वर्तमान परिदृश्य में योग की आवश्यकता

वर्तमान परिदृश्य में योग की आवश्यकता

आज के भौतिकवादी युग में एक ओर जहां हम विज्ञान द्वारा विकास की दृष्टि से उन्नति के शिखर पर पहुंच रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक रूप से हमारा पतन परिलक्षित हो रहा है। आज  मनुष्य के खान-पान, आचार-व्यवहार सभी में परिवर्तन होने से उसका स्वास्थ्य दिन -ब-दिन गिरता जा रहा है। यही कारण है कि आज हमें ऋषि-मुनियों की शिक्षा को जानने के लिए, उनके द्वारा बनाये उत्तम स्वास्थ्य के रास्ते पर चलने के लिए योग की परम आवश्यकता है, जिससे हम “बहुजन हिताय बहुजन सुखाय“ की सुखद कल्पना को साकार कर सकें।    
         प्राचीनकाल में योगी समाज से बहुत दूर पर्वतों और जंगलों की गुफा-कंदराओं के एकांत में तपस्या किया करते थे। वे प्रकृति पर आश्रित सादा व सरल जीवन व्यतीत किया करते थे। जीव-जन्तु ही उनके महान शिक्षक थे, क्योंकि जीव-जन्तु सांसारिक समस्याओं और रोगों से मुक्त जीवन व्यतीत करते हैं। प्रकृति उनकी सहायक है। योगी, ऋषि और मुनियों ने पशु-पक्षियों की गतिविधियों पर बड़े ध्यान से विचार कर उनका अनुकरण किया। इस प्रकार वन के जीव-जन्तुओं के अध्ययन से योग की अनेक विधियों का विकास हुआ। इसीलिए अधिकांश योगासनों के नाम जीव-जन्तुओं के नाम पर आधारित हैं। 
           कहा जाता है कि जब योग का प्रचार दुनिया में शुरू हुआ तो इसका पहला प्रचार पश्चिमी देशों में उन लोगों में हुआ जो लोग वैज्ञानिक और ईसाई धर्म को मानने वाले थे। शुरूआत में जब भारत में रहकर ये लोग विदेश वापस गए तो अपने साथ आसन, प्राणायाम लेकर गए। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जब ये लोग कैदी हो जाते थे तब इनकी कैदखाने में हालत खस्ता रहती थी। भोजन, पानी, दूषित हवा के कारण किसी को कोलाइटिस, किसी को पेचिश तो किसी को खड़े-खड़े सोने के कारण पीठ की हड्डी में दर्द हो जाया करता था। जब उन्हें वहाँ डाॅक्टरी इलाज से फायदा नहीं मिलता था तो वे उन कैदियों के शरण में जाते थे जो योग जानते थे।  ऐसे में योग के जानकार अपने साथ ही अन्य कैदियों को भी शीर्षासन, सूर्य नमस्कार और उड्डियान बंध अादि द्वारा स्वस्थ रखने का काम करते थे।   