एक हमारा प्यारा तोता

एक हमारा प्यारा तोता
'ओरियो ' है वह कहलाता
बोली हमारी वह सीखता
फिर उसको है दोहराता

चोंच उसकी है लाल-लाल
ठुमक-ठुमक है उसकी चाल
घर-भर वह पूरे घूमता रहता
मिट्ठू-मिट्ठू   कहता  फिरता

सुबह पिंजरे से बाहर निकलता
ऊँगली छोड़ सीधे कंधे बैठता
टुकुर-टुकुर फिर मुँह देखता
बड़ा प्यारा-प्यारा वह लगता

दाने, बीज, आम, अमरूद खाता
लाल-हरी मिर्च उसे खूब है भाता
फलियाँ वह अपने पंजे से पकड़ता
चोंच से काटकर बड़े मजे से खाता

जो कोई भी उसको है देखता
वह उससे बहुत प्यार जताता
जैसे ही कोई अपना हाथ बढ़ाता
झट वह उसके कंधे चढ़ जाता
....कविता रावत

हमारे स्कूल के समय तो हमें प्रोजेक्ट बनाने को मिलते नहीं थे, लेकिन आजकल स्कूल से बच्चों को प्रोजेक्ट बनाने को मिलता है तो मां-बाप को भी उसके लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। ऐसे ही बच्चों को स्कूल से प्रोजेक्ट के लिए एक ’पक्षी अथवा जानवर’ में कविता लिखने थी, तो बच्चों के साथ थोड़ी कोशिश करने के बाद अपने पालतू तोते ’ओरियो’ को देखकर यह कविता बन पड़ी। बहुत प्यारा है हमारा 'ओरियो' उसके बारे में फिर कभी लिखूँगी।






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January 5, 2018 at 12:02 PM

वाह्ह्ह...कविता दी,बहुत सुंदर बाल-गीत👌👌

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January 5, 2018 at 12:58 PM

आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद ब्लॉग पर 'शनिवार' ०६ जनवरी २०१८ को लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

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January 5, 2018 at 1:52 PM

पालतू पशु पक्षी तो परिवार के सदस्य जैसे ही हो जाते हैं, बड़ा प्यारा है ओरियो....

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January 5, 2018 at 4:45 PM

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (06-01-2018) को "*नया साल जबसे आया है।*" (चर्चा अंक-2840) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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January 5, 2018 at 4:49 PM

बहुत सुंदर रचना...कविता जी!

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January 6, 2018 at 3:44 AM

वाह ... बहुत ही सुंदर बाल रचना ... ओरियी जम रहा है ..
और रचना बाल मन अनुसार ही है ...

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January 6, 2018 at 9:44 AM

बहुत सुंदर

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January 6, 2018 at 5:52 PM

बच्चों पर लोग लिखते ही नहीं हैं। आप ज्यादा से ज्यादा बच्चों पर लिखें। ...स्वागत है आपका।

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January 8, 2018 at 9:20 AM

आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है https://rakeshkirachanay.blogspot.in/2018/01/51.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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January 8, 2018 at 5:58 PM

आपको सूचित करते हुए बड़े हर्ष का अनुभव हो रहा है कि ''लोकतंत्र'' संवाद ब्लॉग 'मंगलवार' ९ जनवरी २०१८ को ब्लॉग जगत के श्रेष्ठ लेखकों की पुरानी रचनाओं के लिंकों का संकलन प्रस्तुत करने जा रहा है। इसका उद्देश्य पूर्णतः निस्वार्थ व नये रचनाकारों का परिचय पुराने रचनाकारों से करवाना ताकि भावी रचनाकारों का मार्गदर्शन हो सके। इस उद्देश्य में आपके सफल योगदान की कामना करता हूँ। इस प्रकार के आयोजन की यह प्रथम कड़ी है ,यह प्रयास आगे भी जारी रहेगा। आप सभी सादर आमंत्रित हैं ! "लोकतंत्र" ब्लॉग आपका हार्दिक स्वागत करता है। आभार "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

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January 8, 2018 at 11:46 PM

बहुत सुन्दर रचना...ओरियो जैसी ही...
वाह!!!

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PS
January 9, 2018 at 12:42 PM

प्यारा-प्यारा ओरियो

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January 14, 2018 at 9:52 PM

निमंत्रण पत्र :
मंज़िलें और भी हैं ,
आवश्यकता है केवल कारवां बनाने की। मेरा मक़सद है आपको हिंदी ब्लॉग जगत के उन रचनाकारों से परिचित करवाना जिनसे आप सभी अपरिचित अथवा उनकी रचनाओं तक आप सभी की पहुँच नहीं।
ये मेरा प्रयास निरंतर ज़ारी रहेगा ! इसी पावन उद्देश्य के साथ लोकतंत्र संवाद मंच आप सभी गणमान्य पाठकों व रचनाकारों का हृदय से स्वागत करता है नये -पुराने रचनाकारों का संगम 'विशेषांक' में सोमवार १५ जनवरी २०१८ को आप सभी सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद !"एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

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January 16, 2018 at 12:04 AM

शानदार प्रस्तुति.

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January 16, 2018 at 12:04 AM

शानदार प्रस्तुति.

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January 18, 2018 at 12:17 PM

आपने बहुत ही सुंदर रचना की, बिलकुल ओरियो की तरह ही बहुत प्यारा..कविता जी!

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January 20, 2018 at 6:46 PM

तेरा बाबा
बूढे बाबा का जब चश्मा टूटा
बोला बेटा कुछ धुंधला धुंधला है
तूं मेरा चश्मां बनवा दे,
मोबाइल में मशगूल
गर्दन मोड़े बिना में बोला
ठीक है बाबा कल बनवा दुंगा,
बेटा आज ही बनवा दे
देख सकूं हसीं दुनियां
ना रहूं कल तक शायद जिंदा,
जिद ना करो बाबा
आज थोड़ा काम है
वेसे भी बूढी आंखों से एक दिन में
अब क्या देख लोगे दुनिया,
आंखों में दो मोती चमके
लहजे में शहद मिला के
बाबा बोले बेठो बेटा
छोड़ो यह चश्मा वस्मा
बचपन का इक किस्सा सुनलो
उस दिन तेरी साईकल टूटी थी
शायद तेरी स्कूल की छुट्टी थी
तूं चीखा था चिल्लाया था
घर में तूफान मचाया था
में थका हारा काम से आया था
तूं तुतला कर बोला था
बाबा मेरी गाड़ी टूट गई
अभी दूसरी ला दो
या फिर इसको ही चला दो
मेने कहा था बेटा कल ला दुंगा
तेरी आंखों में आंसू थे
तूने जिद पकड़ ली थी
तेरी जिद के आगे में हार गया था
उसी वक्त में बाजार गया था
उस दिन जो कुछ कमाया था
उसी से तेरी साईकल ले आया था
तेरा बाबा था ना
तेरी आंखों में आंसू केसे सहता
उछल कूद को देखकर
में अपनी थकान भूल गया था
तूं जितना खुश था उस दिन
में भी उतना खुश था
आखिर "तेरा बाबा था ना"

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