हेमलासत्ता (भाग-2)

हेमलासत्ता (भाग-2)

नाई की बात सुनकर खेतासर के लोग बोले- हेमला से हम हार गए, वह तो एक के बाद एक को मारे जा रहा है, बड़े गांव में भी हम लोगों को चैन से नहीं रहने दे रहा है। हम कुछ नहीं कर सकते। अब तो बड़े शहर जाकर वहाँ से मियां मौलवी को लाना होगा। सुना है वहां एक खलीफा जी बड़े सिद्धहस्त हैं, उनके आगे हाथ जोड़कर जो बेऔलाद औरतें भेंट चढ़ाती हैं उन्हें वह गंडे-ताबीज देते हैं, जिससे उनकी गोद भर जाती हैं। जिन्न, डाकिनी और देव सब उनसे डरते हैं, भूत, मसान, खबीस सभी उनसे कांपा करते हैं। उनके पास जाकर खेतासर के लोगों ने नगद भेंट निकालकर हाल सुनाया तो वे बोले- “मैं आप लोगों से पहले भेंट हरगिज नहीं लूँगा, पहले चलकर वहाँ उस भूत को दफन करके आऊँगा, उसके बाद ही भेंट स्वीकार करूँंगा।“  यह सुनकर सभी खुश होकर बोले- जैसी आपकी मर्जी, अब हमारी यही अर्जी है कि आप हमारे साथ चलें। विनती कर वे लोग उसे गांव लाये और उसकी खूब खातिरदारी की, जिसे देख खुश होकर खलीफा बोला- ’सुनो सब, सत्ता से डरने की कोई बात नहीं अब समझो वह भसम हो कर रहेगा।’  बड़े सवेरे शीघ्र खलीफा ने नहाकर साफ जगह में चतुष्कोण चौका लगवाया, लोबान सुलगाया, मन्त्र जप, जन्त्र जगाए और सवा पहर दिन चढ़े मियां जी बाहर आकर बोले- ’चलकर साथ मुझे वह जगह बताओ। किसी तरह की जरा न दिल में दहशत खाओ।’ ’डरते-डरते लोग हुए दस-बीस साथ में, पुस्तक लेकर चले खलीफा एक हाथ में।’ आधी दूर पहुंचे, ठिठक कर, रूके सब लोग, कहा खलीफा से- अब हम हम नहीं चलेंगे, सामने जो ताल दिखाई दे रहा वहीं पर खेतासर का विकट हेमला भूत रहता है। ’अच्छा ठहरो यहीं, मैं अकेला ही जाता हूँ और उसे अभी भसम कर लौटता हूँ।’ इतना कहकर मियां पुस्तक खोलकर विलक्षण बोली में पढ़ते-पढ़ते आगे बढ़ते रहे।  आज हेमला ताल के किनारे पर पड़ा हुआ था। जैसे ही मियां के शब्द उसके कानों में पड़े वह चौंककर खड़ा हो गया। मियां ने एकाएक भयंकर भूत सम्मुख देखा तो वह अवाक् खड़ा रह गया। लाखों भूत-पलीत उन्होंने झाड़ दिए थे, हजारों को भसम और सैकड़ों को गाड़ दिए थे, लेकिन प्रत्यक्ष देहधारी भूत देखने का मौका उन्हें पहली बार मिला। आगा-पीछा सोचते हुए खलीफा जोर-जोर से अपने बदन पर फूंक मारने लगा। इतने में दुडू-दुडू कर दौड़ते हुआ अलबेला सत्ता मियां के ऊपर कूद पड़ा। अपने को निपट अकेला समझ मियां का मुंह पीला पड़ गया और उसकी हवाई उड़ने लगी। आज उनकी करामात ने उनसे विदाई मांग ली है यह जानकर वह पीछे पांव लौटकर भागने लगे तो दुडू-दुडू कर सत्ता ने दौड़ लगाई और मियां की कमर में लात जमाई और आगे आकर तड़ातड़ आठ-दस हाथ दे मारे। जब ’हाय! मरा’ कहकर मियां वहीं बेहोश हो गए तब उसकी किताब को फाड़-फाड़कर उसके पन्ने-पन्ने उड़ाता सत्यानाशी सत्ता मरघट की ओर यह बड़बड़ाते हुए चला कि- मूढ़ यह गलबल-गलबल कर यहां क्यों मरने आया था। कुछ लोग आगे बढ़कर पीछे वालों को यह सब आंखों देखा हाल सुना रहे थे- ’क्या वस्तु खलीफा है बेचारा? लो, वह भागा, अरे, हाय! मारा, वह मारा।’ हेमला चला गया लेकिन मियां बहुत देर बाद भी नहीं लौटा तो चिन्ताकुल लोग मन में बहुत घबराये। भयातुर होकर धीरे-धीरे पास पहुंचे तो देखा मियां के प्राण पखेरू उड़ गए थे। लोगों ने बस, झटपट चुपचाप टांगकर उन्हें उठाया और भागकर गांव पहुंचकर हाल सुनाया- “भूत सहज का है क्या सत्ता? कर दी जिसने नष्ट मियां की सभी महत्ता। और साथ ही पटक मार भी उनको डाला;  हाय! पड़ा है दुष्ट दैत्य से अपना पाला। अब क्या शेष उपाय रहा, सब तो कर छोड़े; भूल न लेंगे नाम, हाथ अब हमने जोड़े।।“         