कहा जाता है कि दूसरे महायुद्ध में कई लोग ऐसे थे, जिन्होंने जेल खाने में बंदी कैम्पों में योग द्वारा अपने शरीर को सुधारा। इनमें एक डाॅक्टर पोल्डर मैन हाॅलैंड के रहने वाले और दूसरी अॉस्ट्रेलिया की एक महिला रोमाब्लेयर भी थी। यह महिला 15 महीने से अधिक युद्ध बंदियों के बीच रही, जब उसको वहां पीलिया हुअा, तब उसने वहां एक अफ्रीकन व्यक्ति से कुछ आसनों को सीखा और उनका अभ्यास करने से रोगमुक्त  हुई। इस प्रकार अनेक लोगों ने योगाभ्यास द्वारा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया।
          ऐसे ही अनेक लोगों के द्वारा जब योग का पता चला तो पश्चिम के लोग चौकें और उन्होंने इस पर अनुसंधान करना शुरू किया। सबसे पहला अनुसंधान बंगाल के प्रख्यात डाॅक्टर दास ने फ्रांस में किया। वे वहां अस्थि रोग विशेषज्ञ थे। उन्होंने लोगों को अनुसंधान करके बताया कि योग की क्रिया करने से उसका असर न केवल मांसपेशियों पर, बल्कि इसका असर हड्डियों पर भी पड़ता है। इसका सीधा अर्थ हुआ कि योग में आसन केवल शारीरिक व्यायाम भर नहीं है।  आज विज्ञान ने मनुष्य को व्यावहारिक जीवन में अनेक तरह की सुख-सुविधाएं प्रदान की हैं, जिससे आज मनुष्य सुविधा भोगी होने से निष्क्रिय और आलसी बनता जा रहा है।  परिणामस्वरूप मनुष्य की जीवन-शैली अप्राकृतिक होने से वह प्रकृति से बहुत दूर चला गया है। इस कारण वह अनेक तरह के कष्टों, दुःखों, कठिनाईयों से घिरता जा रहा है। इन शारीरिक व्याधियों  के अलावा वह मानसिक और आत्मिक रूप से भी रूग्ण होता जा रहा है। उसे शांति नहीं है। अत्यन्त अशांति एवं तनाव में रहने के कारण वह मानसिक रूप से कमजोर होता जा रहा है। कमोवेश यह स्थिति युवाओं और वृद्धों की ही नहीं बल्कि बच्चों की भी है। बच्चों के ऊपर टेलीविजन और कम्प्यूटर, मोबाईल आदि इलेक्ट्राॅनिक उपकरणों का जबरदस्त प्रभाव है। इस कारण मुख्य रूप से उनकी दृष्टि प्रभावित होने से अनेक तरह के आंखों की व्याधियों से बच्चे ग्रस्त हो जा रहे हैं। 
          मनुष्य कितना ही महत्वाकांक्षी क्यों न हो मगर स्वस्थ मन व शरीर के अभाव में कुछ भी नहीं कर सकता। चाहे खेल का मैदान हो या नौकरी में तरक्की, कुछ कर दिखाने के लिए स्वस्थ रहना पहली प्राथमिकता है। सिद्ध योगियों ने इसका अनुभव किया और आसनों के महत्व पर प्रकाश डाला। पूर्व के मानव मस्तिष्क तथा आधुनिक मानव मस्तिष्क में भले ही थोड़ा-बहुत अंतर क्यों न हो, लेकिन आसन आज भी उतने ही उपयोगी हैं जितने हजारों वर्ष पूर्व, उनके जानने वालों के लिए थे। आज इसकी जागृति हो रही है, क्योंकि थोड़े ही समय में आधुनिक मस्तिष्क भी अपने आधुनिक उपकरणों के प्रयोग को असफल होते देख रहे हैं, जिससे वे योग को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए उचित माध्यम मानने लगे हैं। 
