हेमलासत्ता [भाग- एक]

एक छोटे से गांव खेतासर में हेमला जाट रहता था। उसके घर में दूध, पूत, धन, धान्य सभी था। सभी तरह से उसकी जिन्दगी सुखपूर्वक कट रही थी। उसकी अपनी प्रिय पत्नी से हमेशा प्रेमपूर्वक खूब पटती थी। वह हमेशा अपने बाल-बच्चों और नाती-पोतों से घिरा रहता था। सब कुछ होते हुए भी एक कसर बाकी थी कि वह अनपढ़-अज्ञानी ‘काला अच्छर भैंस बराबर’ था। एक बार अचानक उसकी घरवाली बीमार पड़ी और उसने खाट पकड़ ली। जाट पर इस बार भारी विपत्ति टूट पड़ी। उसने खूब दौड़-धूप की, किन्तु कोई चारा न चला, किसी देवता ने भी कोई सहारा न दिया। अंततः उसकी प्रिय पत्नी उसे छोड़ चल बसी। यह देख वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसका रोना सुनकर आस-पड़ौसी आए और उसे ढ़ांढ़स देने लगे, लेकिन हेमला की समझ में कुछ नहीं आया। उसने एक रट पकड़ ली कि वह भी सन्तो की मां के संग सत्ता होगा। उसकी ऐसी बात सुन सभी लोग आश्चर्यचकित हुए और उसे समझाने लगे- ‘क्यों व्यर्थ ही बक रहा है, रहने दे रहने, पति संग पत्नी को सती होते तो सुना है हमने, लेकिन कभी यह नहीं सुना कि पत्नी संग कोई पति सत्ता हुआ हो।’ लोगों ने उसे बहुत समझाया लेकिन वह अपनी बात पर अड़ा रहा। वह लोगों से कहता अगर उसे किसी ने रोका तो उसे सत्ता का शाप लगेगा। उसके ऐसे बोल सुन लोग सोच विचारने लगे कि यदि वह अपने प्राण गंवाता है तो गवाएं, हम उसके शाप के भागीदार क्यों बने। विवश होकर सभी लोगों ने शव यात्रा की तैयारी की और चुपचाप श्मशान की ओर चलने में ही भला समझा। शव यात्रा में हेमला हाथ में श्रीफल लेकर संसार से हमेशा नाता त्यागने की प्रबल इच्छा से ’हर-हर’ कहता हुए आगे-आगे चलने लगा तो यह देख स्त्रियाँ मुक्तकंठ से उसकी प्रशंसा करने लगी, कहती- 'अद्भुत पत्नी प्रेम है हेमला का, धन्य है हेमला की पत्नी जिसे ऐसा पति मिला जो उसके साथ सत्ता होने जा रहा है।’ जब हेमला ने अपनी प्रशंसा सुनी तो उसका उत्साह चरम सीमा पर पहुंच गया। वह श्मशान घाट पहुंचने तक जोर-जोर से हर-हर की रट लगाता आया। श्मशान ताल से कुछ दूरी पर था, जहां कुछ ही दूरी पर पीलू का एक घना पेड़ था, उसी के पास चिता सजाई गई। एक बार फिर अंतिम बार बड़े बुजुर्गों ने हेमला को समझाना चाहा किन्तु सब व्यर्थ गया, वह न माना और सूर्य की ओर हाथ जोड़कर उछलकर हर-हर कहता हुए चिता में जा बैठा। संध्याकाल का समय था। सूर्य छिपने वाला था। हेमला तब तक 'हर हर’ की रट लगाता रहा जब तक उसके शरीर को लकड़ियों से पूरी तरह ढ़क न लिया गया। पूरी लकड़ी लगाने के बाद हेमला की आज्ञा लेकर जब चिता पर आग लगाई गई तब काले धुंए के साथ कुछ ही क्षण बाद उससे धू-धू कर भयंकर लपटें निकलने लगी। तेज लपट लगने से हेमला का जब तन झुलसने लगा तो उसका ज्ञान-विराग और पत्नी राग जाता रहा। असहनीय पीड़ा ने उसे भगने पर मजबूर कर दिया। अकुलाकर वह झट से चिता से बाहर उस ओर कूदा जहांँ अंधकार के कारण किसी की नजर उस पर नहीं पड़ी। वह पीलू के पेड़ की आड़ में छिप गया।        
