ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Monday, May 29, 2017

तानाशाह का काम किसी भी बहाने से चल सकता है


अनाड़ी कारीगर अपने औजारों में दोष निकालता है।
पकाने का सलीका नहीं जिसे वह देगची का कसूर बताता है।।

कातना न जाने जो वह चर्खे को दुत्कारने चला।
लुहार बूढ़ा हुआ तो लोहे को कड़ा बताने लगा।।

जिसका मुँह टेढ़ा वह आइने को तमाचा मारता है।
कायर सिपाही हमेशा हथियार को कोसता है।।

जो लिखना नहीं जानता वह कलम को खराब बताता है।
भेड़िए को मेमना पकड़ने का कारण अवश्य मिल जाता है।।

कायर अपने आप को सावधान कहता है।
कंजूस अपने आप को मितव्ययी बताता है।।

बहानेबाजों के पास कभी बहानों की कमी नहीं रहती है।
गुनाहगार को बहाना बनाने में दिक्कत पेश नहीं आती है।।

अनाड़ी निशानेबाज के पास हमेशा झूठ तैयार रहता है।।
तानाशाह का काम किसी भी बहाने से चल सकता है।।

....कविता रावत 


15 comments:

  1. तभी तो मेमने सी जनता पर बाघ से तानाशाह का सुशासन चलता है.... सूंदर 'कविता'। बधाई!!!

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  2. वैसे भी कहा जाता है कि हम अपनी नाकामयाबी का ठीकरा दूसरों पर ही फोड़ते है। सुंदर प्रस्तुति।

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  3. वैसे भी कहा जाता है कि हम अपनी नाकामयाबी का ठीकरा दूसरों पर ही फोड़ते है। सुंदर प्रस्तुति।

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (30-05-2017) को
    "मानहानि कि अपमान में इजाफा" (चर्चा अंक-2636)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  5. वाह..
    हर श़ेर मे एक सीख
    सादर

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  6. बहुत खूब.....
    लाजवाब प्रस्तुति..
    नाच न जाने आँगन टेढा..।

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  7. दिनांक 31/05/2017 को...
    आप की रचना का लिंक होगा...
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी इस चर्चा में सादर आमंत्रित हैं...
    आप की प्रतीक्षा रहेगी...

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  8. बहुत सुन्दर, सार्थक और सटीक प्रस्तुति....

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  9. वाह ... हर बात सटीक ... साफ़ आइने की तरह ... लोहे की तरह कड़क ... नया अन्दाज़ में सटीक सामयिक और दुरुस्त बात की प्रखरता से रखते हुए ... बहुत बधाई ...

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  10. हर छंद में सीख देती रचना, बहुत बढ़िया कविता जी

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  11. हमारे जीवन में कई पात्र हमसे टकराते रहते हैं जिनकी सूक्ष्म पड़ताल करती यह रचना विचारोत्तेजक है। बधाई कविता जी।

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  12. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है http://rakeshkirachanay.blogspot.in/2017/06/22.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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  13. कातना न जाने जो वह चर्खे को दुत्कारने चला।
    लुहार बूढ़ा हुआ तो लोहे को कड़ा बताने लगा।।
    बहुत ख़ूब ! आदरणीय जीवन का सही अर्थ बताती आपकी सुन्दर व विचारणीय रचना आभार। "एकलव्य"

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