           योग का मुख्य लक्ष्य हमें परम चेतना मार्ग पर ले जाना है, जिससे हमेें अपने अस्तिस्व का ज्ञान हो सके। यदि शरीर रोग ग्रस्त है तो हमें परम चेतना की ओर जाने की इच्छा भी नहीं होगी, क्योंकि शरीर रोग होने से मन पर असर पड़ता है। शरीर में खुजली-दर्द हो तो बेचैन शरीर से बेचैन मन पकड़ में नहीं आता। इसलिए योग द्वारा शरीर को रोग मुक्त करना अत्यन्त आवश्यक है। भारत में योग दर्शन के द्वारा शारीरिक और मानसिक रोगों का निदान बताया गया है। इसमें शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए योग दर्शन को अपनाने पर बहुत बल दिया गया है। योग दर्शन दैहिक, मानसिक और आत्मिक दुःखों को दूर कर मनुष्य को अरोग्यता प्रदान करता है। सच्चे अर्थ में योगशास्त्र को देह, मन तथा आत्मा का चिकित्सा शास्त्र कहा जाना अधिक उपयुक्त होगा, क्योंकि इसके माध्यम से व्यक्ति अपने समस्त दुःखों पर विजय पा सकता है।
          प्रायः देखा गया है कि बहुत हिम्मत वाले व्यक्ति भी रोगग्रस्त होने पर हिम्मत हार जाते हैं, क्योंकि शारीरिक स्वास्थ्य की गिरावट से मन कमजोर हो जाता है, लेकिन वही व्यक्ति स्वास्थ्य प्राप्त करने पर पुनः मजबूत बन जाता है।  योग शरीर को चुस्त, स्वस्थ रखने का सबसे आसान माध्यम है। शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक संस्कृति के रूप में योगासनों का इतिहास समय की अनंत गहराईयों में छिपा है। मानव जाति के प्राचीनतम साहित्य वेदों में इनका उल्लेख मिलता है। वेद आध्यात्मिक ज्ञान के भंडार हैं। उनके रचयिता अपने समय के महान आध्यात्मिक व्यक्ति थे। कुछ लोगों का ऐसा भी विश्वास है कि योग विज्ञान वेदों से भी प्राचीन हैं।
         आधुनिक युग में योग सारे संसार में जिस तीव्र गति से फैल रहा है वह प्रशंसनीय व स्वागत योग्य है। योग का ज्ञान हर एक की संपत्ति बनता जा रहा है। आज डाॅक्टर और वैज्ञानिक भी योग के माध्यम से स्वस्थ रहने की सलाह दे रहे हैं। यही कारण है कि भारत ही नहीं, अपितु दुनिया भर के लोग यह अनुभव कर रहे हैं कि स्वस्थ जीवन और निरोग रहने के लिए योग सर्वोत्तम माध्यम है।

