सुबह की सैर और तम्बाकू पसंद लोग

सुबह की सैर और तम्बाकू पसंद लोग

 गर्मियों में बच्चों की स्कूल की छुट्टियाँ  लगते ही सुबह-सुबह की खटरगी कम होती है, तो स्वास्थ्य लाभ के लिए सुबह की सैर करना आनंददायक बन जाता है। यूँ तो गर्मियों की सुबह-सुबह की हवा और उसके कारण आ रही प्यारी-प्यारी नींद के कारण बिस्तर छोड़ने में थोड़ा कष्ट जरूर होता है, लेकिन स्वास्थ्य लाभ के लिए इसका त्याग करना जरूरी हो जाता है। सुबह की सैर से शरीर में नई स्फूर्ति मिल जाती है। सुबह-सुबह पक्षियों का कलरव, मंद-मंद सुगंधित हवा, उगते सूरज को देखना और स्वच्छ आकाश को निहारने से मन को जो सुखद अनुभूति होती है, वह अप्रतिम है।
सुबह की सैर स्वास्थ्य निर्माण का सर्वोत्तम उपाय है। यह सस्ता भी है और मीठा भी, जिसके लिए न तो डाॅक्टरों को फीस देनी पड़ती है और न कड़वी दवाएं खानी पड़ती है। बावजूद इसके जब सुबह-सुबह सड़क किनारे कहीं किसी बुजुर्ग तो कहीं किसी मासूम बच्चे को तम्बाकू-गुटखा बेचते और लोगों को खरीदते हुए देखती हूँ तो मन खराब हो जाता है, जिससे सैर के आनंद को फुर्र होते देर नहीं लगती। सुबह-सुबह सैर को निकले कई लोग जब काका, बाबा, गुरू, विमल, रजनीगंधा, राजविलास, राजश्री जैसे शाही और दिलखुश नामों वाले गुटखों को मुँह में दबाये, स्मार्ट सड़क पर रंगीन पिचकारी मारते हुए देखती हूँ, तब यह बात समझ से परे होती है कि आखिर ये लोग सुबह-सुबह कैसा स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं?         
         आजकल तम्बाकू-गुटखा सबसे छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर तक सबसे फलते-फूलते कारोबार के रूप में स्थापित होता जा रहा है। कई लोग इसका एक जरूरी प्रमुख खाद्य पदार्थ की तरह उपभोग करने लगे हैं, जिससे हरतरफ इसकी मांग जोरों पर है। यह इतना सुलभ है कि आपको दस कदम पैदल चलने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। जगह-जगह छोटे-छोटे स्टाॅलों के अलावा यह पान की दुकान, किराने की दुकान, चाय की दुकान के साथ ही ढाबों, होटलों तक अलसुबह से लेकर देर रात तक बड़ी सुगमता से मिल रहा है। आज तमाम चेतावनी के बावजूद तम्बाकू खाने वालों की कोई कमी नहीं है। हर तीसरा व्यक्ति मुंह में तम्बाकू-गुटखा दबाए बड़ी सहजता से कहीं भी नजर आ जायेगा। आज विकट स्थिति यह बनती जा रही है कि घर-परिवार के सदस्यों से लेकर एक साधारण स्कूल, मेडिकल काॅलेज, इंजीनियरिंग काॅलेज और कोचिंग संस्थानों में पढ़ने वाले कई बच्चे और उनके कतिपय शिक्षक, सरकारी और प्रायवेट दफ्तरों में काम करने वाले बहुसंख्य अधिकारी/कर्मचारी तमाम चेतावनियों को दरकिनार कर तम्बाकू का सेवन बड़े शौक से कर रहे हैं।
          यह गंभीर विचारणीय विषय है कि तम्बाकू का सेवन हमारे देश के नौनिहालों और बुजुर्गों से लेकर युवा वर्ग, जिन्हें राष्ट्र की दूसरी पंक्ति, कल के कर्णधार, देश के नेतृत्व करने वाले और अपनी शक्ति, सामर्थ्य  व  साहस से देश को परम-वैभव तक पहुंचाने का दायित्व स्वीकारने वाला समझा जाता है, की सर्वाधिक पंसद बन गई है, जो हमारे देश सेवा, समाज सेवा और विश्व कल्याण के स्वर्णााक्षरों में लिखे इतिहास को धूल-धूसरित करने के लिए अग्रसर हैं।
  ... कविता रावत