         इस घटना से हेमला का खूब डंका बजा। इधर-उधर के गांव वालों ने भी खेतासर की सीमा में पांव रखना बंद कर दिया। एक दिन एक ठाकुर अपने लाव लश्कर के साथ ऊंटों पर सवार होकर अपने ससुराल को निकले। चलते-चलते जब वे एक गांव पहुंचे तो लोगों ने उनसे कहा कि आगे रास्ता बंद है। आपको खेतासर छोड़कर तीन कोस का फेर लगाना होगा। पूछने पर उन्होंने हेमला का हाल सुनाया तो ठाकुर को बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्हें विश्वास नहीं हुआ। वे बोले- ’वे अवश्य ही खेतासर होकर जायेंगे और आज हेमला भूत वहां जाकर देखेंगे।’ यह सुनकर उनके नौकर-चाकर और संगी साथियों ने उन्हें खेतासर से नहीं चलने की विनती की। उन्होंने समझाया कि तीन कोस को फेर ज्यादा नहीं है, ऊंट को चढ़ने में देर नहीं लगती है।सौ-सौ बात हुई लेकिन ठाकुर नहीं माना, उसने जहाँ हेमला है, वहीं चलने की ठान ली। आओ कहकर वह खेतासर की ओर चल पड़ा। खेतासर के सूने घर भायं-भायं कर रहे थे। ठाकुर बोले- यहीं बितायेंगे दोपहरी, यहाँ जल का बड़ा सुबास और गहरी छाया है। अनेक बार अनुनय-विनय के बाद सब हारे। ताल किनारे डेरा डाला गया। नौकर-चाकर सभी हेमला से डरते थे। उनमें से किसी में भी डेरे से दो कदम आगे बढ़ाने का साहस न था। हर कोई सोचता कि अब तो प्राण जाने वाले हैं, सत्ता भूत सदेह अभी आने वाला है। सब मन ही मन बुरी तरह से ठाकुर को कोस रहे थे। सभी आपस में खुसुर-फुसुर सुनी-सुनाई बातों को दोहराते कि भूत विकट है, वह खूब लाते जमाता है। सब डर से कांप रहे थे, अगर कहीं पत्ता भी खड़का तो चौंक पड़ते। सभी लोग आपस में सटकर बैठे हुए थे लेकिन ठाकुर निर्भय होकर अलग दरी बिछाकर उस पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ाते हुए बीच-बीच में ’डरना मत तुम लोग’ कहकर सबको दिलासा दे रहे थे। उसने अपने बगल में बंदूक रखी थी।          
       मटरगस्ती कर ज्यों ही हेमला ताल के किनारे आया एक ऊंट बल-बल बल्लाया। वह मरघट से बाहर आया तो उसने मनुष्यों की आवाज सुनी तो उसे अचम्भा हुआ। उसने देखा कि ताल पर कुछ लोग ठहरे हुए है। अरे, कौन ये मूढ़ आज मरने चले आये हैं। मेरे ताल पर डेरा जमाकर बैठे हैं। अभी हेमला यही सोच रहा था कि कैसे इन्हें यहाँ से भगाऊँ कि इतने में एक आदमी की नजर उस पर पड़ी तो वह चिल्लाया- ’ठाकुर साहब, हाय! वह देखो, हेमला सत्ता आया।’ ठाकुर बोला कहाँ? अरे, किस ओर? किधर है? उधर देखिए उधर, यहीं, यह, उधर, उधर है, सब एक साथ चिल्लाये। “देखा ठाकुर ने कि वेश विकराल बड़ा है, मरघट में से निकल सामने भूत खड़ा है। दुर्बल, दीर्घ शरीर, भील सा काला काला, सिर पर रूखे बाल, घुसी सी आंखों वाला। मुंह पर दाढ़ी-मूंछ बड़ी बेडौल बढ़ी है, नंगे तन पर बिना चढ़ाई भस्म चढ़ी है। दृष्टि रोप कर के देखने वे जैसे ही दुडू-दुडू कर कूद चला सन्मुख वैसे। चिल्लाये सब लोग- अरे आया, वह आया हाय! करें क्या? मरे, आज सत्ता ने खाया। ठाकुर ने ललकार उन्हें तब डांट लगाई भरी धरी थी निकट, विकट बन्दूक उठाई। सीधी कर दी कालरूप भयहरण भवानी, जिसे देख मर गई आज सत्ता की नानी। दुडू-दुडू भूलकर भागना चाहा जैसे- तनी देख बन्दूक डरा-भागूंगा कैसे? मर जाऊंगा, नहीं बचूंगा किसी तरह से, गरजा ठाकुर- अरे, चला आ इसी तरह से। खबरदार, जो उधर-उधर को कहीं हिला है, देखा सत्ता ने कि आज यह गुरू मिला है। हिला जहां बस, देह फोड़ दूंगा मैं तेरी, देख खोपड़ी अभी तोड़ दूंगा“  ऐसी विकट स्थिति देख हेमला दीनता से बोला- ’आदमी हूँ मत मारो; महाराज मैं भूत नहीं हूं, मुझ पर दया विचारो।’ ठाकुर बोला- ’भूत हो कि अवधूत या कि यमदूत बड़ा लेकिन आज तू काजी के सामने है। आज तुझे बचना है तो मेरा कहा मानना होगा, जहां धड़ाका हुआ तो तेरा फड़ाका हो जायेगा। बस, सीधा, चुपचाप चला आ यहां अभी, भगने की भूल न करना। आकर अपना सच्चा हाल सुना दे मुझे, मैं तुझ शैतान को प्राणदान दे दूँगा। कालमुखी को देख हेमला दीन हुआ, सुन ठाकुर के वचन वह बलहीन हुआ। उसने सोचा जो यह कहे आज उसे करना ही होगा नहीं तो बेमौत मारा जाऊंगा। उसने कहा- ’दुहाई अब मुझे गोली मत मारना, अब मैं कभी भूत नहीं बनूँगा, जो हो ली सो हो ली। हुक्म आपका मानकर आपके चरणों में हाजिर होकर अपना दुःखड़ा रोता हूँ, पर नंगा हूं, इसीलिए कुछ शरमाता हूँ, मारो मत मैं हाथ जोड़ता हूँ। तब ठाकुर ने एक दुपट्टा फेंक उधर को कहा- इसे पहन, चला आ शीघ्र इधर। उसे पहन कर पास हेमला उनके आया। कर प्रणाम, कुछ दूर बैठ, सब हाल सुनाया। सुनकर हाल ठाकुर बोला- अरे दुष्ट, पापी, हत्यारे, डरा-डराकर तूने क्यों इतने लोगों को मारा? तो हेमला ने बोला- ’कहां मैंने मारे हैं? वे तो अपने आप सारे डर कर मरे हैं। ’अच्छा तो दुडू-दुडू की बदमाशी क्यों करता था सत्यानाशी? जो डरते थे उन्हें और डरवा देता था, अरे मूर्ख तभी तो उनके प्राण निकल जाते थे।  