हो जाता है अथवा नहीं! यह नकारात्मक भूमिका हम विगत कुछ शताब्दियों से लगातार अपना रहे हैं। क्या कोई जाति ऐसे कुतर्कपूर्ण, अनुपयोगी समस्याओं और उनके अन्वेषणों पर अपने बौद्धिक चातुर्य का दुरुपयोग कर किसी महान् अभिलाषा की कल्पना कर सकती है? और इसके कारण हम आत्म-लज्जित भी नहीं हैं! हाँ, इसके कारण हम ऐसा सोचते भी हैं और मानते हैं कि ये तुच्छ विचार हैं, परन्तु उन्हें छोड़ नहीं पाते!
 हम अनेक विचार ‘तोता-रटंत’ की तरह दोहराते हैं परन्तु उनका कभी पालन नहीं करते, किसी बात को कहना परन्तु उसका पालन नहीं करना हमारी आदत और नियति बन चुकी है, इसका कारण क्या है? हमारी शारीरिक दुर्बलता के कारण हमारी कमजोर बुद्धि किसी काम को करने में समर्थ नहीं है, हमें इस कमजोरी को ताकत बनाना चाहिए, ऐसी आपको मेरी सलाह है। आप गीता पढ़ने की बजाय, फुटबाल के द्वारा स्वर्ग के अधिक पास पहुँच सकते हो! ये शब्द बेधड़क किन्तु सुस्पष्ट हैं और मैं ये इसलिए कह रहा हूँ कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ, मुझे मालूम है कि तुम्हें जूता कहाँ पर काट रहा है, मुझे इस विषय का कुछ अनुभव भी हुआ है। तुम्हें अपने घुटनों के और भुजाओं के तनिक से अधिक बल पर गीता ज्ञान का कुछ अधिक बोध हो सकता है, जब तुम अपने मजबूत पैरों पर खड़े होकर अपने पुरुषत्व का अनुभव करोगे तभी तुम उपनिषदों को भली प्रकार समझ सकोगे। तब तुम्हें महान् प्रतिभा और भगवान कृष्ण की महान् शक्ति का आभास होगा जब तुम्हारी रगों में कुछ तेज रक्तप्रवाह का संचार होगा। इस प्रकार तुम अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उठ सकोगे।
आधुनिक औषधि विज्ञान के अनुसार हम जानते हैं कि किसी भी व्याधि के आने के दो कारण होते हैं, बाहरी विषाणु और शारीरिक अल्प-आरोग्यता। जब तक शरीर में जीवाणु प्रवेश के प्रति अवरोध शक्ति है, जब तक शरीर की आंतरिक शक्ति जीवाणु-प्रवेश, उनके पनपने एवम् संवृद्धि के प्रतिकूल है तब तक कोई जीवाणु इतना शक्तिशाली नहीं है कि वह शरीर में रोग उत्पन्न कर सके। वास्तव में लाखों जीवाणु लगातार मानव शरीर में आते-जाते रहते हैं, परन्तु जब तक शरीर हृष्ट-पुष्ट है वह उनसे अप्रभावित रहता है। शरीर कमजोर होने पर ही जीवाणु उस पर हावी होते हैं और रोग उत्पन्न करते हैं। 
         बल :  यह एक बड़ा सत्य है कि बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मरण। बल ही अनन्त सुख है, अमर और शाश्वत जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु। 
लोग बचपन से ही शिक्षा पाते हैं कि वे दुर्बल हैं, पापी हैं। इस प्रकार की शिक्षा से संसार दिन-ब-दिन दुर्बल होता जा रहा है। उनको सिखाओ कि वे सब उसी अमृत की संतान हैं- और तो और, जिसके भीतर आत्मा का प्रकाश अत्यन्त क्षीण है, उसे भी यही शिक्षा दो। बचपन से ही उनके मस्तिष्क में इस प्रकार के विचार प्रविष्ट हो जायें, जिनमें उनकी यथार्थ सहायता हो सकें, जो उनको सबल बना दें, जिनसे उनका कुछ यथार्थ हित हो। दुर्बलता और अवसादकारक विचार उनके मस्तिष्क में प्रवेश ही न करें। सच्चिन्तन के स्त्रोत में शरीर को बहा दो, अपने मन से सर्वदा कहते रहो, ‘मैं ही वह हूँ, मैं ही वह हूँ।’ तुम्हारे मन में दिन-रात यह बात संगीत की भाँति झंकृत होती रहे और मृत्यु के समय भी तुम्हारे अधरों पर सोऽहम्, सोऽहम् खेलता रहे। यही सत्य है- जगत की अनन्त शक्ति तुम्हारे भीतर है।
वह क्या है जिसके सहारे मनुष्य खड़ा होता है और काम करता है? वह है बल। बल ही पुण्य है तथा दुर्बलता ही पाप है। उपनिषदों में यदि कोई एक ऐसा शब्द है जो वज्र-वेग से अज्ञान-राशि के ऊपर पतित होता है, उसे तो बिल्कुल उड़ा देता है, वह है ‘अभीः’ - निर्भयता। संसार को यदि किसी एक धर्म की शिक्षा देनी चाहिए तो वह है ’निर्भीकता’।  यह सत्य है कि इस एैहिक जगत में अथवा आध्यात्मिक जगत में भय ही पतन तथा पाप का कारण है। भय से ही दुःख होता है, यही मृत्यु का कारण है तथा इसी के कारण सारी बुराई होती है और भय होता क्यों है?- आत्मस्वरूप के अज्ञान के कारण।
बलिष्ठ एवम् निर्भीक बनो!