हर दिन माँ के नाम

हर दिन माँ के नाम

वह माँ जो ताउम्र हरपल, हरदिन अपने घर परिवार की बेहतरी के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर अपनों को समाज में एक पहचान  देकर खुद अपनी पहचान घर की चार दीवारी में सिमट कर रख देती है और निरंतर संघर्ष कर उफ तक नहीं करती, ऐसी माँ का एक दिन कैसे हो सकता है! घर-दफ्तर के जिम्मेदारी के बीच दौड़ती-भागती जिंदगी के बीच अपने आप जब भी मैं कभी मायूस पाती हूँ तो मुझे अपनी माँ के संघर्ष के दिन जिसने अभी भी 60 साल गुजर जाने के बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ा है और उन्होंने भी कभी कठिनइयों से मुहं नहीं मोड़ा और न कभी हार मानी, देखकर मुझे संबल ही नहीं बल्कि हर परिस्थितियों से जूझने की प्रेरणा मिलती है। गाँव से 17-18 साल के उम्र में शहर में आकर घर परिवार की जिम्मेदारी संभालना सरल काम कतई नहीं था। पिताजी जरुर सरकारी नौकरी करते थे, लेकिन वे नौकरी तक ही सीमित थे, घर परिवार की जिम्मेदारी से कोसों दूर रहते थे। ऐसे में हम 3 बहनों और 2 भाईयों की पढाई-लिखाई से लेकर सारी देख-रेख माँ ने खुद की। पढ़ी-लिखी न होने की बावजूद उन्हें पता था कि एक शिक्षा ही वह हथियार है, जिस पर मेरे बच्चों का भविष्य बन सकता है और उसी का नतीजा है कि आज हम सब पढ़-लिख कर घर से बाहर और अपनी घर-परिवार और सामाजिक जिम्मेदारियों को बहुत हद तक ठीक ढंग से निभा पा रहे हैं ।
          माँ का संघर्ष आज भी जारी है भोपाल गैस त्रासदी से लेकर 5 शारीरिक ऑपरेशन के त्रासदी से जूझते हुए वह आज भी यूटरस कैंसर से पिछले 7 साल से बहुत ही हिम्मत और दिलेरी से लड़ रही है। पिताजी को गुजरे अभी 4 साल हुए हैं, उन्हें भी लंग्स कैंसर हुआ था, वे सिर्फ 2 माह इस बीमारी को नहीं झेल पाए थे, वहीँ माँ खुद कैंसर से जूझते हुए हमारे लाख मना करने पर भी घर पर नहीं रुकी और हॉस्पिटल में खुद पिताजी की देख-रेख करती रही। पिताजी नहीं रहे, लेकिन उन्होंने सेवा में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी, हर दिन उनके साथ रही। आज जहाँ बहुत से लोग कैंसर का नाम सुनकर ही हाथ पैर छोड़ लेते हैं वहीँ मेरी माँ बड़ी हिम्मत और दिलेरी से खुद इसका डटकर सामना कर अपनी चिंता छोड़ आज भी खुद घर परिवार को संभाले हुए है।
        मेरा सौभाग्य है कि मेरी माँ हमेशा मेरे नजदीक ही रही है और मेरी शादी की बाद भी मैं उनके इतनी नजदीक हूँ कि मैं हर दिन उनके सामने होती हूँ। एक ओर जहाँ उनको देख-देख मुझे हरपल दुःख होता है कि उन्होंने बचपन से ही संघर्ष किया और उन्हें कभी सुख नसीब नहीं हुआ और हम भी उनके इस दुःख को कुछ कम नहीं कर पाए,  वहीँ दूसरी ओर वे आज भी हमें यही सिखा रही हैं कि हर हाल में जिंदगी से हार नहीं मानना।  मैंने माँ के संघर्ष में अपना संघर्ष जब भी जोड़कर देखने की कोशिश की तो यही पाया कि जिस इंसान की जिंदगी में बचपन से ही संघर्ष लिखा हो उसे संघर्ष से कभी नहीं घबराना चाहिए, क्योंकि शायद इसके बिना उसकी जिंदगी अधूरी ही कही जायेगी?
           माँ के साथ घर से बाहर घूमना सबकी तरह मुझे भी बहुत अच्छा लगता है, पर क्या करूँ? हर दिन एक से कहाँ रहते हैं. माँ आज घर से बाहर जाने में असमर्थ हैं।  कुछ वर्ष पूर्व जब उनके साथ भोजपुर जाना हुआ तो वहीँ एक फोटो मोबाइल से खींच ली थी, जिसे अपने ब्लॉग परिवार के साथ शेयर करना का मन हुआ तो सोचा थोडा- बहुत लिखती चलूँ, इसलिए लिखने बैठ गई। बहुत सोचती हूँ लेकिन उनके सबसे करीब जो हूँ, इसलिए  बहुत कुछ लिखने का मन होते हुए भी नहीं लिख पाती हूँ।
          आइए सभी हर माँ के दुःख-दर्द को अपना समझ इसे हरपल साझा करते हुए हर दिन माँ को समर्पित कर नमन करें !
         ..कविता रावत