तब हाथ जोड़कर हेमला ने विनती कि मुझे माफ करें, मेरा चोला बदलवा दीजे हुजूर।’ ठाकुर बोले- अभी चार दिन मेरे लौटने तक इसी ठौर पर जमा रह। जब ससुराल लौटकर आऊंगा तो तुझे बड़े गाँव ले जाऊंगा। यह मेरा कर्तव्य है मैं उससे मुंह नहीं मोडूंगा। तुझे भूत से आदमी बनाकर रहूँंगा।’ हेमला बोला- आपकी कृपा बड़ी है पर अब मेरे लिए एक घड़ी भी बरस के बराबर है। सर्वसुखी जो कभी हेमला जाट रहा था भूत योनि में पड़ा, कठिन दिन काट रहा था। उसका यों उद्धार आपने आज किया है, मरे हुए को जिला कर नया नर जन्म दिया है। मैं आपका कृतज्ञ हूं मैं आपका सेवक हूं और आप हैं मेरे स्वामी। बहुत रह लिया, नहीं यहां अब रह सकता हूं। भूतपने के कष्ट नहीं अब सह सकता हूँं। गांव नहीं तो साथ आपके रहूंगा। अपनी बीती आप कहानी वहां कहूंगा।’  ठाकुर को बात पसंद आई कि “इसका शोर इधर सब ओर बड़ा है, विकट भूत यमदूत हेमला नाम बड़ा है। मारे जिसने पटक खलीफा जी को ऐसे वह सत्ता फिर कहो, मनुज हो सकता कैसे। होगी किसको भला हेमला से यह आशा। होगा निस्संदेह विलक्षण बड़ा तमाशा। आयेंगे वे लोग मुझे मिलने जैसे ही भागेंगे सब देख हेमला को वैसे ही। हुल्लड़ होगा, एक बड़ी दिल्लगी रहेगी, इस प्रकार से वहां हास्य की नदी बहेगी।“  यही सोच ठाकुर ने अपने साथियों से कहा-“हेमला भूत हमारे साथ चलेगा।“ सुनकर हुक्म ठाकुर का हेमला बहुत खुश हुआ। हाथ जोड़कर बोला- कई दिनों से भूखा हूँ सरकार, खाना मिल जाता तो! ठाकुर ने नौकर से खाना देने को कहा तो वह डरकर दूर से उसे खाना देने लगा तो ठाकुर बोला- अरे, इतनी दूर, किसलिए खड़ा है, किस बात का डर है, यह भूत नहीं है। लेकिन नौकर के लिए उसके पास जाना सहज नहीं था उसने दूर से ही खाना फेंका तो ठाकुर ने हंसकर कहा- ’अरे यह भूत नहीं है, देखो यह खाना खा रहा है, जला नही है, मरा नहीं है, क्या तुमने अभी इसकी कथा नहीं सुनी है।“  लेकिन नौकर-चाकर सभी बडे़ भयभीत थे, वे यही सोच रहे थे कि “ठाकुर चकमे में हैं। भला हेमला भूत किसके बस में आया है? छल से आज यह मरघट का बना हुआ है हाऊ और ठाकुर बछिया का ताऊ।“ ठाकुर ने समझाया पर उन्हें पूरा विश्वास नहीं हुआ, किसी को पौंन तो किसी का पूरा अधूरा रहा।          
ठाकुर ने फिर हुक्म दिया- तैयारी हो अब। झट से ऊंट कसे गए और सभी तैयार हो गए। दो-दो कर प्रत्येक ऊंट पर चढ़े। केवल एक अकेला ऊंट पर नाई चढ़ा। उसे ठाकुर ने हुक्म दिया कि वह हेमला को अपने साथ बिठा ले। इस पर नाई बोला- अगर वह मुझे खा ले तो? यह सुनकर ठाकुर हँसने लगा तो उनके साथ सभी नौकर-चाकर हँसने लगे। नाई बोला-’भूत हो या आदमी की खाल चढ़ा भूत, मैं तो पैदल ही चलूंगा।’ यह सुनकर जब ठाकुर ने उसे फटकार लगाई तो उसने हेमला को पीठ पिछाड़ी बिठाया। नाई चलते-चलते सोच-विचार करने लगा- ’यों कि इसी ने गांव उजाड़ा, मारे आदमी मारे, मौलवी पटक पछाडा। सिवा भूत के कौन प्राण यों हर सकता है। क्या ऐसा अन्धेर आदमी कर सकता है। हाय! आज हो गया हमारा ठाकुर उल्लू, और साथ ही बना दिया मुझको भी भुल्लू। मैं बातों में भूल, फंसा हूं भूत-जाल में, अब है बचना कठिन, पड़ा है काल-गाल में।“  तमाम उल्टी-सीधी बातें सोचकर नाई का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, कलेजा कांप रहा था, वह भयभत होकर भूत को भांप रहा था। वह देख रहा था कि जाने कब यह सत्यानाशी अपने पैर बढ़ा देगा या फिर उसके शरीर में दांत गड़ा देगा। वह रह-रह कर इधर-उधर ताक-झांक कर रहा था। उसका ऊंट बोदा था इसलिए सभी से पिछड़कर दस हाथ पिछड़ गया। इतने में हेमला को छींक आई तो नाई ’हाय! मुझे खा लिया’ कहकर धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ा। ठाकुर को जोर की आवाज सुनाई दी तो उन्होंने पीछे मुड़कर देखा कि नाई सिर के बल गिरा हुआ है। ठाकुर चिल्लाया- अरे कैसे गिर पड़ा नाई? हेमला बोला- मुझे जोर की छींक आई थी, जैसे ही छींका, यह