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Saturday, September 14, 2019

राष्ट्रभाषा स्वतंत्र देश की संपत्ति होती है


किसी राष्ट्र की संस्कृति उस राष्ट्र की आत्मा है। राष्ट्र की जनता उस राष्ट्र का शरीर है। उस जनता की वाणी राष्ट्र की भाषा है। डाॅ. जानसन की धारणा है, ’भाषा विचार की पोषक है।’ भाषा सभ्यता और संस्कृति की वाहक है और उसका अंग भी। माँ के दूध के साथ जो संस्कार मिलते हैं और जो मीठे शब्द सुनाई देते हैं, उनके और विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय के बीच जो मेल होना चाहिए वह अपनी भाषा द्वारा ही संभव है। विदेशी भाषा द्वारा संस्कार-रोपण असम्भव है।
         महावीर प्रसाद द्विवेदी जी लिखते हैं कि, ’अपने देश, अपनी जाति का उपकार और कल्याण अपनी ही भाषा के साहित्य की उन्नति से ही हो सकता है।’ महात्मा गांधी जी कहते हैं, ’अपनी भाषा के ज्ञान के बिना कोई सच्चा देशभक्त नहीं बन सकता। समाज का सुधार अपनी भाषा से ही हो सकता है। हमारे व्यवहार में सफलता और उत्कृष्टता भरी हमारी अपनी भाषा से ही आएगी।’ कविवर बल्लतोल कहते हैं, ’आपका मस्तक यदि अपनी भाषा के सामने भक्ति से झुक न जाए तो फिर वह कैसे उठ सकता है।’ अज्ञेय जी कहते हैं, ’किसी भी समाज को अनिवार्यतः अपनी भाषा में ही जीना होगा। नहीं तो उसकी अस्मिता कुण्ठित होगी ही होगी और उसमें आत्म-बहिष्कार के विचार प्रकट होंगे।’ कालरिज का कहना हैं, ’भाषा मानव-मस्तिष्क की वह प्रयोगशाला है, जिसमें अतीत ही सफलताओं के जय-स्मारक और भावी सफलताओं के लिए अस्त्र-शस्त्र एक सिक्के दो पहलुओं की तरह साथ रहते हैं।’ इसका अर्थ है कि भाषा के द्वारा ही प्राचीन गौरव अक्षुण्ण रहता है और उज्ज्वल भविष्य के बीज उसमें निहित रहते हैं। भारत के प्राचीन गौरव की महिमा को जीवित रखने के लिए विश्व में उसकी विजय-पताका फहराने के लिए हिन्दी की उन्नति अनिवार्य है। 
      राष्ट्रभाषा स्वतंत्र देश की संपत्ति होती है और हमारे देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी है, लेकिन अधिकांश देशवासी हिन्दी को महत्व न देकर अंग्रेजी के मोहपाश में फंसे हैं। संविधान की धारा 351 के अंतर्गत हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा तो दिया गया है, लेकिन सरकारी स्तर पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा का महत्व अभी तक प्राप्त न हो सका है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहासनारूढ़ करने की अंतिम शर्त कि,'भारत का एक भी राज्य जब तक हिन्दी को नहीं चाहेगा, वह राज्यभाषा नहीं बन सकती’ गले की फांस बनी है। वस्तुतः यह शर्त हमारे नीति-नियंताओं द्वारा अनंतकाल तक अंग्रेजी का वर्चस्व बनाए रखने के लिए एक षड्यंत्र था, जिसे उन्होंने अंग्रेजों द्वारा ’फूट डालो, राज्य करो’ के सिद्धांत से सीखा, जिसे शासन-संचालन की अचूक औषधि समझा जाता है। भाषा के प्रश्न पर उत्तर-दक्षिण की बात खड़ी करके भारतीय समाज को विघटित कर दिया गया। हिन्दी कहने को राष्ट्रभाषा है, किन्तु प्रांतीय भाषाएं भी उसके इस अधिकार की अधिकारिणी बना दी गई है। अंग्रेजी साम्राज्य की देन अंग्रेजी आज भी प्रमुख भाषा बनकर भारत पर राज्य कर रही है। आज भी अच्छी नौकरी चाहिए या नौकरी में तरक्की या व्यापार को बढ़ाना हो या फिर ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों से काम निकलवाना हो, इन सभी के लिए अंग्रेजी बोलनी-लिखनी बहुत जरूरी है। आईसीए, पीसीए, पीएससी हो या यूपीएससी सभी प्रतियोगी परीक्षाओं का माध्यम अंग्रेजी है, यही उदरपूर्ति का साधन और उन्नति का माध्यम बना हुआ है।  
         हमें नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका और जापान दोनों को अपनी-अपनी भाषा पर गर्व है। ये अपनी-अपनी भाषा द्वारा राष्ट्र को यश प्रदान करने में गौरव अनुभव करते हैं। यही कारण है कि आज वैज्ञानिक दृष्टि से अमेरिका और औद्योगिक प्रगति की दृष्टि से जापान विश्व में सर्वोच्च शिखर पर आसीन हैं, किन्तु हमारी बिडम्बना देखिए हम आज भी अपनी राष्ट्रभाषा को वह सम्मान नहीं दे पाएं हैं, जिसकी वह अधिकारिणी है। आज इसके लिए हमें ऐसे चाणक्य चाहिए जो हिन्दी के विरुद्ध किए जाने वाले षड्यंत्रों का पर्दाफाश करके, हिन्दी की पताका फहराने वालों की हिन्दी विरोधी नीति को उजागर करके जन-मानस में हिन्दी-संस्कार का अमृत पहुंचा सके। लोभ, लालच, ममता, स्वार्थ के कंकटों को हटाकर मार्ग में पुष्प बिखेर दे, ताकि माँ-भारती का रथ सरलता से चलकर भारत-भारती का भाल विश्व-प्रांगण में उन्नत कर सके। जब जनता और सत्ता दोनों मिलकर हिन्दी को सच्चे हृदय से अपनाएंगे, राजनीति का छल-छद्म से दूर रखेंगे तो निश्चित ही हिन्दी का विकास द्रुतगति से संभव हो सकेगा।  