गाँव में शादी-ब्याह की रंगत

गाँव में शादी-ब्याह की रंगत

दो चार दिन ही सही लेकिन जब भी शहर की दौड़-भाग भरी जिन्दगी से दूर पहाड़ी हरे-भरे पेड़-पौधों, गाँव की टेढ़ी-मेढ़ी बलखाती पगडंडियों, खेत-खलियानों, मिट्टी-पत्थरों से बने घरों के बीच गाँव की सरल, सौम्य मिलनसार लोगों से मिलती हूँ तो मन खुशी से झूम तरोताजगी से भर उठता है।
गर्मियों में जब बच्चों की स्कूल की छुट्टियाँ होती हैं, तब मेरी तरह ही भले ही दो-चार दिन के लिए ही सही लेकिन हर प्रवासी की प्राथमिकता मेरे पहाड़ के गाँव ही होते हैं। गर्मियों में पहाड़ के गाँव बहुत याद आते हैं। हम प्रवासी पंछियों को शहर में आग उगलते सूरज से घबराकर पहाड़ों की गोद में बड़ा सुकून मिलता है। शहरी भीड़-भाड़ से उकताया मन पहाड़ का नाम सुनते ही शांति और ठण्डक से भर उठता है।
पहाड़ों के नैसर्गिक सौन्दर्य का अनुभव किसी के सुनाने-सुनने से नहीं अपितु वास्तविक आनन्द तो वहाँ पहुंचने पर ही मिलता है। पहाड़ों की बात निकले और उसमें हमारे उत्तराखंड का जिक्र न हो, ऐसे कैसे हो सकता है। यहाँ जब भी कोई सैलानी आता है, उसे यहाँ के मंदिर, मठ, साधु-संतों से ही नहीं अपितु सदियों से किसी संत की तरह तपस्या में लीन पहाड़ों को देखकर इसके देवभूमि कहे जाने का आशय स्वयं ही समझ में आ जाता है।      
अभी हाल ही में अपने एक रिश्तेदार की लड़की के विवाह समारोह में सम्मिलित होकर गाँव की कई खट्टी-मीठी यादें लेकर लौटी हूँ। प्रायः गर्मियों के दिनों में मेरी तरह ही जब अधिकांश प्रवासी गर्मी से राहत पाने, अपने घर-द्वार की सुध लेने, शादी-ब्याह या पूजन आदि समारोह में सम्मिलित होने के लिए गांव की ओर कूच करते हैं, तो हम प्रवासियों की तरह उजाड़ होते गाँवों की रौनक लौट आती है। शहर में घर-दफ्तर की चार-दीवारी से बाहर जब भी गाँव की खुली हवा में एक अलग दुनिया देखने, नाच-गाने, हंसी-मजाक एवं मेलमिलाप कर मौज-मस्ती का सुनहरा अवसर मिलता है, तो इसके लिए मैं बहुत ज्यादा सोच-विचार न करते हुए अपने पहाड़ के गाँव की ओर निकल पड़ती हूँ।           
गर्मियों के दिनों में गांव में शादी-ब्याह की खूब चहल-पहल रहती है। कई लोग तो बकायदा शहर से गाँव शादी करने जाते हैं। वे बखूबी जानते हैं कि गाँव में शादी कराने के फायदे ही फायदे  हैं। एक तो शादी-ब्याह का खर्चा भी कम होता है ऊपर से नाते-रिश्तेदारों से मिलने-जुलने के साथ ही शहर की गर्मी से कुछ दिन दूर पहाड़ की ठंडी-ठंडी हवा-पानी और अपनी जड़ों से मिलने का सुनहरा अवसर भी हाथ लग जाता है। इसके अलावा शादी में दिखावा से दूर अपनों का छोटी-छोटी खुशियों में घुल-मिल जाने का हुनर मन को बड़ा सुकून पहुंचाता है। यही बात  है कि मुझे आज भी शहर की चकाचौंध भरी शादी-समारोह के बजाय गांव की सादगी भरी शादियाँ बहुत भली लगती हैं। गांव की शादी में सबके चेहरे पर जो रौनक देखने को मिलती है, वह शहर की चकाचौंध भरी शादी-समारोह के ताम-झाम से हैरान-परेशान लोगों के चेहरों पर कहीं नज़र नहीं आती है।

