ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Thursday, September 20, 2018

क्यों परीक्षा पड़ती सब पर भारी!


आज आया है शिवा का जन्मदिन
पर नहीं है कोई मनाने की तैयारी
मेज पर केक बदले पसरी किताबें
क्यों परीक्षा पड़ती सब पर भारी!

अनमना बैठा है उसका मिट्ठू
टीवी-मोबाईल से छूटी है यारी
गुमसुम है घर का कोना-कोना
क्यों परीक्षा पड़ती सब पर भारी!

घर में लगा हुआ है अघोषित कर्फ्यू
बस दिन-रात पढ़ना-रटना है जारी
बेस्वाद लगे किचन की खटपट-चटपट
क्यों परीक्षा पड़ती सब पर भारी!

शांत घर में आता परीक्षा का भूत तो
फिर कहाँ आपस की बातें प्यारी-प्यारी?
सुख-चैन तो उड़ा ले जाता प्रश्न-पत्र
क्यों परीक्षा पड़ती है सब पर भारी!
                         ....कविता रावत 

        हर वर्ष 20 सितम्बर को मेरे बेटे शिवा के जन्मदिन के समय ही उसकी छःमाही परीक्षाएं चल रही होती हैं। अभी वह कक्षा ७वीं में है और समझदार भी हो गया है इसलिए तो वह खुद ही परीक्षा समाप्त होने के बाद एक दिन निश्चित कर जन्मदिन मनाता है।   

  

Thursday, September 13, 2018

सुख-शांति और ज्ञान-बुद्धि के दाता है गणपति जी


हमारी भारतीय संस्कृति में गणेश जी के जन्मोत्सव की कई कथाएं प्रचलित हैं। हिन्दू संस्कृति (कल्याण) के अनुसार भगवान श्रीगणेश के जन्मकथा का इस प्रकार उल्लेख है- “जगदम्बिका लीलामयी है। कैलाश पर अपने अन्तःपुर में वे विराजमान थीं। सेविकाएं उबटन लगा रही थी। शरीर से गिरे उबटन को उन आदि शक्ति ने एकत्र किया और एक मूर्ति बना डाली। उन चेतनामयी का वह शिशु अचेतन तो होता नहीं, उसने माता को प्रणाम किया और आज्ञा मांगी। उसे कहा गया कि बिना आज्ञा कोई द्वार से अंदर न आने पाए। बालक डंडा लेकर द्वारा पर खड़ा हो गया। भगवान शंकर अंतःपुर में आने लगे तो उसने रोक दिया। भगवान भूतनाथ कम विनोदी नहीं हैं, उन्होंने देवताओं को आज्ञा दी- बालक को द्वार से हटा देनी की। इन्द्र, वरूण, कुबेर, यम आदि सब उसके डंडे से आहत होकर भाग खड़े हुए- वह महाशक्ति का पुत्र जो था। इसका इतना औद्धत्य उचित नहीं फलतः भगवान शंकर ने त्रिशूल उठाया और बालक का मस्तक काट दिया।“ पार्वती ने जिस तपस्या से शिशु को प्राप्त किया उसके इस तरह जाने वे बहुत दुःखी हुई। उस समय भगवान विष्णु की सलाह से शिशु हाथी का सिर काटकर जोड़ दिया गया, जिससे वे जी उठे, लेकिन उनका शीश हाथी का होने से वे गणपति ‘गजानन‘ कहलाए। 
         भगवान गणेश के कई अवतारों की प्रचलित कथाओं सभी कथाओं पर यदि गहन विचार किया जाय तो एक बात जो समरूप दृष्टिगोचर होती है, वह यह कि गणेश जी ने समय-समय पर लोक जीवन में उपजी बुराईयों के पर्याय (प्रतीक) 'असुरों' की आसुरी शक्तियों का दमन कर लोक कल्याणार्थ अवतार लेकर सुख-शांति कायम कर यही सन्देश बार-बार दिया कि कोई भी बुराई जब चरम सीमा पर हो, तो उस बुराई का खात्मा करने के परियोजनार्थ जरुर कोई आगे बढ़कर उसे ख़त्म कर लोक में सुख-शांति, समृद्धि कायम करता है।  हर वर्ष लोक में व्याप्त ऐसी ही मोह, मद, लोभ, क्रोध, अहंकारादि असुरी शक्तियों की समाप्ति की मंशा लेकर लिए शायद हम गणेश चतुर्थी के दिन गणेश भगवान की स्थापना कर उनसे ज्ञान-बुद्धि देते रहने और सुख-शांति बनाये रखने के उद्देश्यार्थ उत्साहपूर्वक पूजा-आराधना कर उनके कृपाकांक्षी बनना नहीं भूलते हैं।
       अगले वर्ष फिर से गणपति जी विराजमान हों, इसलिए प्रेम व श्रद्धापूर्वक बोले : "गणपति बप्पा मोरया, पुरछिया वर्षी लौकरिया"।
सभी ब्लॉगर्स और सुधि पाठकों को गणेशोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ!

Saturday, September 1, 2018

भरे पेट भुखमरी के दर्द को कौन समझता है


पहनने वाला ही जानता है जूता कहाँ काटता है
जिसे कांटा चुभे वही उसकी चुभन समझता है

पराये दिल का दर्द अक्सर काठ का लगता है
पर अपने दिल का दर्द पहाड़ सा लगता है

अंगारों को झेलना चिलम खूब जानती है
समझ तब आती है जब सर पर पड़ती है

पराई दावत पर सबकी भूख बढ़ जाती है
अक्सर पड़ोसी मुर्गी ज्यादा अण्डे देती है

अपने कन्धों का बोझ सबको भारी लगता है
सीधा  आदमी  पराए  बोझ  से दबा रहता है

पराई चिन्ता में अपनी नींद कौन उड़ाता है
भरे पेट भुखमरी के दर्द को कौन समझता है

                                       ...कविता रावत