       बलिष्ठ बनो! बहादुर बनो! शक्ति एक महत्वपूर्ण विधा है, शक्ति जीवन है। निर्बलता मृत्यु है। खड़े हो जाओ। निर्भीक बनो। शक्तिशाली बनो। भारत वीरों का आह्वान कर रहा है। नायक बनो। चट्टान की भाँति अटल खड़े हो जाओ। भारत माता अनन्त ऊर्जा, अनन्त उत्साह और अनन्त साहस का आह्वान कर रही है। 
स्वामी विवेकानंद ने संस्कारित शिक्षा-प्रणाली पर जोर दिया। वे चाहते थे कि समाज में संस्कार युक्त शिक्षा प्रणाली का विकास हो। उन्होंने देश में ऐसी शिक्षा प्रणाली का विकास किया, जो देश व समाज की सांस्कृतिक जीवनदर्शी व राष्ट्रीय परम्पराओं के अनुरूप हो। स्वामी विवेकानंद चाहते थे कि व्यक्ति की श्रेष्ठता, महानता व इसके असीम विकास का आधार मात्र-शरीर, बुद्धि कौशल व शिक्षा नहीं है, बल्कि इसका आधार है ज्ञानार्जन के साथ-साथ संस्कारित शिक्षा पद्धति। इसके साथ ही अन्दर की पवित्रता तथा आचरण की श्रेष्ठता। 
         शिक्षा :  शिक्षा का अर्थ है, उस पूर्णता की अभिव्यक्ति, जो सब मनुष्यों में पहले ही से विद्यमान है। शिक्षा किसे कहते हैं? क्या वह पठन-मात्र है? नहीं। क्या वह नाना प्रकार का ज्ञानार्जन है? नहीं, यह भी नहीं। जिस संयम के द्वारा इच्छा-शक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और वह फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है। अब सोचो कि शिक्षा क्या वह है, जिसने निरन्तर इच्छा-शक्ति को बलपूर्वक पीढ़ी-दर-पीढ़ी रोककर प्रायः नष्ट कर दिया है, जिसके प्रभाव से नये विचारों की तो बात ही जाने दो, पुराने विचार भी एक-एक करके लोप होते चले जा रहे हैं, क्या वह शिक्षा है, जो मनुष्य को धीरे-धीरे यंत्र बना रही है?
मेरे विचार से तो शिक्षा का सार मन की एकाग्रता प्राप्त करना है, तथ्यों का संकलन नहीं। यदि मुझे फिर से अपनी शिक्षा आरम्भ करनी हो और इसमें मेरा वश चले, तो मैं तथ्यों का अध्ययन कदापि न करूँ। मैं मन की एकाग्रता और अनासक्ति को सामथ्र्य बढ़ाता और उपकरण के पूर्णतया तैयार होने पर उससे इच्छानुसार तथ्यों का संकलन करता। बच्चों में मन की एकाग्रता और अनासक्ति का सामथ्र्य एक साथ विकसित होना चाहिए।
        संस्कारित शिक्षा:  “जो समाज गुरु द्वारा प्रेरित है, वह अधिक प्रेम से उन्नति के पथ पर अग्रसर होता है, इसमें कोई संदेह नहीं। किन्तु जो समाज गुरु विहीन है, उसमें भी समय की गति के साथ-साथ गुरु का उदय तथा ज्ञान का विकास होना उतना ही निश्चित है।“
       योग शिक्षा :  “हम सब योगी बनकर जीवन सफल बनाएँगे। भारत के हरेक व्यक्ति को योग सिखाएँगे।।“
प्रत्येक व्यक्ति में अनंत ज्ञान और शक्ति का आवास है। वह शिक्षा देता है कि जिस प्रकार वासनाएँ और अभाव मानस के अंतर में हैं, उसी प्रकार उसके भीतर ही मन के अभावों के मोचन की शक्ति भी है और जहाँ कहीं और जब कभी किसी वासना, अभाव या प्रार्थना की पूर्ति होती है, तो समझना होगा, कि वह इस अनंत भंडार से ही पूर्ण होती है। हम लोग अपने वर्तमान सविशेष अर्थात् सापेक्ष भाव के पीछे विद्यमान एक निर्विशेष भाव में लौटने के लिए लगातार अग्रसर हो रहे हैं। स्वामी विवेकानंद जी ने योग शिक्षा के माध्यम से एक नई शिक्षा प्रणाली का प्रचार कर जन-जन को योग शिक्षा के महत्व से परिचित कराया। उन्होंने योग शिक्षा को जीवन में महत्वपूर्ण स्थान देने के लिए प्रेरित किया। आज भी प्रत्येक व्यक्ति योग शिक्षा के महत्व को जानता है और उसे अपने जीवन में अपनाता है।
        आज हमारे देश को आवश्यकता है लोहे के मांसपेशियों, इस्पात की तंत्रिकाओं और अति विशाल आत्मविश्वास की, जिसको कोई नकार न सके।
“उठो! जागो! और लक्ष्य प्राप्त होने तक रुको मत।“  

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