चिल्ला कर ऊँट से गिर पड़ा। ठाकुर ऊँट से उतर कर नाई के पास आया तो देखा सब लोग घबराये थे। नाई पत्थर पर गिरा था। उसकी नब्ज छूट गई थी, खोपड़ी फूट गई थी, गर्दन टूट गई थी, वह निष्प्राण पड़ा था। खेतासर से अभी आधा कोस भी नहीं बढ़े कि श्रीगणेश कर दिया हाय! इसी भांति कौन जानता है कि अभी किस-किस के प्राण लेगा? आप मानते ही नहीं? इसे साथ न लो यहीं रहने दो, यों सब साथी ठाकुर से विनती करने लगे। हेमला बोला- हाय! मेरी तकदीर अभागी है, निर्दोष होकर भी पाप का भागीदार बन रहा हूँं। ठाकुर बोले- चलो लौटकर अब खेतासर चलकर इस नाई का ताल किनारे दाह करो। दाह कर सभी ने ताल में नहाया। इतने में शाम हो गई। ठाकुर ने सोचा- यह व्यर्थ ही हँसी-हँसी में अनर्थ हो गया। इसी तरह से और लोग भी डर सकते हैं, बिना मौत ही मूर्ख मर सकते हैं। हेमला को साथ ले जाना उचित नहीं होगा। इसे पहले बड़े गांव पहुंचाना होगा। अब बड़े गांव की तैयारी हुई। हेमला आफतों का परकाला एकदम खाली ऊँट पर सवार होकर चला।       
          संध्या का समय था। जैसे ही ठाकुर अपने लाव-लश्कर के साथ गांव पहुंचा, अरे, हेमला भूत, हेमला भूत चिल्लाते हुए लोग इधर-उधर भागने लगे। यह देखकर ठाकुर ने सबको समझाया- ’मत भागो, मत डरो, हेमला भूत नहीं है, इसे पकड़ कर आज मैं अपने साथ लाया हूँ।’ फिर ठाकुर ने बीच गांव में डेरा डाला और खेतासर के सभी लोगों को बुलवाया। सभी लोग इकट्ठे हुए, सभी अचरज कर रहे थे, कुछ डर के मारे बहुत दूर से ही देख रहे थे। ठाकुर ने बैठकर पहले सबको स्वयं थोड़ा-बहुत हाल सुनाया फिर पूरा-पूरा हाल पुनः हेमला से सुनवाया। हाल सुनने के बाद ठाकुर बोला- ’सुन ली सत्य कहानी? यों लोगों ने भूत बनाकर नादानी की। तब लोग हेमला से बोले- ’हेमला, दादा, चाचा, तू मनुष्य है? फिर क्यों तू भूत बन नंगा नाचा, खूब सताया और गांव से हमें निकाला। तूने दुडू-दुडू कहकर कितनों को मार डाला।’  गांव वालों की बात सुनकर हेमला दुःखी होकर बोला- ’अब मैने दुडू-दुडू छोड़ दिया है। मैंने बड़ा अनर्थ किया, यह बात सही है, मुझे सब लोग क्षमा करो मेरी यही विनती है।’ इतना सुनकर भी गांव को पूरा विश्वास नहीं हुआ कि हेमला भूत नहीं है, इसलिए वे ठाकुर से बोले- ’प्रभुवर, इसे रात भर अपने पास रखिए, जैसी कृपा अब तक की, इतनी कृपा और कर दीजिए। रात बीतने और सवेरा होने दीजिए।’ यह प्रस्ताव जब ठाकुर के संगी-साथियों ने सुना तो वे डरे, मन में सोचने लगे कि यह बात तो बड़ी बेढ़ंगी है। वे चिन्ता करने लगे कि जाने हेमला भूत ठाकुर को जीवित छोड़ता है या मार डालेगा? लेकिन वे विवश थे, किसी को रात भर नींद नहीं आई, जाग कर किसी तरह सबने रात बिताई। इस तरह रात भर ठाकुर के पास हेमला रहा और जब सवेरा हुआ तो सभी लोग वहाँ एक इकट्ठा हुए।  
सभी लोगों ने ठाकुर को जीवित देखा तो ज्यादातर लोगों को विश्वास हो गया कि हेमला भूत नहीं है। तब ठाकुर ने कहा- एक नाई बुलवाओ और हेमला के बाल काटकर उसे नहलाओ। डरते-डरते बड़े गांव वाला नाई हेमला के पास आकर बैठा और उससे बोला- ’अरे हेमला तू भूत नहीं है, मरा नहीं है?’ हेमला बोला- अरे मरा कभी लौटता है क्या?’ ’तो उस दिन क्यों दुडू-दुडू कह मुझे डराया। कब का बदला लिया तूने मुझसे? क्यों तूने नाइन को खाया। मैंने भला कौन सी तेरी चोरी कर दी जो तूने मेरी गृहस्थी चौपट कर दी।’ यह सुनते ही हेमला बोला- ’याद है तुझको नाई, तूने ही तो उस दिन नाइन से मुझे आत्मघात कर विकट भूत बनकर घूमने वाला बताया था। तेरी बात सुनकर ही मुझे भूत बनने की सूझी।“ नाई बोला-“अरे, मैंने समझ-बूझकर थोड़े कहा था, मैंने तो नाइन से दिल्लगी की थी। वह डरती है या नहीं उसकी परीक्षा ली थी। मैं नहीं जानता था कि दैव मेरे साथ छल करेगा।“ यह बात सुनकर ठाकुर बोला- “झूठ हंसी में भी खलता है।“ सुनकर ठाकुर की बात नाई बहुत पछताया। हेमला की हजामत बनी और उसने खूब नहाया। कपड़े पहनकर ठाकुर से हाथ जोड़कर बोला- “आज भूत का चोला छोड़ मैं फिर से मनुष्य हुआ हूँ। इसके लिए मैं आपका ऋणी रहूंगा। सदा आपके गुण गाता रहूंगा। आप न मिलते तो मैं भूत बनकर ही किसी दिन मरकर पड़ा रहता।“  हेमला को कृपा दृष्टि से देख कर ठाकुर ने सबसे कहा- “सुनो, अब से भूलकर भी भूत से नहीं डरना। भूत-भाव के भय से देखो कैसे सबने हेमला को मनुष्य से भूत समझ लिया, यह प्रत्यक्ष उदाहरण तुम्हारे सामने है।“