मजदूर : सबके करीब सबसे दूर

मजदूर : सबके करीब सबसे दूर


मजदूर!
सबके करीब
सबसे दूर
कितने मजबूर!

कभी बन कर
कोल्हू के बैल
घूमते रहे गोल-गोल
ख्वाबों में रही
हरी-भरी घास
बंधी रही आस
होते रहे चूर-चूर
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

कभी सूरज ने
झुलसाया तन-मन
जला डाला निवाला
लू के थपेड़ों में चपेट
भूख-प्यास ने मार डाला
समझ न पाए
क्यों जमाना
इतना क्रूर!
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

कभी कहर बना आसमाँ
बहा ले गया वजूद सारा
डूबते-उतराते निकला दम
पाया नहीं कोई किनारा
निरीह, वेबस आँखों में
उमड़ती रही बाढ़
फिर भी पेट की आग
बुझाने से रहे बहुत दूर
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

कभी कोई बवंडर
उजाड़ कर घरौंदा
पल भर में मिटा गया हस्ती!
तिनका तिनका पैरों तले रौंदा
सोचते ही रह गए
क्यों! हर कोई हम पर ही
करके जोर आजमाइश अपनी
दिखाता है इतना ग़रूर!
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!

 
...कविता रावत

 भक्ति और शक्ति के बेजोड़ संगम हैं हनुमान

भक्ति और शक्ति के बेजोड़ संगम हैं हनुमान

चैत्रेमासि सिते मक्षे हरिदिन्यां मघाभिधे।
नक्षत्रे स समुत्पन्नो हनुमान रिपुसूदनः।।
महाचैत्री पूर्णिमायां समुत्पन्नोऽञ्जनीसुतः।
वदन्ति कल्पभेदेन बुधा इत्यादि केचन।।
अर्थात्-चैत्र शुक्ल एकादशी के दिन  मघा नक्षत्र में भक्त शिरोमणि, भगवान राम के अनन्य स्नेही शत्रुओं का विनाश करने वाले हनुमान जी का जन्म हुआ। कुछ विद्वान कल्पभेद से चैत्र की पूर्णिमा के दिन हनुमान जी का शुभ जन्म होना बताते हैं।
वायुपुराण के अनुसार- “आश्विनस्यासिते पक्षे स्वात्यां भौमे चतुर्दशी। मेषलग्नेऽञ्जनी गर्भात् स्वयं जातो हरः शिवः।।“ अर्थात्- आश्विन शुक्ल पक्ष में स्वाति नक्षत्र, मंगलवार, चतुर्दशी को मेष लग्न में अंजनी के गर्भ से स्वयं भगवान शिव ने जन्म लिया। हनुमान जी को भगवान शिव के ग्यारहवें अवतार ’महान’ के रूप में माना जाता है। इससे पूर्व मन्यु, मनु, महिनस, शिव, ऋतध्वज, उग्ररेता, भव, काल, वामदेव और धृतव्रत दस अवतार बताये गये हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने भी दोहावली में हनुमान जी को साक्षात् शिव होना सिद्ध किया है-
जेहि सरीर रति राम सों, सोइ आदरहिं सुजान।
रुद्र देह तजि नेह बस, संकर भे हनुमान।।
जानि राम सेवा सरस, समुझि करब अनुमान।
पुरुषा ते सेवक भए, हर ते भे हनुमान।।
हनुमान जी के जन्म के बारे में एक कथा आनन्द रामायण में उल्लेखित है, जिसमें हनुमान जी  को राम का सगा भाई बताया गया है। इस कथा के अनुसार ब्रह्म लोक की सुर्वचना नामक अप्सरा ब्रह्मा के शाप से गृध्री हुई थी। राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ में जो हव्य कैकेयी को खाने को दिया था उसे यह गृध्री कैकेई के हाथ से लेकर उड़ गई। यह हव्यांशा ही अंजना की गोद में गृध्री की चोंच से छूटकर गिरा, जिसे खाने से वानरराज कुंजर की पुत्री अर्थात् केसरी की पत्नी अंजनी के गर्भ से हनुमान जी का प्राकट्य हुआ। इस गृध्री की याचना पर ब्रह्मा ने यह कहा था कि दशरथ के हव्य वितरण करते समय जब तू कैकेई के हाथ से हव्य छीनकर उड़ जायेगी तो तू उस हव्य को नहीं खा सकेगी लेकिन उससे तेरी मुक्ति हो जायेगी। ब्रह्मा के वरदान के अनुसार यह गृध्री शाप से मुक्त होकर पुनः अप्सरा बन गई। 
हनुमान जी अपार बलशाली होने के साथ ही वीर साहसी, विद्वान, सेवाभावी, स्वामीभक्त, विनम्रता, कृतज्ञता, नेतृत्व और निर्णय क्षमता के धनी भी थे। हनुमान जी को भक्ति और शक्ति का बेजोड़ संगम माना गया है। वे अपनी निष्काम सेवाभक्ति के बलबूते ही पूजे जाते हैं। उनके समान भक्ति सेवा का उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है। आइए! हनुमान जयंती के शुभ अवसर पर हनुमान चालीसा का गुणगान कर उनकी कृपा के पात्र बने- 
दोहा -श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि। बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।। बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार। बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।।
चौपाई - जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।। रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।।
महावीर विक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।। कंचन बरन विराज सुवेसा। कानन कुण्डल कुंचित केसा।। हाथ बज्र और ध्वजा बिराजै। कांधे मूंज जनेऊ साजै।।
शंकर सुवन केसरी नन्दन। तेज प्रताप महा जगबन्दन।। विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।। सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्रजी के काज संवारे।। लाय संजीवन लखन जियाए। श्री रघुबीर हरषि लाए।।
रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।। सहस बदन तुम्हरो यश गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मदि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।। जम कुबेर दिक्पाल जहां ते। कवि कोविद कहि सके कहां ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राजपद दीन्हा।। तुम्हरो मंत्र विभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्त्र योजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गए अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।। राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना।। आपन तेज सम्हारो आपै। तीों लोक हांक ते कांपै।।
भूत पिचाश निकट नहिं आवै। महावीर जब नाम सुनावै।। नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
संकट ते हनुमान छुड़ावै। मन-कर्म-वचन ध्यान जो लावै।। सब पर राम तपस्वी राजा। तिनके काम सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै।। चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु सन्त के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।। अष्ट सिद्वि नव निधि के दाता। अस वर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।। तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुःख बिसरावै।।
अंतकाल रघुबर पुर जाई। जहां जनम हरि भक्त कहाई।। और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेई सर्व सुख करई।।
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।। जय जय जय हनुमान गुसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।
जो शत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महासुख होई।। जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महं डेरा।।
दोहा-  पवन तनय संकट हरण, मंगल मूरति रूप।
         राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
                        इति श्री हनुमान चालीसा।

अतुलितबलघामं हेमशैलाभदेहं, दनुजवनकृशानुं शानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं, रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।

हनुमान जयंती की हार्दिक मंगलकामनाएं!
                                    ... कविता रावत