Monday, September 2, 2019

मेरे शिवा का इको-फ्रेंडली गणेशोत्सव


बच्चे जब बहुत छोटे होते हैं, तो उनकी अपनी एक अलग ही दुनिया होती है। उनके अपने-अपने खेल-खिलौनें होते हैं, जिनमें वे दुनियादारी के तमाम झमेलों से कोसों दूर अपनी बनायी दुनिया में मस्त रहते हैं। इसीलिए तो उन्हें भगवान का रूप कहा जाता है। प्रायः सभी बच्चों को बचपन में खेल-खिलौनों से बड़ा लगाव रहता है, वे तरह-तरह के खिलौनों से खेलना पसंद करते हैं, लेकिन मेरे शिवा को बचपन में कोई खिलौना पसंद ही नहीं आता था; हम जब भी उसे बाजार ले जाकर किसी खिलौने की दुकान पर अपनी पसंद का खिलौना पसंद करने को कहते तो वह पूरी दुकान में इधर-उधर घुसते हुए ढूढ़ता-फिरता, लेकिन बहुत देर बाद जब उसे उसकी पसंद की कोई चीज नहीं मिलती तो वह मुंह फुलाकर बुत बनकर आकर सामने खड़ा हो जाता। पूछने पर कि क्या हुआ, क्या हुआ, तो कुछ भी नहीं बोलता बस हाथ पकड़कर एक दुकान से दूसरी दुकान के चक्कर कटवाता रहता। जैसे ही उसे किसी दुकान पर गणेश के खिलौने या मूर्ति नजर आती तो झट उंगुली से इशारा करते हुए हाथ खींचकर ले जाता। यदि उसे उसकी पसंद के गणपति जी मिल गए तो वह खुशी से उछल-कूद करते हुए घर की ओर चल देता और यदि नहीं तो फिर एक दुकान से दूसरी दुकान खंगालने की जिद्द कर अपनी मांग पूरी करके ही दम लेता।         
मेरा शिवा (अर्जित) अब बड़ा हो गया है, वह अभी आठवी कक्षा में पढ़ता है, लेकिन उसका गणपति से जो लगाव बचपन में था, वह कम नहीं हुआ है। हाँ थोड़ा सा जो उसमें बदलाव आया है, वह यह कि अब वह गणपति जी को दुकान से खरीदने के स्थान पर खुद अपने हाथों से कभी ड्राइंग तो कभी मिट्टी से सुन्दर व आकर्षक कलाकृतियाँ बनाता रहता है। मूर्ति बनाने के लिए कभी वह मिट्टी बाजार से तो कभी खुद कहीं से खोदकर ले आता है। खोदकर लायी मिट्टी को वह सबसे पहले कूट-कूट कर उनके कण-कण को अलग करता है। धूप में सुखाता है और फिर कूटता है। बिल्कुल बारीक होने पर उसे छलनी से छानकर सभी कंकड़ अलग कर देता है। फिर पानी डालकर उसे तब तक गूंथता रहता है, जब तक वह मैदे की तरह कोमल नहीं हो जाता। मुझे मेरे शिवा को इस तरह अपने हाथों से गणपति जी की प्रतिमाएँ बनाते देखना बहुत अच्छा लगता है। कई बार प्रतिमा बनाते समय जब उसमें कभी टूट-फूट हो जाती है, तो वह परेशान सा हो जाता है, लेकिन ऐसे क्षण में उसकी जो बात मुझे सबसे अच्छी लगती है, वह यह कि वह किसी भी कीमत पर हार नहीं मानता, जुनून की हद तक उसे पूरा करके ही दम लेता है। 