(मुंशी अजमेरी ’प्रेम’ कृत हेमलासत्ता से अनूदित)

हेमलासत्ता   [भाग- 1]

हेमलासत्ता [भाग- 1]

एक छोटे से गांव खेतासर में हेमला जाट रहता था। उसके घर में दूध, पूत, धन, धान्य सभी था। सभी तरह से उसकी जिन्दगी सुखपूर्वक कट रही थी। उसकी अपनी प्रिय पत्नी से हमेशा प्रेमपूर्वक खूब पटती थी। वह हमेशा अपने बाल-बच्चों और नाती-पोतों से घिरा रहता था। सब कुछ होते हुए भी एक कसर बाकी थी कि वह अनपढ़-अज्ञानी ‘काला अच्छर भैंस बराबर’ था। एक बार अचानक उसकी घरवाली बीमार पड़ी और उसने खाट पकड़ ली। जाट पर इस बार भारी विपत्ति टूट पड़ी। उसने खूब दौड़-धूप की, किन्तु कोई चारा न चला, किसी देवता ने भी कोई सहारा न दिया। अंततः उसकी प्रिय पत्नी उसे छोड़ चल बसी। यह देख वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसका रोना सुनकर आस-पड़ौसी आए और उसे ढ़ांढ़स देने लगे, लेकिन हेमला की समझ में कुछ नहीं आया। उसने एक रट पकड़ ली कि वह भी सन्तो की मां के संग सत्ता होगा। उसकी ऐसी बात सुन सभी लोग आश्चर्यचकित हुए और उसे समझाने लगे- ‘क्यों व्यर्थ ही बक रहा है, रहने दे रहने, पति संग पत्नी को सती होते तो सुना है हमने, लेकिन कभी यह नहीं सुना कि पत्नी संग कोई पति सत्ता हुआ हो।’ लोगों ने उसे बहुत समझाया लेकिन वह अपनी बात पर अड़ा रहा। वह लोगों से कहता अगर उसे किसी ने रोका तो उसे सत्ता का शाप लगेगा। उसके ऐसे बोल सुन लोग सोच विचारने लगे कि यदि वह अपने प्राण गंवाता है तो गवाएं, हम उसके शाप के भागीदार क्यों बने। विवश होकर सभी लोगों ने शव यात्रा की तैयारी की और चुपचाप श्मशान की ओर चलने में ही भला समझा। शव यात्रा में हेमला हाथ में श्रीफल लेकर संसार से हमेशा नाता त्यागने की प्रबल इच्छा से ’हर-हर’ कहता हुए आगे-आगे चलने लगा तो यह देख स्त्रियाँ मुक्तकंठ से उसकी प्रशंसा करने लगी, कहती- 'अद्भुत पत्नी प्रेम है हेमला का, धन्य है हेमला की पत्नी जिसे ऐसा पति मिला जो उसके साथ सत्ता होने जा रहा है।’ जब हेमला ने अपनी प्रशंसा सुनी तो उसका उत्साह चरम सीमा पर पहुंच गया। वह श्मशान घाट पहुंचने तक जोर-जोर से हर-हर की रट लगाता आया। श्मशान ताल से कुछ दूरी पर था, जहां कुछ ही दूरी पर पीलू का एक घना पेड़ था, उसी के पास चिता सजाई गई। एक बार फिर अंतिम बार बड़े बुजुर्गों ने हेमला को समझाना चाहा किन्तु सब व्यर्थ गया, वह न माना और सूर्य की ओर हाथ जोड़कर उछलकर हर-हर कहता हुए चिता में जा बैठा। संध्याकाल का समय था। सूर्य छिपने वाला था। हेमला तब तक 'हर हर’ की रट लगाता रहा जब तक उसके शरीर को लकड़ियों से पूरी तरह ढ़क न लिया गया। पूरी लकड़ी लगाने के बाद हेमला की आज्ञा लेकर जब चिता पर आग लगाई गई तब काले धुंए के साथ कुछ ही क्षण बाद उससे धू-धू कर भयंकर लपटें निकलने लगी। तेज लपट लगने से हेमला का जब तन झुलसने लगा तो उसका ज्ञान-विराग और पत्नी राग जाता रहा। असहनीय पीड़ा ने उसे भगने पर मजबूर कर दिया। अकुलाकर वह झट से चिता से बाहर उस ओर कूदा जहांँ अंधकार के कारण किसी की नजर उस पर नहीं पड़ी। वह पीलू के पेड़ की आड़ में छिप गया।        
          आग की लपटों में जले-भुने हेमला के अंगों में भयंकर पीड़ा हो रही थी। वह व्याकुल, व्यथित, विहाल, रात भर सिसकता रहा। बड़े सवेरे उठकर घिसटता जब उसने गूलर खाकर पानी पिया तो उसे कुछ राहत मिली। गांववालों के जागने से पहले वह यह सब काम करके वापस पीलू के पेड़ की आड़ में छिप गया। वह सोचता रहा कि इतने कष्ट सहते हुए वह कब तक यहां छिपा पड़ा रहेगा। एक पल को उसने सोच विचार कर गांव जाकर अपना सच्चा हाल सुनाने का मन बनाया लेकिन दूसरे पल ही सोचने लगा कि वह किस मुंह बेशरम बनकर गांव लौटेगा, लाखों लानतें देंगे लोग। उससे यह बात हरगिज नहीं होगी। वह जीते-जी गांव नहीं जा सकता। इससे अच्छा तो वह जंगम-जोगी बनकर परदेश चला जाय। अगर वह गांव जायेगा तो शरम के मारे मर जायेगा। ऐसी बात मन में सोचकर हेमला उदास होने लगा और मरघट वासी बन गया। उसी जगह वह कभी बीन-बीन कर गूलर खाता कभी छिप-छिपाते बकरियां पकड़ उनका दूध लगाकर पी जाता। यूं ही छिपते-छिपते बारह दिन हो गये। उसके जलने के घाव भी अच्छे हो गये। तेरहवीं के दिन उसे याद आई कि आज तो उसके घर में खूब मालपुए, पूड़ी-साग बना होगा, लेकिन क्या करें अब कोई उसके लिए पीलू के पेड़ के नीचे तो पत्तल परोस के नहीं लाने वाला है, इसलिए वह मन मसोसकर रह गया।