          आग की लपटों में जले-भुने हेमला के अंगों में भयंकर पीड़ा हो रही थी। वह व्याकुल, व्यथित, विहाल, रात भर सिसकता रहा। बड़े सवेरे उठकर घिसटता जब उसने गूलर खाकर पानी पिया तो उसे कुछ राहत मिली। गांववालों के जागने से पहले वह यह सब काम करके वापस पीलू के पेड़ की आड़ में छिप गया। वह सोचता रहा कि इतने कष्ट सहते हुए वह कब तक यहां छिपा पड़ा रहेगा। एक पल को उसने सोच विचार कर गांव जाकर अपना सच्चा हाल सुनाने का मन बनाया लेकिन दूसरे पल ही सोचने लगा कि वह किस मुंह बेशरम बनकर गांव लौटेगा, लाखों लानतें देंगे लोग। उससे यह बात हरगिज नहीं होगी। वह जीते-जी गांव नहीं जा सकता। इससे अच्छा तो वह जंगम-जोगी बनकर परदेश चला जाय। अगर वह गांव जायेगा तो शरम के मारे मर जायेगा। ऐसी बात मन में सोचकर हेमला उदास होने लगा और मरघट वासी बन गया। उसी जगह वह कभी बीन-बीन कर गूलर खाता कभी छिप-छिपाते बकरियां पकड़ उनका दूध लगाकर पी जाता। यूं ही छिपते-छिपते बारह दिन हो गये। उसके जलने के घाव भी अच्छे हो गये। तेरहवीं के दिन उसे याद आई कि आज तो उसके घर में खूब मालपुए, पूड़ी-साग बना होगा, लेकिन क्या करें अब कोई उसके लिए पीलू के पेड़ के नीचे तो पत्तल परोस के नहीं लाने वाला है, इसलिए वह मन मसोसकर रह गया।
            हर तेरहवीं की तरह ही इस बार भी खेतासर में बड़े गांव से नाई अपनी पत्नी सहित आया, किन्तु शाम तक काम पूरा न होने से उन्हें देर हो गई। मालपुओं की गठरी बांधे वे दोनों पहर रात आपस में बतियाते हुए मरघट से निकले। अचानक नाई को दिल्लगी सूझी वह नाइन से बोला- ’सुनो प्यारी! जाट हेमला यहीं सत्ता हुआ था।’ नाइन बोली- ’उसका प्रेम अलौकिक था।’ यह सुनकर नाई हंसकर बोला- ’नहीं रे, व्यर्थ ही मूढ़ मति हेमला ने आत्महत्या की, अब तो वह विकट भूत बनकर यहीं-कहीं भटक रहा होगा।’ इतना सुनते ही नाइन बिगड़कर बोली- ’ऐसी बात न करो जी, भला क्यों ठिठोली कर रहे हो, मुझे डर लगता है।’ पेड़ की आड़ से हेमला चुपचाप नाई-नाइन का कथन सुन रहा था। उसने सोचा- ’क्यों न इनका संशय सच में दूर कर दूं। विकट भूत का रूप धारण कर जीते-जी संसार के बीच मरकर देखूं।’ झट से हेमला पहले पेड़ में चढ़ा और उसे जोर-जोर से हिलाते हुए बम से नीचे कूदा तो यह देख नाई-नाइन थर-थर कांपने लगे। काले-काले बिखरे बाल, नंग-धड़ंग वह लमटंगा जैसे ही ’दुड़ू-दुडू़’ कर उनके सामने आया तो नाई-नाइन उल्टे पैर भागे, लेकिन नाइन गिरकर चिल्लाई तो फिर न उठ सकी, उसकी सांसे वहीं थम कर रह गई। मालपुए की टोकरी लेकर हेमला वापस आ गया और यह सोचकर हंसने लगा कि विकट भूत का वेश भला है और बोला- 'चलो आज का श्रीगणेश हो गया है।' बद्हवास नाई गांव वापस आकर चिल्लाया- ’अरे! हेमला भूत हाय! उसने नाइन को खा लिया। यह कहते-कहते बेहोश हो गया। उपचार करने पर जब उसकी चेतना वापस आई तो वह हेमला के बच्चों को रोते-रोते यों हाल सुनाने लगा-
"था पूरा पच्चीस हाथ, काला काला-सा,
बड़े बड़े थे दांत, हाथ में था भाला सा।।
’दुडू-दुडू़’ कह, कूद सामने आ ललकारा;
बोली से पहचान लिया, था बाप तुम्हारा।
मारी पटक, पछाड़ हाय रे! नाइन मारी,
भाग बचा मैं, भाग न पाई वह बेचारी।
अरे चलो झट, हाय! मार ही डाली होगी;
पड़ी धूल में देह प्राण से खाली होगी।"