अथ होली ढूंढ़ा  कथा

अथ होली ढूंढ़ा कथा



होली पर्व से सम्बन्धित अनेक कहानियों में से हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रहलाद की कहानी बहुत प्रसिद्ध है। इसके अलावा ढूंढा नामक राक्षसी की कहानी का वर्णन भी मिलता है, जो बड़ी रोचक है।  कहते हैं कि सतयुग में रघु नामक राजा का सम्पूर्ण पृथ्वी पर अधिकार था। वह विद्वान, मधुरभाषी होने के साथ ही प्रजा की सेवा में तत्पर रहता था। एक दिन उसके राज्य के नागरिकों ने दरबार में आकर प्रार्थना कि नगर में ढू़ंढा नाम की राक्षसी ने अनेक गांवों और नगरों में उत्पात मचाया हुआ है। वह बड़ी मायाविनी है और अपनी इच्छानुसार रूप बदलने में शातिर है। वह बच्चों का मांस खाने की आदी है। उनके द्वारा अनेक उपाय किए गए हैं, लेकिन उस पर किसी तंत्र-मंत्र अथवा शक्ति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। आप अतिशीघ्र कोई उपाय कीजिए वर्ना नगर से बालकों की किलकारियाँ सदा के लिए बंद हो जाएगी। नगरवासियों के करुण पुकार सुनकर रघु बहुत चिन्तित हुए। उन्होंने नगरवासियों को आश्वस्त करते हुए अपने-अपने घर जाने को कहा।
   नगरवासियों के जाने के बाद राजा रघु बहुत विचार कर अपने गुरु वशिष्ठ के पास गये। गुरु के पास पहुंचकर उन्होंने विनम्रतापूर्व उनसे ढूंढा राक्षसी के बारे में समस्या का समाधान जानने के लिए बड़ी नम्रता से चरण स्पर्श किए और वहीं गुरु वशिष्ट के समीप बिछे कुशासन पर बैठकर और अपने आने का कारण बताया। उन्होंने गुरु वशिष्ट से पूछा कि कि यह राक्षसी कौन है? इसके अत्याचारों को निवारण का उपाय बताइये? वशिष्ट थोड़ी देर चुप रहकर बोले- राजन! यह माली नाम के राक्षस की कन्या है। एक समय की बात है। इसने शिव की आराधना में बड़ा उग्र तप किया। भगवान भोलेनाथ ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसको वर मांगने को कहा। इस पर वह कुछ भी न बोली तो फिर शिव जी ने कहा- “संकोच मत करो बालिके! जो कुछ तुम्हारे मन में हो वह मांग डालो। मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूंगा।
    महादेव के ऐसे वचन सुनकर उसका रहा सहा संकोच भी जाता रहा और वह हाथ जोड़कर बोले- हे भोलेनाथ मुझे देवता, दैत्य और शस्त्रों से अवध्य कर दीजिए। मुझे गर्मी-सर्दी, बरसात, दिन-रात, घर-बाहर सभी स्थानों से अभय प्राप्त हो। उसकी इस बात को सुनकर शिव सोच में पड़ गये। इतनी शक्तियों के प्राप्त हो जाने से यह उनका अवश्य दुरुपयोग करेगी और सर्वत्र आतंक फैलाती रहेगी, लेकिन मैं तो वचन दे चुका हूं फिर ........... शिवजी बोले- अरे, तुमने सब कुछ कहा लेकिन पागल और बालकों का नाम क्यों नहीं लिया?
ढूंढा हंसते हुए बोली- पागल तो पागल होता है। वह भला किसी का क्या बिगाड़ सकता है और रही बालकों की बात, भला उन्हें मैं क्यों सताने लगी, वे तो मुझे बहुत प्रिय है। शिव तथास्तु कहकर वहां से अन्तर्ध्यान हो गये। शिव के चले जाने पर उसने अपने कथन पर विचार किया- वह बालकों को लेकर चिन्ताग्रस्त हो गई। इसीलिए वह तब से बालकों को परेशान करती रहती है- सोचती है न कोई जीवित बचेगा और न मेरा अहित होगा। ऐसा वशिष्ट ने रघु को कह सुनाया।
गुरुदेव की समस्त बातें ध्यानपूर्वक सुनकर रघु बोले- इससे मुक्ति को भी तो कोई उपाय होगा। उपाय क्यों नहीं है, उपाय तो है- कोई भी देवता कोई तपस्वी को ऐसे ही वरदान थोड़े ही दे दिया जाता है। बहुत आगा-पीछा सोचकर, उसी के कथन में से सार निकालकर उसकी मौत का कारण समझ वरदान दिया जाता है। यदि वह तपस्वी का वरदान न दें तो व्यक्ति का ईश्वर पर से आस्था ही समाप्त हो जाए। इसलिए देवताओं को उनकी तपस्या को सार्थक करने के लिए वरदान तो देना ही पड़ता है। यदि उसने पाई हुई सिद्धि का दुरुपयोग किया तो उसी के मांगे हुए वरदान में से उसकी मौत का उपाय भी खोज लेते हैं। इसलिए हे राजन, आप चिन्तित न हो और जैसा मैं कहूं वैसा ही कृत्य करें।
          फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को राज्य के बालकों को बुलाकर उनसे सूखे उपले (गोबर के कंडे) मंगाकर एक जगह इकट्ठे करवाएं और उसमें सूखे पत्तां, टहनियां, लकड़ियां मंगाकर एक ढूंढ बनवाएं । उसके बीचों बीच एक लकड़ी का लम्बा डंडा लगवाएं क्योंकि उसने (ढूंढा) वरदान मांगते समय जंगली वस्तुओं और पशुओं का नाम नहीं लिया था। बालकों के हाथ में लकड़ी की तलवारें दें और उनसे कहें कि अपनी अपनी तलवारों को इस प्रकार चलाएं जिस प्रकार युद्ध में योद्धा अपने शत्रु पर वार करने के लिए प्रहार करता है। बड़े लोगों से कहें कि वे पागलों की तरह व्यवहार करें, क्रूर हास्य, अनर्गल प्रलाप और हंसी-मजाक करें। निःशंक होकर जिसके मन में जो आये वही करें फिर आप राक्षसों के नाश वाला मंत्र बोलकर अग्नि को प्रज्जवति करें। तत्काल रघु क्षमायाचना सहित बोल उठे- लेकिन गुरूदेव, इस सबसे ढूंढा का कैसे नाश होगा। नाश ....नाशम ही तो होगा। वह इतने बालकों के समूह को देखकर लार टपकाती हुई वहां आयेगी और अपने को सबों की दृष्टि से ओझल रखने की लिए उसी ढूंढ में छुप जाएगी। राक्षसों के नाश करने वाले मंत्र से ज्यों ही अग्नि प्रज्जवलित होगी, वह उसी में जल मरेगी। राजन, ऐसा अवश्य होगा क्योकि उसकी मृत्यु इसी प्रकार लिखी हुई है।
  राजा रघु ने गुरूदेव की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया। ढूंढा नाम की राक्षसी अपने प्रलोभन के कारण सचमुच वहां आई और ढूंढा को अग्नि के चारों तरफ से घेर लिया तो वह निकल भागने का उपाय खोजने लगी लेकिन वशिष्ट के मंत्रों ने उस अग्नि के चारों ओर से एक गोलाकार रेखा से बांध जो दिया था। मंत्रों के प्रभाव से वह न तो एक इंच वहां से सरक सकी न ही मायावी रूप धारण कर पाई। अपनी मृत्यु को देख वह चीख-चीखकर शिव को पुकारने लगी। शिवजी वहां आये और उन्हें धिक्कारते हुए कहा कि तुमने अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया इसीलिए परिणाम भुगतो। उसकी अनुनय-विनय सब बेकार गई और वह जल मरी।  तब से आज तक होली जलाने, अनाप-शनाप बोलने  और होली की राख को तांंत्रिक लोगों द्वारा उपयोग आदि की प्रथा चल पड़ी । 
सभी को होली की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!
डरपोक कुत्ते सबसे तेज़ भौंकते हैं