हम शहर की बारात में कुछ देर के लिए भले ही बम-फटाखों और कनफोडू डीजे की धक-धक पर एक-दूसरे को देख-देख कितना भी उछल-कूद कर लें, लेकिन जो बात गांव की बारात में देखने को मिलती है, वह शहर से कोसों दूर हैं। गाँव की बारात में जब  ढोल-दमाऊ और बैंड-बाजे के साथ पहाड़ी धुन पर गाने बजते हैं तो फिर जो सुरीली झंकार घर-आंगन से लेकर सुदूर घाटियों तक गूंज उठती है, वह और कहीं सुनने-देखने को नहीं मिल पाती है। 
गाँव की एक झलक भर देखने से बचपन के दिनों की ढेर सारी यादें एक-एक कर ताजी हो उठती हैं।  बचपन में जब कभी किसी की शादी-ब्याह का न्यौता मिलता तो मन खुशी के मारे उछल पड़ता, लगता जैसे कोई शाही भोज का न्यौता दे गया हो। तब आज की तरह रंग-बिरंगे शादी के कार्ड बांटने का चलन नहीं था।
मौखिक रूप से ही घर-घर जाकर बड़े विनम्र आग्रह से न्यौता दिया जाता था। जैसे ही घर को न्यौता मिलता बाल मन में खुशी के मारे हिलोरें उठने लगती। नए-नए कपड़े पहनने को मिलेंगे, खूब नाच-गाना होगा और साथ ही अच्छा खाने-पीने को भी मिलेगा। यही सब ख्याल मन में उमड़ते-घुमड़ते। किसकी-किससे शादी होगी, कहाँ होगी, उसमें कौन बराती, कौन घराती होगा, सिर्फ खाना-पीना, नाचना-गाना ही चलेगा या कुछ लेना-देना भी पड़ेगा, किससे कैसा बात-व्यवहार निभाना पड़ेगा, इन तमाम बातों से कोसों दूर हम बच्चों को तो केवल अपनी मस्ती और धूम-धमाल मचाने से मतलब रहता। उस समय शादी में बैण्ड बाजे की जगह ढोल-दमाऊ, मुसक बाजा, रणसिंघा (तुरी) और नगाड़े की ताल व स्वरों पर सरांव (ऐसे 2 या 4 नर्तक जो एक हाथ में ढ़ाल और दूसरे में तलवार लिए विभिन्न मुद्राओं में मनमोहक नृत्य पेश करते हैं) बारात के आगे-आगे नृत्य करते हुए गांव के चौपाल तक जब पहुंचते थे तब वहां नृत्य का जो समा बंध जाता था, उसे देखने आस-पास के गांव वाले भी सब काम धाम छोड़ सरपट दौड़े चले आते थे।
हम बच्चे तो घंटों तक उनके समानांतर अपनी धमा-चौकड़ी मचाते हुए अपनी मस्ती में  डूबे नाचते-गाते रहते। घराती और बारातियों को खाने-पीने से ज्यादा शौक नाच-गाने का रहता। उन्हें खाने की चिन्ता हो न हो लेकिन हम बच्चों के पेट में तो जल्दी ही उछल-कूद मचाने से चूहे कूदने लगते, इसलिए जैसे ही खाने की पुकार होती हम फ़ौरन अपनी-अपनी पत्तल संभाल कर पंगत में बैठ जाते और बेसब्री से अपनी बारी का इंतजार करने लगते। पत्तल में गरमा-गरम दाल-भात परोसते ही हम उस पर भूखे बाघ के तरह टूट पड़ते। तब हंसी-मजाक और अपनेपन से परोसे जाने वाला वह दाल-भात आज की धक्का-मुक्की के बीच छप्पन प्रकार के व्यंजनों से कहीं ज्यादा स्वादिष्ट लगता था। 
......कविता रावत

जन्मदिन की खुशियाँ

जन्मदिन की खुशियाँ

आमतौर पर बच्चे रात को 10:30 बजे तक सो जाया करते हैं।  लेकिन कल वे 12 बजे तक खेलते रहे, नींद उनसे कोसों दूर थी।  मैंने सोने को कहा तो कहने लगे नींद नहीं आ रही हैं, जब आएगी सो जायेंगे। मैंने भी सोचा दिल्ली से उनकी बुआ और भतीजा आये हुए हैं, इसलिए मस्ती कर रहे हैं।  यही सोचकर मैं चुपचाप अपने कमरे में बैठकर टीवी देख रही थी कि ठीक 12 बजे सभी दूसरे कमरे से निकलकर मेरे कमरे में घुसते ही एक साथ जोर-जोर से "हैप्पी बर्थडे टु यू " चिल्लाए तो मैं अचानक चौंक पड़ी।  सबने आकर मेरे आगे केक और खुद का बनाया ग्रीटिंग कार्ड रख दिया, तो माजरा समझ में आया। 
मेरे ऑफिस जाने का बाद बच्चों ने इस तरह बुआ  के साथ मिलकर मुझे सरप्राइज़ देने का प्लान बनाया था। यह मुझे तभी मालूम हुआ। अपने जन्मदिन पर केक और बच्चों के हाथ से बना ग्रीटिंग पाकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई।  सोचती हूँ इस तरह के अपनेपन से भरे क्षण पाकर मेरी तरह ही सबको भी ख़ुशी मिलती होगी, है न   ....................  






