इस प्रकार विकल, विलपता नाई मन ही मन और भी दुःखी हुआ कि उसकी दिल्लगी उसे भारी पड़ गई। यों रात को हल्ला-गुल्ला सुन पूरे गांव के लोग हेमला के घर इकट्ठा हुए और वहीं सबने रात बितायी। सुबह-सुबह मौके पर पहुंचे तो नाइन को मृत देख सभी डरे, चौंके और चकराये। उन्हें पूर्ण विश्वास हो चला कि यह काम हेमला भूत का ही है। जल्दी से लोगों ने नाइन की वहीं चिता बनाई और नाई को ढ़ांढ़स देकर क्रियाकर्म की विधि पूरी करवाई। यों ही श्मशान में बहुत देर तक लोग बातें करते रहे, लेकिन मालपुओं की किसी को याद नहीं आई।
            दिन चढ़ते ही पूरे गांव में हेमला की चर्चा जोर-शोर से होने लगी। कोई कहता हेमला का अत्याचारी भूत प्रकट हुआ है, जिसने राह चलते रात को नाइन को मार दिया है। कोई कहता रात-विरात भूलकर भी उस राह नहीं जाना। हेमला बहुत बड़ा भूत है। कब किसको खा जाय कोई नहीं जानता। इन सब बातों से बेखबर हेमला मरघट में छिपा रहा। मालपुए खाकर उसका मन तृप्त हुआ तो उसे आत्मग्लानि हुई,सोचने लगा- ’हाय हेमला! यह तूने क्या किया एक निरपराधिनी को मार दिया, उसने तेरा क्या बिगाड़ा था। बहुत बुरा है हमेशा भूत-भड़ंग बनकर मरघट में छिपे रहना। कब तक यूं दुःख सहता रहूंगा।’ यह सोचते-सोचते जैसे ही हेमला पेड़ की आड़ से बाहर आया तो उसने कुछ दूरी पर मुखिया को अकेला खड़ा देखा तो मारे खुशी के उछल पड़ा। वह विचारने लगा कि अगर मुखिया के पास जाकर अपना हाल सुनाऊँ तो इस दुःखिया का बेड़ा पार हो जाय। फिर सोचता कहीं अगर वह मुझे देख डरकर भागने लगे तो जाकर एकदम से उनके पैर पकड़ लूंगा।’ यही सोच उसने दबे पांव, चुपचाप पीठ-पीछे से जाकर अचानक मुखिया के पैर पकड़ लिए। मुखिया 'कौन' कहकर चिल्लाया तो 'हेमला' का नाम सुना तो चिल्लाया- ’अरे दौड़ियो, हाय! मुझे सत्ता ने खाया।’ कहते हुए गिर पड़ा, जिसे देख हेमला बहुत घबराया। खेतों में कुछ दूरी पर लोग काम रहे थे, मुखिया के शब्द सुनकर लोगों ने उस ओर देखा तो उन्हें हेमला के बड़े-बड़े बाल, नंग-धड़ंग शरीर दिखाई दिया। दिन-दोपहरी में भूत देखकर लोग घबराकर अनहोनी की बात से भयाकुल होकर चिल्लाने लगे- ‘अरे, हेमला भूत खड़ा है ताल-किनारे; देखो, उसने पटक हाय! मुखिया जी मारे’ मुखिया को बेहोश देख मरघटिया हेमला भागा और अभागा पीलू के पेड़ की आड़ में छिपते हुए सोचने लगा- अरे, चला था अच्छा करने, किन्तु बुरा हो गया। अब क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आता क्यों विधाता मुझसे खपा हो गये हैं। जाने क्या लिखा है मेरे कपाल में, भूतपने से मुक्ति दीखते नजर नहीं आ रही है। उधर गांव के लोग मुखिया को उठा लाये। उन्हें बेदम बुखार चढ़ा, दस्त लग गये। वे बेहोशी में चौंककर चीख पुकार मचाते- ’वह आया-अरे दौड़ियो, हाय! मुझे सत्ता ने खाया।’ रात भर यों ही मुखिया बेचारा पड़े रहे और सवेरे लोक छोड़ परलोक सिधार गए। जब मुखिया की चिता तैयार हुई तो सत्ता ने सोचा दो हो गए। जब से मुखिया मरा, हेमला की धाक जम गई। लोग रात क्या दिन में उस जीवित जमदूत, भूतों के ताऊ के इलाके में जाने से डरने लगे। मुखिया की तेरहवीं पर मालपुए और पूड़ी-साग की बात सोचकर उसके मुंह में पानी आया तो उसका मन विकल हो उठा। तन-मन में संग्राम मचा। जाय तो किधर जायें। तन पर मन की जीत हुई तो बुद्धि चलाई और इधर-उधर से जोड़कर लकड़ियां लेकर आग जलाई। वहीं चिता की आग के लिए लाई हुई काली-काली हांडिया दिखी तो उन्हीं में आग भरकर खुरापात करने गांव की ओर निकल पड़ा। गांव के नजदीक आते ही उसने एक हांडी से आग उछाली और भयंकर आवाज के साथ उसे जोर से पत्थर पर दे पटका तो ऐसा दृश्य देखकर गांव वाले भोजन की पत्तल छोड़कर भूत-भूत कर भागने लगे। उसने एक-एक कर भयंकर आवाज के साथ आग और हांडी से तमाशा किया, जिसे देख लोगों में भगदड़ मची तो मौका पाकर वह उछलता-कूदता उनके बीच गया और वहां पहुंचकर उसने कुछ को उछल-उछल कर दो-चार लाते जमाई और मालपुओं की डलिया लेकर भाग खड़ा हुआ। डरे-सहमे गांव वालों ने मिलकर जैसे-तैसे रात काटी और सवेरा होने पर गांव छोड़ने की ठान ली। अब वे बड़ा गांव रहेंगे। हद हो चुकी, कब तक त्रास सहेंगे। पापी हाथ धोकर पीछे पड़ गया है। भूत है कि यमदूत। कहीं नहीं सुना ऐसा। इसके मारे कोई काम नहीं कर पायेंगे, नाइन और मुखिया की तरह एक दिन सबको खा जायेगा। खेत भले ही बड़े हैं किन्तु प्राणों से प्यारे नहीं हैं। हमारी जमीन, धन, धान्य सभी बाद में हैं। सभी एकमत हुए कि गांव छोड़ने के सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है। अपना-अपना सामान बैलगाड़ियों में लादकर सारे गांव वाले खेतासर खाली करके चल दिए। दुःखी मन राह सोचते कि इस पिचाश ने तो मां से मोह तोड़ा है और जन्मभूमि का वास छुडा दिया है।           
         इस प्रकार रोते-कलपते खेतासर गांव के वासी उदास होकर गांव छोड़कर उसे सूना छोड़ गए। इस घटना का शोर जब हेमला के कानों तक पहुंचा तो वह खेतासर गांव के घर-घर में घुसकर घूमने-फिरने लगा। देख-दाख कर फिर पीलू के पेड़ की आड़ में छिप जाता। वह अपना पूर्ण प्रताप देख फूला न समाता। अब उसे उजड़े गांव से नहीं मरघट से लगाव हो गया। उस पर भूतपने का रंग बहुत चढ़ चुका था, इसलिए उसका लौटना कठिन हो चुका था। वह कभी मरघट से चहल-कदमी करते हुए गांव निकल पड़ता, जहां सुनसान घरों में उसे कुछ न कुछ खाने को मिल जाता। खेतों से भी पेट भरने के लिए कुछ न कुछ मिल जाता। यों दुःख को सुख जान हेमला जाट सुखी था, किन्तु पूर्व स्मृति के कारण उसका हृदय दुःखी था। खेतासर गांव वाले बड़े गांव जाकर बस गए। बेचारे प्रेत सत्ता के मारे करते भी क्या? बड़े गांव में एक दिन घोड़े पर चढ़कर शाही हुक्म लेकर एक रौबदार सिपाही आया। बना-ठना था ऊपरी पैसा खाकर। नाई पर उसकी नजर पड़ी तो बोला- ’चल बे! इधर आ, पहले मेरे घोड़े का पानी पिला, फिर मेरी हजामत बना और मुझको नहला भी दे। जल्दी कर हुक्म की तामील।’ नाई को उसकी अकड़ बुरी लगी, उसने उसे टरकाना चाहा, बोला- ’पानी का यहां बड़ा संकट है सरकार, लेकिन यहां से थोड़ी दूर एक लबालब ताल है, वहीं कृपा कर आप कष्ट करें तो खूब नहा लें आप और घोड़ा भी।’ नाई की बात सुन सिपाही बहुत खुश हुआ बोला- ’क्या खूब गहरी मनचाही छाया भी है वहां? नाई के हाँ कहने पर वह बोला अच्छा तो वहीं ले चल। वहाँ चलने की बात सुनकर नाई घबराकर मन में सोचने लगा- अरे मेरी चतुराई तो चौपट हो गई। मैंने तो अपनी बचत सोच आफत टाली थी। खेतासर की बला सिपाही पर डाली थी। वह यह न समझा था कि साथ में जाना होगा और मुझे वहां इसे नहलाना होगा। नाई को चुप देख सिपाही ने भौंह चढ़ाई- ’क्यों बे! चुप हो गया, क्या तेरी नानी मर गई।’ नाई चौंका, सोचने लगा लगता है अब तो नाइन के बाद उसी की बारी है। इसलिए वह विनती कर गिड़गिड़ाने लगा-’ महाराज! जब से नाइन और मुखिया मरे है और खेतासर उजड़ा है, तब से ताल पर मनुष्यों का नहीं केवल भूतराजा हेमला का राज है।’ उसकी बात सुनकर सिपाही बिगड़ते हुए बोला- ’अबे! उल्लू के पट्ठे, बदमाश, क्या मैं ही मिला तुझे ठट्ठा करने के लिए? सुन बे! हम कचहरी के पक्के जिन्दा भूत हैं, जिस पर लग जाते हैं उसके छक्के छुड़ा देते हैं। चल, आज दिखाई तो दें वह भूत, देखता हूँ उसे भी।’ सिपाही ने नाई को बहुत समझाया कि भूतवूत कुछ नहीं होता, वह उसे वहां ले चले, लेकिन वह तैयार नहीं हुआ तो सिपाही ने जैसे ही चार तमाचे उसके आंखों के नीचे जड़े तो उनसे चिन्गारियां क्या निकली कि वह झट से मान गया। ’चलता है या नहीं कि खाएगा अब कोड़े?’ दोनों हाथ जोड़कर ’चलता हूँ सरकार’ कहते हुए सिर पर घास रखकर, घोड़े के आगे-आगे नाई गुमसुम चल दिया। देखने वाले भाग खड़े हुए। खेतासर का ताल सिपाही के मन भाया, उसमें स्वच्छ जल भरा हुआ था, पेड़-पौधों की घनी छाया देख वह खुश हुआ, लेकिन नाई का हृदय धुकुड़-पुकुड़ कर रहा था। घोड़े को खूंटे से बांध उसे घास डालकर नाई चौकन्ना होकर सिपाही की खोपड़ी घोंटने बैठ गया। वह कभी इधर कभी उधर देखता जा रहा था। अभी सिपाही की आधी खोपड़ी घुट पाई थी कि नाई को दूर से हेमला आता दिखाई दिया तो उसकी अकुलाहट बढ़ गई, वह थर-थर कांपने लगा। उसकी थर-थर्राहट से सिपाही चिल्लाया- ’क्यों बे क्या हुआ? क्या बिच्छू ने काट खाया तेरे को।’ इतना सुनते ही ‘जाता हूँ, ले देख, वह तेरा बाप आया‘ कहकर नाई नौ दो ग्यारह हो गया। झुंझलाते हुए सिपाही उठा और इधर-उधर देखने लगा। उसने देखा सचमुच भूत उसी की ओर आ रहा है। उसका दिल दहल गया, सोचने लगा- यह कौन बला है? उसने देखा कि उसके सिवा दूर-दूर तक कोई नहीं है। सब ओर सूना है तो उसका मन बहुत घबराया। इससे पहले कि वह कुछ सोच पाता जैसे ही दुडू-दुडू का भयानक शब्द उसे सुनाई दिया उसकी देह थर-थर थराई, वह फुर्ती से घोड़े की खूंटी खोले बिना ही उस पर एड़ लगाकर सड़ा-सड़ कोड़े बरसाने लगा। घोड़ा हिनहिनाते हुए खूंटी उखाड़कर भाग खड़ा हुआ। जैसे ही घोड़े की चाल बढ़ी तड़ा तड़ पीछे से खूंटी सिपाही के सिर पड़ने लगी। भूत का डर उसकी खोपड़ी में बैठ गया। वह समझा कि मुझे और कोई नहीं भूत मार रहा है। पीछे तरफ घुटी-घुटाई साफ खोपड़ी में ज्यों-ज्यों मार पड़ी वह बड़बड़ाने लगा- ’अब मत मार, धरम की कसम है तुझे। तौबा-तौबा, अरे माफ कर, मुझे, न मार, मैं तेरी पूजा कराऊंगा, कभी ताल पर नहीं आऊंगा, सत्ते! तुझको पूजने के बाद ही शहर वापस जाऊंगा।’ इधर हेमला तालियाँ बजाकर खूब हंसा उधर सिपाही गांव के पास बेहाल होकर गिरा। घोड़ा पास ही घुप्पू बन खड़ा हुआ था। समाचार सुनकर बड़े गांव का मुखिया आया। सिपाही को बेहोश देख बहुतेरे उपाय किए लेकिन उसने मुंह नहीं खोला, पहर रात सिपाही चल बसा। यह देखकर नाई ने खूब नमक-मिर्च लगाकर बढ़ा-चढ़ाकर किस्सा सुनाया। 

निरंतर .........                                                                  (मुंशी अजमेरी ’प्रेम’ कृत हेमलासत्ता से अनूदित)

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June 5, 2017 at 11:58 AM

bhut hi acchi or morajak kahani likhi h aap ne muje bhi khaniyo ka bda sokh ha isliye mene apne blog ka naam kahani ki kitab rakkha h aap ka humhare blog par sardar aamantrn

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June 5, 2017 at 12:49 PM

वाह...
बेहतरीन कथा
सत्ता का भूत...
आनन्दित हुई
सादर..

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June 5, 2017 at 1:13 PM

भूतों का डर हमारे भारत के लोगों को ही नहीं बल्कि सारे संसार में भूतों से लोग डरते हैं जो वास्तव में उनका अंदर का डर होता है। डर से एक इंसान के बाद दूसरों को भी भूत कैसे दिखने लगता है यह बात हेमलासत्ता की कथा में बड़े रोचक ढंग से प्रस्तुत है। भूतों से डरने वालों को यह कहानी जरूर पढ़नी चाहिए। अगले अंक का इंतज़ार रहेगा

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June 5, 2017 at 3:49 PM

दिनांक 06/06/2017 को...
आप की रचना का लिंक होगा...
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी इस चर्चा में सादर आमंत्रित हैं...
आप की प्रतीक्षा रहेगी...

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June 5, 2017 at 4:04 PM

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (06-06-2017) को
रविकर शिक्षा में नकल, देगा मिटा वजूद-चर्चामंच 2541
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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June 5, 2017 at 4:05 PM

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (06-06-2017) को
रविकर शिक्षा में नकल, देगा मिटा वजूद-चर्चामंच 2541
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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June 5, 2017 at 5:43 PM

बहुत ही रोचक...
अंधविश्वास भूतप्रेत का सच सामने रखती लाजवाब प्रस्तुति......

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June 6, 2017 at 5:41 AM

वाह्ह्ह....रोचक रचना।

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June 6, 2017 at 8:30 AM

waah bahut sundar anand aa gaya rochak katha hai

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June 6, 2017 at 11:29 AM

इंसान को अच्छे से पता है कि भूत प्रेत का कोई अस्तित्व नही होता। लेकिन सुनी सुनाई बातो पर विश्वास कर वो डरने लगता है। यही डर ऐसी घटनाओं को प्रोत्साहन देता है।

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June 6, 2017 at 7:34 PM

इंसान को सोचने समझने की शक्ति है इसलिए या तो वो दर से बाहर म=निकल जाता है या अंधविश्वासों के फेर में आ जाता है और डर जाता है ... रोचक तरीके से अंध विश्वास को रखा है ...

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June 20, 2017 at 11:00 AM

अंधविश्वास को बहुत रोचक तरीके से प्रस्तुत किया है
बहुत बढ़िया

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