डरपोक कुत्ते सबसे तेज़ भौंकते हैं

मुर्गा अपने दड़बे पर बड़ा दिलेर होता है
अपनी गली का कुत्ता भी शेर होता है

दुष्ट लोग क्षमा नहीं दंड के भागी होते हैं
लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं

हज़ार कौओं को भगाने हेतु एक पत्थर बहुत है
सैकड़ों गीदड़ों के लिए एक शेर ही ग़नीमत है

बुराई को सिर उठाते ही कुचल देना चाहिए
चोर को पकड़ने के लिए चोर लगाना चाहिए

कायर भेड़िए की खाल में मिलते हैं
डरपोक कुत्ते सबसे तेज़ भौंकते हैं

...कविता रावत


'दादी' के आते ही घर-आंगन से रूठा वसंत लौट आया ...

'दादी' के आते ही घर-आंगन से रूठा वसंत लौट आया ...

          हम चार मंजिला बिल्डिंग के सबसे निचले वाले माले में रहते हैं। यूँ तो सरकारी मकानों में सबसे निचले वाले घर की स्थिति ऊपरी मंजिलों में रहने वाले लागों के  जब-तब घर-भर का कूड़ा-करकट फेंकते रहने की आदत के चलते कूड़ेदान सी बनी रहती है, फिर भी यहाँ एक सुकून वाली बात जरूर है कि बागवानी  के लिए पर्याप्त जगह निकल आती है। बचपन में जब खेल-खेल में पेड़-पौधे लगाकर खुश हो लेते थे, तब उनके महत्व की समझ नहीं थी। अब जब पर्यावरण के लिए पेड़-पौधे कितने महत्व के हैं, इसकी समझ विकसित हुई तो उन्हें कटते-घटते देख  मन बड़ा विचलित हो उठता है।     
         
         बच्चों की धमाचौकड़ी और बुजुर्गों की चहल-कदमीे घर-आंगन की रौनक बढ़ाती है। इस बात को मैंने शिद्दत  से तब महसूस किया, जब हमारे पड़ोस में एक दादी का अपने भरे-पूरे परिवार के साथ आना हुआ। उनके आते ही घर-आंगन से रूठा वसंत लौट आया। मुझे यह देखकर बड़ी खुशी हुई कि दादी भी मेरी तरह प्रकृति से जुडी हुई हैं। वे 75 वसंत से अधिक देख चुकी होंगी, फिर भी वह 'अपना हाथ जगन्नाथ' के तर्ज पर अपना सारा काम खुद करती है। यही नहीं सुबह-सुबह घर-आंगन को बुहारना, बाग-बगीचे में खाद-पानी देना और फिर चूल्हे पर आग सुलगा कर गरम पानी करना भी उनकी रोजमर्रा की आदत में शुमार है। वे सबके लिए एक आदर्श हैं। वे सबकी दादी है। उनका असली नाम तो मैंने कभी जानने की कोशिश नहीं की, बस इतना जानती हूँ कि जब से उनका आना हुआ, तब से घर-परिवार और मोहल्ले के सभी छोटे-बड़ों को एक दादी मिल गई है।
         दादी को दूसरे लोगों की तरह टेलीविजन से चिपककर किसी भी सीरियल में रूचि नहीं है, वे तो देश-दुनिया की खबर लेने का शौक रखती है। उनके पास अनुभव से भरी भारी तिजारी है। वे पर्यावरण के प्रति सजग और समर्पित हैं। वे अपने बगीचे में ही नहीं अपितु अपने आस-पास पेड़-पौधे लगाकर लोगों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करती हैं। आज के हालातों को देख वे बड़े दुःखी मन से कहती है कि पहले जब बड़े-बड़े कारखाने, उद्योग नहीं थे, तब हमारा वातावरण शुद्ध हुआ करता था, जीवन में तब  न अधिक  भागदौड़ थी न हाय-हाय। शुद्ध अन्न के साथ-साथ  शुद्ध हवा और पानी मिलता था। लेकिन जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ी तो कारखाने, उद्योग और बड़ी-बड़ी इमारते तन गई, फलस्वरूप कारखानों से निकलने वाले धुएं ने हवा को प्रदूषित करने का काम किया और उद्योगों से निकलने वाले बहते रसायनों ने नदियों के पानी में जहर घोल दिया। यही नहीं पर्यावरण संतुलन बिगाड़ने की रही-सही कसर पेड़-पौधे, खेत-खलियान काटकर बड़ी-बड़ी इमारतें बनाकर पूरी कर दी गई, जो आज विश्व भर में  गंभीर चिन्ता का विषय बना हुआ है।
         दादी को मेरी तरह ही प्रकृति से बेहद लगाव है, इसलिए मैं अपने को हर समय दादी के सबसे करीब पाती हूँ। मैंने दादी से मिलकर लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का बीड़ा उठाया है और इसकी शुरूआत हमने पहले अपने घर के बाग-बगीचे से शुरू की और फिर घर के सामने पड़ी बंजर भूमि में पेड-पौधे लगाकर उसे आबाद करने से कर ली है। अब हमारा अपना बाग-बगीचा है और साथ ही है एक अपनी  हरी-भरी बाड़ी, जिसमें हम अलग-अलग तरह के पेड़, फूल और साग-सब्जी उगाते हैं। शहर में  पेड़-पौधे लगना उतना दुष्कर काम नहीं है, जितना उनको शरारती बच्चों, खुरापाती लोगों और आवारा जानवरों से बचाने की चुनौती होती है। लेकिन दादी को कठिन से कठिन चुनौतियों का सामना करने में महारत हासिल है। आज उनकी निगरानी में पूरी तरह बाड़ी को महफूज देखकर मुझे बड़ी राहत मिलती है। आजकल घर-आंगन में रखे गमलों में सदाबहार, गुलाब, सेवंती, गेंदा आदि फूल खिले हुए है और साथ ही सड़क किनारे बनाई हमारी बाड़ी में पेड़-पौधों और साग-सब्जी के बीच पीली-पीली सरसों फूलने से वासंती रंगत छायी हुई है, जो मोहल्ले और सड़क पर आने जाने वाले शहरी लोगों को वसंत के आगमन की सूचना दे रही है।    
....कविता रावत