गणेशोत्सव के पूर्व पर्यावरण संरक्षण जागरूकता के लिए इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमा बनाने और झांकी डेकोरेशन की कार्यशालाएं शहर भर में जगह-जगह आयोजित की गई। ऐसी ही एक कार्यशाला जवाहर बाल भवन में मूर्तिकला प्रशिक्षक हर्षित तिवारी के मार्गदर्शन में मेरे शिवा ने भाग लिया, जहाँ उसने दूसरे बच्चों के साथ इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमा बनाने की आसान विधि सीखकर अपने घर और कार्यशाला के लिए एक-एक सुंदर गणेश प्रतिमा बनायी, जो मुझे ही नहीं बल्कि उनके प्रशिक्षक को भी इसलिए बहुत अच्छे लगे, क्योंकि उसने मनमोहक गणेश प्रतिमा के साथ ही मूषकराज को उनकी गोद में बिठाकर नवाचार किया है। इस नवाचार के विषय में जब प्रशिक्षक ने उससे पूछा तो उसने बताया कि, "क्योंकि जो हमारे अपने सबसे प्रिय होते हैं, वे हमेशा हमारे दिल में रहा करते हैं, इसीलिए मैंने मूषक को गणेश जी की गोद में बिठाया है।" इसी कार्यशाला में उसने हस्तकला प्रशिक्षक अजय यादव से “इको-फ्रेंडली“ झांकी डेकोरेशन के गुर सीखकर गणेश जी को विराजमान करने के लिए एक आकर्षक झांकी भी बनायी है। कार्यशाला में यह एक बहुत ही अच्छी पहल है कि बच्चों को घर पर ही गणेश प्रतिमा विराजित करने और विसर्जित करने का संकल्प भी दिलाया गया है।
         भगवान गणेश हमारे विध्नहर्ता है, मंगलकर्ता है, उनकी पूजा बिना सब काम अधूरे हैं। गृह प्रवेश हो, व्यापार का शुभारम्भ हो, प्राणिग्रहण संस्कार की बेला हो या कोई भी मंगल कार्य, प्रथम पूज्य गणेश की ही सर्वप्रथम पूजा की जाती है।  अब यदि हम गणेशोत्सव में मिट्टी के गणेश की प्रतिमा बनाकर उन्हें अपने घर विराजमान कर उनका विसर्जन भी घर पर ही करते हैं तो वे घर में ऊर्जा के रूप में हमारे साथ हमेशा बने रहेंगे; सोचिए इससे अच्छी क्या कोई और बात हो सकती है! नहीं न, तो फिर इस बार ही नहीं, अपितु हर बार इको-फ्रेंडली गणेशोत्सव मनाएँ। बोलो गणपति बप्पा मोरया !

... कविता रावत




सभी ब्लॉगर्स एवं पाठकों को गणेशोत्सव की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं।