अंधेरा काटकर सूरज दिखाती कविता रावत की कविताएं : रवीन्द्र प्रभात

           कहा गया है, कि साधना जब सरस्वती की अग्निवीणा पर सुर साधती है तो साहित्य की अमृतधारा प्रवाहित होती है, जिससे हित की भावनाएं हिलकोरें मारने लगती है । इन हिलकोरों में जब सृजन की अग्नि की धाह आंच मारती है तो वह कलुषित परिवेश की कालिमा जलाकर उसके बदले एक खुशहाली से भरे विहान को जन्म देती है। सही मायनों में इसी को कविता कहते हैं। मुझे खुशी है कि कविता रावत की लघु काव्य कृति 'लोक उक्ति में कविता' में ये सारे भाव मैंने महसूस किए हैं।
         कविता रावत अपनी कविताओं में कहीं आग बोती नज़र आती है तो कहीं आग काटती। ऐसी आग जो आँखों के जाले काटकर पुतलियों को नई दिशा देती है, अंधेरा काटकर सूरज दिखाती है, हिमालय गलाकर वह गंगा प्रवाहित करती है जिससे सबका कल्याण हो। कविता रावत की कविता रुलाती नहीं हँसाती है, सुलाती नहीं जगाती है, मारती नहीं जिलाती है। सचमुच कविता की कविता शाश्वत एवं चिरंतन है।
          कविता रावत की कुछ कवितायें मन-मस्तिष्क को आंदोलित करती है, जैसे संगति का प्रभाव,  दुर्जनता का भाव,  वह राष्ट्रगान क्या समझेगा,  भाग्य कुछ भी दान नहीं; उधार देता है,  अभिमान ऐसा फूल है जो शैतान की बगिया में उगता है, बुरी आदत,  गरीब,कमजोर पर हर किसी का जोर चलने लगता है,  हाय पैसा! हाय पैसा.... आदि।
कविता रावत की कविताओं में शब्द-शब्द से दर्शन टपकता नज़र आता है। शायद उन्हें इस बात का भान होगा कि कविता में जीवन दर्शन नहीं हो तो वह निष्प्राण है। कुछ कवितायें तो पत्थरों में भी प्राण-प्रतिष्ठा करती नज़र आती है, जो इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है। संग्रह की कुछ कवितायें जीवन के प्रति एक गहरी आसक्ति, ललक अर्थात रागधर्मी जीवनोंमुखता व रोमांटिक नवीनता का आभास कराती है । 
          यह संग्रह वास्तव में प्राणवान कविताओं की पुष्पांजलि है जिसे कविता रावत ने पूरे मनोयोग से सजाकर माँ सरस्वती की अग्निवीणा को समर्पित करने का प्रयास किया है। यह संग्रह पठनीय ही नहीं सहेजकर रखने योग्य भी है।
         अपने अभिप्रेत भाव को तद्भव रूप में संप्रेषित करने की दक्षता के साथ ब्लॉग पर शब्दों,लोकोक्तियों व मुहावरों की सामर्थ्य एवं सीमा का सूक्ष्म संधान करने वाली कविता रावत की लघु काव्य कृति 'लोक उक्ति में कविता'  के प्रकाशन पर मेरी अनंत आत्मिक शुभकामनायें।
रवीन्द्र प्रभात
प्रधान संपादक: परिकल्पना समय(मासिक)


1.   संगति का प्रभाव                                                           
2.   दुर्जनता का भाव       
3.   तिहरे धागे को तोड़ना आसान नहीं है                                 
4.   वह राष्ट्रगान क्या समझेगा          
5.   समय                                                                         
6.   भाग्य कुछ भी दान नहीं; उधार देता है
11. उसी के हँसी सबको भली लगे जो अंत में हँसता है            
12. हाय पैसा ! हाय पैसा !  
13. दुष्ट प्रवृत्ति वालों को उजाले से नफरत होती है               
14. दिल को दिल से राह होती है
15. मित्र और मित्रता                                                       
16. दूर-पास का लगाव-अलगाव
17. आराम-आराम से चलने वाला सही सलामत घर पहुँचता है  
18. दरिया जिधर बह निकले वही उसका रास्ता होता है
19. बीते हुए दुःख की दवा सुनकर मन को क्लेश होता है         
20. अपने-पराये का भेद
21. भाग्य हमेशा साहसी इंसान का साथ देता है                     
22. अति से सब जगह बचना चाहिए
23. हरेक वृक्ष नहीं फलवाला वृक्ष ही झुकता है                       
24. अच्छाई और सद्‌गुण इंसान की असली दौलत होती है
25. ईर्ष्या और लालसा कभी शांत नहीं होती है                       
26. उद्यम से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है
27. भोजन मीठा नहीं भूख मीठी होती है                               
28. विवशता में फायदे का सौदा नहीं किया जा सकता है
29. हर मनुष्य की अपनी-अपनी जगह होती है                       
30. दाढ़ी बढ़ा लेने पर सभी साधु नहीं बन जाते हैं
31. सच और झूठ का सम्बन्ध                                           
32. समझदार धन-दौलत से पहले जबान पर पहरा लगाते हैं
33. दो घरों का मेहमान भूखा मरता है


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November 1, 2017 at 9:24 AM

बहुत सुन्दर । बधाई ।

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November 1, 2017 at 5:30 PM

नमस्ते, आपकी यह प्रस्तुति "पाँच लिंकों का आनंद" ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में गुरूवार 02-11-2017 को प्रातः 4:00 बजे प्रकाशनार्थ 839 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।
चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर। सधन्यवाद।

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November 1, 2017 at 8:50 PM

बहुत सुंदर बहुत बहुत बधाई आपको मेरी कविता जी।

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November 1, 2017 at 8:54 PM

आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा 02-11-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2776 में की जाएगी |
धन्यवाद

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November 2, 2017 at 8:51 AM

बढ़िया, बधाई !

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November 2, 2017 at 4:47 PM

एक के मुकाबले दो लोग सेना के समान है। 
तिहरे धागे को तोड़ना आसान नहीं है। । 

हंस-हंस के साथ और बाज को बाज के साथ देखा जाता है 
अकेला आदमी या तो दरिंदा या फिर फ़रिश्ता होता है 

बहुत अद्भुत। रचनायें नहीं ये कमाल हैं। और सारे कमाल बेमिसाल हैं। दुनियादारी की सीख देती नसीहतों का पिटारा।

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November 5, 2017 at 4:22 PM

बधाई स्वीकार कीजिये।

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November 6, 2017 at 9:40 AM

आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है https://rakeshkirachanay.blogspot.in/2017/11/42.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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November 6, 2017 at 12:36 PM

बहुत बहुत बधाई ... लोक भाषा में बात कहना और चुटीले संवाद करना आपकी विशेषता है ...
बहुत बहुत बधाई इस प्रकाशन पर ...

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