            हर तेरहवीं की तरह ही इस बार भी खेतासर में बड़े गांव से नाई अपनी पत्नी सहित आया, किन्तु शाम तक काम पूरा न होने से उन्हें देर हो गई। मालपुओं की गठरी बांधे वे दोनों पहर रात आपस में बतियाते हुए मरघट से निकले। अचानक नाई को दिल्लगी सूझी वह नाइन से बोला- ’सुनो प्यारी! जाट हेमला यहीं सत्ता हुआ था।’ नाइन बोली- ’उसका प्रेम अलौकिक था।’ यह सुनकर नाई हंसकर बोला- ’नहीं रे, व्यर्थ ही मूढ़ मति हेमला ने आत्महत्या की, अब तो वह विकट भूत बनकर यहीं-कहीं भटक रहा होगा।’ इतना सुनते ही नाइन बिगड़कर बोली- ’ऐसी बात न करो जी, भला क्यों ठिठोली कर रहे हो, मुझे डर लगता है।’ पेड़ की आड़ से हेमला चुपचाप नाई-नाइन का कथन सुन रहा था। उसने सोचा- ’क्यों न इनका संशय सच में दूर कर दूं। विकट भूत का रूप धारण कर जीते-जी संसार के बीच मरकर देखूं।’ झट से हेमला पहले पेड़ में चढ़ा और उसे जोर-जोर से हिलाते हुए बम से नीचे कूदा तो यह देख नाई-नाइन थर-थर कांपने लगे। काले-काले बिखरे बाल, नंग-धड़ंग वह लमटंगा जैसे ही ’दुड़ू-दुडू़’ कर उनके सामने आया तो नाई-नाइन उल्टे पैर भागे, लेकिन नाइन गिरकर चिल्लाई तो फिर न उठ सकी, उसकी सांसे वहीं थम कर रह गई। मालपुए की टोकरी लेकर हेमला वापस आ गया और यह सोचकर हंसने लगा कि विकट भूत का वेश भला है और बोला- 'चलो आज का श्रीगणेश हो गया है।' बद्हवास नाई गांव वापस आकर चिल्लाया- ’अरे! हेमला भूत हाय! उसने नाइन को खा लिया। यह कहते-कहते बेहोश हो गया। उपचार करने पर जब उसकी चेतना वापस आई तो वह हेमला के बच्चों को रोते-रोते यों हाल सुनाने लगा-
"था पूरा पच्चीस हाथ, काला काला-सा,
बड़े बड़े थे दांत, हाथ में था भाला सा।।
’दुडू-दुडू़’ कह, कूद सामने आ ललकारा;
बोली से पहचान लिया, था बाप तुम्हारा।
मारी पटक, पछाड़ हाय रे! नाइन मारी,
भाग बचा मैं, भाग न पाई वह बेचारी।
अरे चलो झट, हाय! मार ही डाली होगी;
पड़ी धूल में देह प्राण से खाली होगी।"
इस प्रकार विकल, विलपता नाई मन ही मन और भी दुःखी हुआ कि उसकी दिल्लगी उसे भारी पड़ गई। यों रात को हल्ला-गुल्ला सुन पूरे गांव के लोग हेमला के घर इकट्ठा हुए और वहीं सबने रात बितायी। सुबह-सुबह मौके पर पहुंचे तो नाइन को मृत देख सभी डरे, चौंके और चकराये। उन्हें पूर्ण विश्वास हो चला कि यह काम हेमला भूत का ही है। जल्दी से लोगों ने नाइन की वहीं चिता बनाई और नाई को ढ़ांढ़स देकर क्रियाकर्म की विधि पूरी करवाई। यों ही श्मशान में बहुत देर तक लोग बातें करते रहे, लेकिन मालपुओं की किसी को याद नहीं आई।
            दिन चढ़ते ही पूरे गांव में हेमला की चर्चा जोर-शोर से होने लगी। कोई कहता हेमला का अत्याचारी भूत प्रकट हुआ है, जिसने राह चलते रात को नाइन को मार दिया है। कोई कहता रात-विरात भूलकर भी उस राह नहीं जाना। हेमला बहुत बड़ा भूत है। कब किसको खा जाय कोई नहीं जानता। इन सब बातों से बेखबर हेमला मरघट में छिपा रहा। मालपुए खाकर उसका मन तृप्त हुआ तो उसे आत्मग्लानि हुई,सोचने लगा- ’हाय हेमला! यह तूने क्या किया एक निरपराधिनी को मार दिया, उसने तेरा क्या बिगाड़ा था। बहुत बुरा है हमेशा भूत-भड़ंग बनकर मरघट में छिपे रहना। कब तक यूं दुःख सहता रहूंगा।’ यह सोचते-सोचते जैसे ही हेमला पेड़ की आड़ से बाहर आया तो उसने कुछ दूरी पर मुखिया को अकेला खड़ा देखा तो मारे खुशी के उछल पड़ा। वह विचारने लगा कि अगर मुखिया के पास जाकर अपना हाल सुनाऊँ तो इस दुःखिया का बेड़ा पार हो जाय। फिर सोचता कहीं अगर वह मुझे देख डरकर भागने लगे तो जाकर एकदम से उनके पैर पकड़ लूंगा।’ यही सोच उसने दबे पांव, चुपचाप पीठ-पीछे से जाकर अचानक मुखिया के पैर पकड़ लिए। मुखिया 'कौन' कहकर चिल्लाया तो 'हेमला' का नाम सुना तो चिल्लाया- ’अरे दौड़ियो, हाय! मुझे सत्ता ने खाया।’ कहते हुए गिर पड़ा, जिसे देख हेमला बहुत घबराया। खेतों में कुछ दूरी पर लोग काम रहे थे, मुखिया के शब्द सुनकर लोगों ने उस ओर देखा तो उन्हें हेमला के बड़े-बड़े बाल, नंग-धड़ंग शरीर दिखाई दिया। दिन-दोपहरी में भूत देखकर लोग घबराकर अनहोनी की बात से भयाकुल होकर चिल्लाने लगे- ‘अरे, हेमला भूत खड़ा है ताल-किनारे; देखो, उसने पटक हाय! मुखिया जी मारे’ मुखिया को बेहोश देख मरघटिया हेमला भागा और अभागा पीलू के पेड़ की आड़ में छिपते हुए सोचने लगा- अरे, चला था अच्छा करने, किन्तु बुरा हो गया। अब क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आता क्यों विधाता मुझसे खपा हो गये हैं। जाने क्या लिखा है मेरे कपाल में, भूतपने से मुक्ति दीखते नजर नहीं आ रही है। उधर गांव के लोग मुखिया को उठा लाये। उन्हें बेदम बुखार चढ़ा, दस्त लग गये। वे बेहोशी में चौंककर चीख पुकार मचाते- ’वह आया-अरे दौड़ियो, हाय! मुझे सत्ता ने खाया।’ रात भर यों ही मुखिया बेचारा पड़े रहे और सवेरे लोक छोड़ परलोक सिधार गए। जब मुखिया की चिता तैयार हुई तो सत्ता ने सोचा दो हो गए। जब से मुखिया मरा, हेमला की धाक जम गई। लोग रात क्या दिन में उस जीवित जमदूत, भूतों के ताऊ के इलाके में जाने से डरने लगे। मुखिया की तेरहवीं पर मालपुए और पूड़ी-साग की बात सोचकर उसके मुंह में पानी आया तो उसका मन विकल हो उठा। तन-मन में संग्राम मचा। जाय तो किधर जायें। तन पर मन की जीत हुई तो बुद्धि चलाई और इधर-उधर से जोड़कर लकड़ियां लेकर आग जलाई। वहीं चिता की आग के लिए लाई हुई काली-काली हांडिया दिखी तो उन्हीं में आग भरकर खुरापात करने गांव की ओर निकल पड़ा। गांव के नजदीक आते ही उसने एक हांडी से आग उछाली और भयंकर आवाज के साथ उसे जोर से पत्थर पर दे पटका तो ऐसा दृश्य देखकर गांव वाले भोजन की पत्तल छोड़कर भूत-भूत कर भागने लगे। उसने एक-एक कर भयंकर आवाज के साथ आग और हांडी से तमाशा किया, जिसे देख लोगों में भगदड़ मची तो मौका पाकर वह उछलता-कूदता उनके बीच गया और वहां पहुंचकर उसने कुछ को उछल-उछल कर दो-चार लाते जमाई और मालपुओं की डलिया लेकर भाग खड़ा हुआ। डरे-सहमे गांव वालों ने मिलकर जैसे-तैसे रात काटी और सवेरा होने पर गांव छोड़ने की ठान ली। अब वे बड़ा गांव रहेंगे। हद हो चुकी, कब तक त्रास सहेंगे। पापी हाथ धोकर पीछे पड़ गया है। भूत है कि यमदूत। कहीं नहीं सुना ऐसा। इसके मारे कोई काम नहीं कर पायेंगे, नाइन और मुखिया की तरह एक दिन सबको खा जायेगा। खेत भले ही बड़े हैं किन्तु प्राणों से प्यारे नहीं हैं। हमारी जमीन, धन, धान्य सभी बाद में हैं। सभी एकमत हुए कि गांव छोड़ने के सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है। अपना-अपना सामान बैलगाड़ियों में लादकर सारे गांव वाले खेतासर खाली करके चल दिए। दुःखी मन राह सोचते कि इस पिचाश ने तो मां से मोह तोड़ा है और जन्मभूमि का वास छुडा दिया है।           
         इस प्रकार रोते-कलपते खेतासर गांव के वासी उदास होकर गांव छोड़कर उसे सूना छोड़ गए। इस घटना का शोर जब हेमला के कानों तक पहुंचा तो वह खेतासर गांव के घर-घर में घुसकर घूमने-फिरने लगा। देख-दाख कर फिर पीलू के पेड़ की आड़ में छिप जाता। वह अपना पूर्ण प्रताप देख फूला न समाता। अब उसे उजड़े गांव से नहीं मरघट से लगाव हो गया। उस पर भूतपने का रंग बहुत चढ़ चुका था, इसलिए उसका लौटना कठिन हो चुका था। वह कभी मरघट से चहल-कदमी करते हुए गांव निकल पड़ता, जहां सुनसान घरों में उसे कुछ न कुछ खाने को मिल जाता। खेतों से भी पेट भरने के लिए कुछ न कुछ मिल जाता। यों दुःख को सुख जान हेमला जाट सुखी था, किन्तु पूर्व स्मृति के कारण उसका हृदय दुःखी था। खेतासर गांव वाले बड़े गांव जाकर बस गए। बेचारे प्रेत सत्ता के मारे करते भी क्या? बड़े गांव में एक दिन घोड़े पर चढ़कर शाही हुक्म लेकर एक रौबदार सिपाही आया। बना-ठना था ऊपरी पैसा खाकर। नाई पर उसकी नजर पड़ी तो बोला- ’चल बे! इधर आ, पहले मेरे घोड़े का पानी पिला, फिर मेरी हजामत बना और मुझको नहला भी दे। जल्दी कर हुक्म की तामील।’ नाई को उसकी अकड़ बुरी लगी, उसने उसे टरकाना चाहा, बोला- ’पानी का यहां बड़ा संकट है सरकार, लेकिन यहां से थोड़ी दूर एक लबालब ताल है, वहीं कृपा कर आप कष्ट करें तो खूब नहा लें आप और घोड़ा भी।’ नाई की बात सुन सिपाही बहुत खुश हुआ बोला- ’क्या खूब गहरी मनचाही छाया भी है वहां? नाई के हाँ कहने पर वह बोला अच्छा तो वहीं ले चल। वहाँ चलने की बात सुनकर नाई घबराकर मन में सोचने लगा- अरे मेरी चतुराई तो चौपट हो गई। मैंने तो अपनी बचत सोच आफत टाली थी। खेतासर की बला सिपाही पर डाली थी। वह यह न समझा था कि साथ में जाना होगा और मुझे वहां इसे नहलाना होगा। नाई को चुप देख सिपाही ने भौंह चढ़ाई- ’क्यों बे! चुप हो गया, क्या तेरी नानी मर गई।’ नाई चौंका, सोचने लगा लगता है अब तो नाइन के बाद उसी की बारी है। इसलिए वह विनती कर गिड़गिड़ाने लगा-’ महाराज! जब से नाइन और मुखिया मरे है और खेतासर उजड़ा है, तब से ताल पर मनुष्यों का नहीं केवल भूतराजा हेमला का राज है।’ उसकी बात सुनकर सिपाही बिगड़ते हुए बोला- ’अबे! उल्लू के पट्ठे, बदमाश, क्या मैं ही मिला तुझे ठट्ठा करने के लिए? सुन बे! हम कचहरी के पक्के जिन्दा भूत हैं, जिस पर लग जाते हैं उसके छक्के छुड़ा देते हैं। चल, आज दिखाई तो दें वह भूत, देखता हूँ उसे भी।’ सिपाही ने नाई को बहुत समझाया कि भूतवूत कुछ नहीं होता, वह उसे वहां ले चले, लेकिन वह तैयार नहीं हुआ तो सिपाही ने जैसे ही चार तमाचे उसके आंखों के नीचे जड़े तो उनसे चिन्गारियां क्या निकली कि वह झट से मान गया। ’चलता है या नहीं कि खाएगा अब कोड़े?’ दोनों हाथ जोड़कर ’चलता हूँ सरकार’ कहते हुए सिर पर घास रखकर, घोड़े के आगे-आगे नाई गुमसुम चल दिया। देखने वाले भाग खड़े हुए। खेतासर का ताल सिपाही के मन भाया, उसमें स्वच्छ जल भरा हुआ था, पेड़-पौधों की घनी छाया देख वह खुश हुआ, लेकिन नाई का हृदय धुकुड़-पुकुड़ कर रहा था। घोड़े को खूंटे से बांध उसे घास डालकर नाई चौकन्ना होकर सिपाही की खोपड़ी घोंटने बैठ गया। वह कभी इधर कभी उधर देखता जा रहा था। अभी सिपाही की आधी खोपड़ी घुट पाई थी कि नाई को दूर से हेमला आता दिखाई दिया तो उसकी अकुलाहट बढ़ गई, वह थर-थर कांपने लगा। उसकी थर-थर्राहट से सिपाही चिल्लाया- ’क्यों बे क्या हुआ? क्या बिच्छू ने काट खाया तेरे को।’ इतना सुनते ही ‘जाता हूँ, ले देख, वह तेरा बाप आया‘ कहकर नाई नौ दो ग्यारह हो गया। झुंझलाते हुए सिपाही उठा और इधर-उधर देखने लगा। उसने देखा सचमुच भूत उसी की ओर आ रहा है। उसका दिल दहल गया, सोचने लगा- यह कौन बला है? उसने देखा कि उसके सिवा दूर-दूर तक कोई नहीं है। सब ओर सूना है तो उसका मन बहुत घबराया। इससे पहले कि वह कुछ सोच पाता जैसे ही दुडू-दुडू का भयानक शब्द उसे सुनाई दिया उसकी देह थर-थर थराई, वह फुर्ती से घोड़े की खूंटी खोले बिना ही उस पर एड़ लगाकर सड़ा-सड़ कोड़े बरसाने लगा। घोड़ा हिनहिनाते हुए खूंटी उखाड़कर भाग खड़ा हुआ। जैसे ही घोड़े की चाल बढ़ी तड़ा तड़ पीछे से खूंटी सिपाही के सिर पड़ने लगी। भूत का डर उसकी खोपड़ी में बैठ गया। वह समझा कि मुझे और कोई नहीं भूत मार रहा है। पीछे तरफ घुटी-घुटाई साफ खोपड़ी में ज्यों-ज्यों मार पड़ी वह बड़बड़ाने लगा- ’अब मत मार, धरम की कसम है तुझे। तौबा-तौबा, अरे माफ कर, मुझे, न मार, मैं तेरी पूजा कराऊंगा, कभी ताल पर नहीं आऊंगा, सत्ते! तुझको पूजने के बाद ही शहर वापस जाऊंगा।’ इधर हेमला तालियाँ बजाकर खूब हंसा उधर सिपाही गांव के पास बेहाल होकर गिरा। घोड़ा पास ही घुप्पू बन खड़ा हुआ था। समाचार सुनकर बड़े गांव का मुखिया आया। सिपाही को बेहोश देख बहुतेरे उपाय किए लेकिन उसने मुंह नहीं खोला, पहर रात सिपाही चल बसा। यह देखकर नाई ने खूब नमक-मिर्च लगाकर बढ़ा-चढ़ाकर किस्सा सुनाया। 

निरंतर .........                                                                  (मुंशी अजमेरी ’प्रेम’ कृत हेमलासत्ता से अनूदित)