बचाना होगा हिमालय को

बचाना होगा हिमालय को

हिमालय एक पूरी पर्वत श्रंखला है। यह श्रृंखला पूर्व से पश्चिम तक 2500 किमी क्षेत्र में फैली हुई है, जिसका आच्छादन लगभग 5 लाख 95 हजार कि.मी. क्षेत्र है। हिमालय भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में विस्तार लिये हुए है। यह पर्वत श्रृंखला भारतीय उपमहाद्वीप और तिब्बत को अलग करती है। हिमालय पांच देशों भारत, भूटान, नेपाल, चीन और पाकिस्तान से सटा हुआ है। यद्यपि हिमालय के अधिकांश हिस्सों पर भारत भूटान और नेपाल का प्रभुत्व है, तथापि चीन और पाकिस्तान इसके कुछ हिस्सों पर शासन करते है।
           हिमालय पर्वत श्रृंखला का निर्माण आज से लगभग सात करोड़ साल पहले इण्डियन टेक्टोनिक प्लेट और यूरेशियन टेक्टोनिक के टकराने से हुआ था। वैज्ञानिकों के अनुसार यह दोनों प्लेट्स अभी भी घूम कर रहीं है। यही कारण है कि हिमालय क्षेत्र के पहाडों की ऊंचाई बढ़ रही है। दिलचस्प बांत यह है कि हिमालय इतना पुराना होने के बाद भी अन्य पर्वत श्रंखलाओं की तुलना में युवा है। 
वैज्ञानिकों के मुताबिक हिमालय पर्वत जियोलाॅजिकली लिविंग है। इसका दक्षिणी भाग हर साल लगभग 20 मिलीमीटर आगे बढ जाता है। एक अनुमान लगाया गया है कि एक करोड़ साल में हिमालय एशिया में 1500 किमी तक आगे खिसक आयेगा। 
सोचो अगर हिमालय नहीं होता
         हिमालय भारत के लिये यह कितना महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इस एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि अगर यह नहीं होता तो आज पूरा क्षेत्र मौसमी कहर से नहीं बच पाता। यह मध्य एशिया से आने वाली ठण्डी हवाओं को रोक देता है, जिससे भारत कड़ाके की ठण्ड से बचा रहता है। हिमालय मानसूनी हवाओं को भी रोकता है, जिसके कारण पूरे क्षेत्र में तमाम हिस्सों में बारिश होती है। इसकी ऊंचाई और मानसूनी हवाओं के रास्ते में स्थित होने के कारण ऐसा होता है। 
         हिमालय भारत के लिये लम्बे समय से उत्तर का प्रहरी रहा है। यह हमारे देश के लिये एक प्रकार की नैचुरल बाउन्ड्री है। हिमालय के दर्रे काफी ऊंचे हैं और ठण्ड के मौसम में तो पूरी तरह बर्फ से ढके रहते हैं। इतिहास में कभी कोई आर्मी इसे पार नहीं कर सकी है। यह ट्रान्सपोर्ट और कम्यूनिकेशन के लिये भी एक अच्छा बैरियर है।        
गंगा, यमूना, ब्रह्मपुत्र समेत कई विशालकाय नदियों के लिये हिमालय पानी के विशाल भण्डार के रूप में कार्य करता है। देश की लगभग सभी बड़ी और बारहमासी नदियां हिमालय के पहाड़ों या ग्लेशियर से उत्पन्न होती है। हिमालय की नदियां उत्तर भारत के लिये जीवन रेखा जैसी है। यह भारी बारिश, बर्फ और ग्लेशियर के कारण गर्मियों में भी नदियां सदाबहार बनीं रहती है। 
        हिमालय से उत्पन्न होने वाली नदियां अपने साथ पहाड़ों पर से उपजाऊ मिट्टी मैदानों तक लाती है। एक अनुमान के अनुसार गंगा प्रतिदिन अपने साथ 19 लाख टन गाद और सिंधु नदी अपने साथ 10 लाख टन गाद लाती है। यही कारण है कि उत्तर भारत के मैदान हिमालयांे का तोहफा कहा जाता है। इसके अलावा इस क्षेत्र में कई प्रकार के बहुमूल्य खनिज भी पाये जाते है। 
        हिमालय की गहरी घाटी बांधों के निर्माण के लिये सबसे बढि़या जगह है। यहां पर कई जगह ऐसे प्राकृतिक झरने है जिसके कारण हाइड्रोइलेक्ट्रीसिटी जनरेशन में और आसानी होती है। यद्यपि बांधों को लेकर हाल के वर्षाें में विवाद भी हुआ है। इतना ही नहीं यहां पर कई तरह की मूल्यवान जड़ी बूटियां और काष्ठ सम्पदा पाई जाती है। यहां वनस्पतियों की ऐसी कई प्रजातियां पाई जाती हैं, जो दुनियां के किसी कोने में नहीं पाई जाती है। 
क्या-क्या समाया है हिमालय में 
नदियाँ -हिमालय में 19 मुख्य नदियां है। इनमें सिंधु और ब्रह्मपुत्र सबसे बड़ी है। इन दोनों ही नदियांे का कैचमैंट बैसिन 2,60,000 वर्ग किमी का है। अन्य नदियों में पांच नदी झेलम, चेनाब, रावी, व्यास और सतलज सिंधु सिस्टम की हैं। गंगा सिस्टम की नदियों में गंगा यमुना, रामगंगा, काली, करनाली, राप्ती, बाघमती और कोसी है। 
पहाड़ -  हिमालय में 100 से भी ज्यादा पहाड़ 7200 मीटर से भी उंचे है। इसमें माउंट एवरेस्ट भी शामिल है। जो दुनिया का सबसे उंचा पहाड़ हैं। इतना ही नहीं हिमालय आज लाखों लोगों का घर है और जीव जन्तुओं की सैकडों युनिक प्रजातियां यहां रहती हैं। पूर्वी हिमालय में अकेले 10 हजार किस्म के पौधंे, 750 प्रकार की चिडियां और 300 प्रजातियों के प्राणी रहते हंै। 
ग्लेशियर्स - अंटार्कटिका और आर्कटिक के बाद हिमालय दुनिया का तीसरा सबसे अधिक बर्फ वाला स्थान है। पूरे हिमालय में लगभग 15 हजार ग्लेशियर्स हैं। इन ग्लेशियर्स में सियाचिन ग्लेशियर्स सबसे प्रमुख है। करीब 70 किमी लंबा यह ग्लेशियर नाॅन पोलर एशिया का सबसे लंबा ग्लेशियर है। इसके अलावा बाल्टारोे, बिआफों, नुब्रा और हिसपुर अन्य मुख्य ग्लेशियर है। 
मिट्टी - हिमालय के नाॅर्थ फेसिंग स्लोप्स (उत्तर मुखी ढलानों) पर मिट्टी की मोटी परत है। यह मिट्टी कम ऊंचाईयों पर घने जंगलों तथा अधिक ऊंचाईयों पर घास का पोषण करती है। जंगल की मिट्टी गहरे भूरे रंग की तथा इसकी बनावट चिकनी दोमट है। 

        हम कई दशकों से हिमालय का लगातार दोहन करते आ रहे हैं। हमने नदियों से बिजली बनाने, वनों से लकड़ी लेने और पहाडों से खनन करने की होड़ में इसका प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ना शुरू कर दिया है। हिमालय के एक हिस्सेे से छेड़छाड़ का असर दूसरे हिस्से पर भी पड़ता है। जुलाई 2012 में नेचर क्लाइमेंट चंेज में छपी स्टडी में कहा था कि हिमालय के ग्लेशियर तेजी से कम हो रहे हैैं। इसी तरह हाल ही में आई अन्य स्टडी में दावा किया गया है कि हिमालय में बढ़ती गर्मी के कारण यहां सैकडों की तादाद में झीलें बन गई है, जो कभी भी घातक हो सकती हैं।