सरकारी आयोजन मात्र नहीं हैं राष्ट्रीय त्यौहार

सरकारी आयोजन मात्र नहीं हैं राष्ट्रीय त्यौहार


राष्ट्रीय त्यौहारों में गणतंत्र दिवस का विशेष महत्व है। यह दिवस हमारा अत्यन्त लोकप्रिय राष्ट्रीय पर्व है, जो प्रतिवर्ष आकर हमें हमारी प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली का भान कराता है। स्वतंत्रता के बाद भारतीयों के गौरव को स्थिर रखने के लिए डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में देश के गणमान्य नेताओं द्वारा निर्मित विधान को 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया। संविधान में देश के समस्त नागरिकों को समान अधिकार दिए गए। भारत को गणतंत्र घोषित किया गया। इसलिए 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस कहा जाता है। देश की राजधानी दिल्ली में यह समारोह विशेष उत्साह से मनाया जाता है। 
        विविधाओं से भरे हमारे देश में जाति, धर्म, भाषा, भौगोलिक परिस्थितियों की भिन्नता के बावजूद एक ऐसी मजबूत कड़ी है, जो हम सबको आपस में जोड़े रखती है, वह है हम सबके भारतवासी होनी की और इस भारतीय होने की खुशी को प्रकट करने के सबसे अच्छे अवसर हैं, हमारे राष्ट्रीय त्यौहार। बावजूद अन्य त्यौहार जैसे होली, दीवाली, विजयादशमी, ईद, क्रिसमस, लोहड़ी, पोंगल, ओणम आदि के अवसर पर जैसा हर्षोल्लास व अपनापन देखने को मिलता है, वैसा जब हमारे राष्ट्रीय त्यौहारों पर दिखाई नहीं देता है तब मन में मलाल रह जाता है। लगता है हमने हमारे राष्ट्रीय त्यौहार जैसे-गांधी जयंती, स्वतंत्रता दिवस अथवा गणतंत्र दिवस को केवल सरकारी आयोजन मान लिया है, जो हमारे लिए मात्र एक अवकाश भर से और अधिक कुछ भी नहीं? यदि ऐसा नहीं तो फिर जब हम अंग्रेजी न्यू ईयर, फ्रेंडस डे, वेलेन्टाईन डे यहाँ  तक कि शादी-ब्याह की वर्षगांठ को भी धूमधाम से मना सकते हैं तो फिर राष्ट्रीय त्यौहारों पर बेरूखी क्यों? आइए, इस गणतंत्र दिवस के अवसर पर हम सभी राष्ट्रीय त्यौहारों को मात्र शासकीय आयोजन तक ही सीमित न रखते हुए अपने घर-आंगन व दिलों में उतारकर उसे  सम्पूर्ण देश को जोड़ने की एक उत्सवमयी शुरूआत करें।
       राष्ट्रीय त्यौहार हमें जाति, धर्म, भाषा, भौगोलिक परिस्थितियों से परे एक सूत्र में बांधने में सहायक हैं। सामूहिक स्तर पर प्रेमभाव से इन्हें मनाने से राष्ट्रीय स्तर पर भावनात्मक एकता को विशेष प्रेरणा और बल मिलता रहे इसके लिए हम सभी अपने-अपने घरों में वंदनवार लगायें, दीपों से सजायें, तिरंगा फहराये, रंगोली बनायें, पकवान बनायें, अपने-अपने कार्यस्थलों व मोहल्लों में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करें। अपने धार्मिक स्थलों मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा आदि में देश की एकता, सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए प्रार्थना करें। मातृ-भूमि के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण न्यौछावार कर देने वाले अमर वीर सपूतों को सारे भेदभाव भुलाकर एक विशाल कुटुम्ब के सदस्य बनकर याद करें।
         आइए, समस्त भारतवासी इस गणतंत्र दिवस को संकल्प लें कि देश का हर घर और हर धार्मिक स्थल को सारे भेद-भावों से ऊपर उठकर दीप-मालाओं की रोशनी से जगमगायेंगे और दुनिया को गर्व से बतायेंगे कि हम सब कई भिन्नताओं के बावजूद भी एक हैं। हमारा यह दृढ़ संकल्प ही मातृ भूमि के लिए जाति, धर्म, वर्ण, भाषा एवं क्षेत्रीयता की भावनाओं से ऊपर उठकर देश को सर्वोपरि मानते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर वीर सपूतों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
  
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं सहित - जय हिन्द, जय भारत!!